UP चुनाव में किस्मत आजमा चुकी हैं कई मुस्लिम पार्टियां, जानिए जनता से क्या मिला जवाब

लखनऊ, 15 फरवरी: उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक पर राजनीति करने वालों के लिए यूपी कभी रास नहीं आया। हालांकि दूसरे चरण में उन 55 विधानसभा सीटों पर वोटिंग पूरी हो गई, जहां 40% से ज्यादा मुसलमान वोटर हैं। मुस्लिम पार्टी होने का दावा करने वाली AIMIM ने 15 मुस्लिम कैंडिडेट उतारे हैं, लेकिन यूपी का पिछला रिकॉर्ड देखने पर ऐसा लगता है कि यूपी में मुस्लिम पार्टियों की सियासत रास नहीं आती है तभी तो जब जब यूपी में मुस्लिम संगठनों ने पार्टी बनाकर यूपी के 20 फीसदी वोट बैंक पर दावेदारी ठोकने की कोशिश की तब तब यहां की जनता ने उन्हें नकार दिया। यूपी में कुछ मुस्लिम पार्टियों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया लेकिन वो सफल नहीं हो पाईं।

 यूपी में 1968 में मुस्लिम मजलिस नाम की पार्टी बनी

यूपी में 1968 में मुस्लिम मजलिस नाम की पार्टी बनी

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो मुस्लिम मजलिस पार्टी: डॉ.अब्दुल जलील फरीदी आजादी की लड़ाई में थे। आजादी के बाद वे नेता बने। उनकी रैलियों में मुसलमानों की भीड़ तो खूब उमड़ती थी। वे चाहते थे कि UP की राजनीति में उन्हें बड़ा पद मिले, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आखिरकार 20 साल बाद 1968 में मुस्लिम मजलिस नाम की पार्टी बनाई। उनका मकसद मुस्लिम अल्पसंख्यक बिरादरी को उनका हक दिलवाना था लेकिन पार्टी बनने के एक साल बाद यानी 1969 में UP में विधानसभा चुनाव हुए। मुस्लिम मजलिस पार्टी ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों ही सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई। दोनों सीटों पर मिलाकर मुस्लिम मजलिस पार्टी को 4000 से भी कम वोट मिले। साल 1974 में डॉ. फरीदी की मौत के साथ ये पार्टी भी खत्म होती गई।

इंडियन मुस्लिम लीग ने 1974 में लड़ा चुनाव

इंडियन मुस्लिम लीग ने 1974 में लड़ा चुनाव

इसके बाद यूपी में दूसरी मुस्लिम पार्टी 33 साल तक चुनाव लड़ती रही लेकिन केवल 1 सीट ही जीत सकी। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने 1974 के विधानसभा चनुाव में चुनाव लड़ा था। विधानसभा चुनाव 1974 में मुस्लिम लीग ने 54 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे, लेकिन 43 की जमानत जब्त हो गई। सिर्फ एक सीट ही जीत पाई। सिर्फ जमानत ही बचा पाए थे। लिस्ट में नीचे से दूसरे या तीसरे नंबर थे।इसके बाद ये पार्टी सन्नाटे में चली गई। फिर 28 साल बाद गुलाम महमूद ने फिर दम भरा। विधानसभा चुनाव 2002 में उन्होंने 18 सीटों पर कैंडिडेट उतारे, लेकिन जीता कोई नहीं।

मायावती को सबक सिखाने के लिए बनी थी नेलोपा

मायावती को सबक सिखाने के लिए बनी थी नेलोपा

यूपी की तीसरी मुस्लिम पार्टी, मायावती से बदला लेने के लिए बनी थी, पर ले नहीं पाई। वरिष्ठ पत्रकारों की मानें तो साल 1995 में भाजपा के समर्थन में बसपा की सरकार बनी। ये वह दौर था जब UP के मुसलमानों का बसपा पर विश्वास बढ़ा हुआ था। मायावती UP की CM बनाई गईं। उन्होंने डॉ. मसूद अहमद को शिक्षा मंत्री बनाया। डॉ. मसूद ने शिक्षामंत्री रहते हुए अल्पसंख्यक समुदाय के लिए काफी काम किया, लेकिन कुछ समय बाद मायावती ने डॉ. मसूद को कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया। मायावती से अपनी बेइज्जती का बदला लेने के लिए डॉ. मसूद ने साल 2002 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी यानी नेलोपा बनाई।नेलोपा विधानसभा चुनाव 2002 में 130 सीटों पर चुनाव लड़ा। खुद को मुस्लिमों की पार्टी होने का दावा करने वाली नेलोपा के 130 कैंडिडेट्स में से 126 की जमानत जब्त हो गई।

यूपी में बनी थी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट

यूपी में बनी थी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट

यूपी चौथी मुस्लिम पार्टी जामा मस्जिद के इमाम ने बनाई लेकिन उनकी भी नहीं चली। उन्होंने यूपी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नाम से पार्टी बनाई। 2007 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने भी किस्मत आजमाई। उन्होंने 54 सीटों पर यूपी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रत्याशी उतारे। दिल्ली में मुसलमानों का बड़ा वर्ग उन्हें सपोर्ट करता है। वो जिस पार्टी को कहते थे, मुसलमान उसी को वोट देते थे, लेकिन यूपी के वोटरों ने इस बात को गलत साबित कर दिया।विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो UP यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के 54 में से सिर्फ एक उम्मीदवार जीता, जबकि 51 सीटों पर जमानत जब्त हो गई। इस शर्मनाक हार के बाद अहमद बुखारी UP की सियासत से गायब हो गए।

अयूब खान ने बनाई पीस पार्टी

अयूब खान ने बनाई पीस पार्टी

यूपी में साल 2008 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के उपाध्यक्ष रहे डॉ. अय्यूब सर्जन ने पीस पार्टी बनाई। पीस पार्टी ने चार साल तक पार्टी ने जमीन पर उतर कर प्रचार किया। मुसलमानों के असल मुद्दे समझे। 2012 के विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी ने 208 सीटों में से सिर्फ 4 जीतीं। यह पार्टी की उम्मीद से बहुत कम थीं, लेकिन कुछ नहीं से बेहतर थीं। 2017 में पीस पार्टी ने एक बार फिर चुनाव मैदान में उतरी, लेकिन इस बार उसका खाता तक नहीं खुल पाया।

इस बार ओवैसी ठोक रहे यूपी में ताल

इस बार ओवैसी ठोक रहे यूपी में ताल

साल 1926 में बनी पार्टी देश की राजनीति में 2019 में चमकी। AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने भाजपा और कांग्रेस को चुनौती देने के लिए 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को उतारा था। हैदराबाद में AIMIM ने अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन दूसरे राज्यों में पार्टी की हालत खराब रही। AIMIM ने साल 2017 में UP में 38 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन कहीं भी जीत नसीब नहीं हो सकी। सभी कैंडिडेट्स की जमानत जब्त हो गई थी। विधानसभा चुनाव-2022 में औवेसी नई तैयारी से आए हैं। उन्होंने 403 सीटों में से 100 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। पार्टी अब तक 76 विधानसभा सीटों पर कैंडिडेट एनाउंस कर चुकी है। इसने 61 मुस्लिम उम्मीदवार हैं और 15 हिंदू, अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC और दलितों वर्ग के लोगों को टिकट दिया है।

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