क्या वरुण गांधी की वजह से मेनका गांधी के राजनीतिक भविष्य पर लग गया ग्रहण ?, जानिए
लखनऊ, 1 मार्च : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है। अब तक पांच चरणों में 292 सीटों के लिए मतदान हो चुका है और अगले दो चरणों में बची हुई 111 सीटों पर 3 मार्च और 7 मार्च को मतदान होगा। राज्य में किसकी सरकार बन रही है और किसकी लूटिया डूब रही है ये तो 10 मार्च को ही पता चलेगा, जिस दिन रिजल्ट आएगा। सभी पार्टियों ने अपने मुख्य प्रचारक जिन्हें चुनाव प्रचार में स्टार प्रचारक भी कहा जाता है, उन्हें चुनाव प्रचार में झोंके हुए हैं लेकिन बीजेपी के दो फायर ब्रांड नेता मेनका गांधी और वरूण गांधी इस चुनाव से दूर हैं। वरूण जिस तरह से लगातार मोदी सरकार और योगी सरकार के खिलाफ मुखर हो रहे हैं उससे मेनका के सियासी भविष्य पर भी एक तरह से ग्रहण लग गया है।

गांधी परिवार की अब बीजेपी को जरूरत नहीं ?
मेनका गांधी और उनके बेटे वरुण गांधी दोनों बीजेपी सांसद हैं और अतीत में इनका नाम बीजेपी के स्टार प्रचारकों की लिस्ट में था। बीजेपी ने मां-बेटे की जोड़ी को पार्टी में शामिल किया था क्योंकि दोनों गांधी परिवार से थे और बीजेपी को उम्मीद थी कि वे एक ही परिवार से एक और मां-बेटे की जोड़ी - सोनिया और राहुल गांधी को लाएंगे। सोनिया और राहुल गांधी ने न केवल उत्तर प्रदेश में बल्कि पूरे देश में कमजेार प्रदर्शन किया। एक समय ऐसा था जब बीजेपी को लगता था कि गांधी परिवार के इन दोनों सदस्यों की बीजेपी को जरूरत है लेकिन अब बीजेपी चूंकि सफलता के रथ पर सवार है और उसके पास मोदी जैसा करिश्माई नेता भी है तो अब गांधी परिवार की काट के लिए गांधी परिवार की क्या जरूरत है।

बीजेपी ने मां-बेटे की सेवाएं नहीं लीं
2004 के बाद, जब उन्हें भाजपा में शामिल किया गया, यह पहली बार है कि पार्टी ने चुनाव प्रचार में उनकी सेवाएं नहीं ली हैं। यहां तक कि सुल्तानपुर और पीलीभीत में भी नहीं जहां से दोनों सांसद हैं। ऐसा नहीं है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में बहुत आराम से चुनाव जीतने जा रही है। मुकाबला कांटे का है, भले ही भाजपा का झुकाव समाजवादी पार्टी के खिलाफ हो। सुल्तानपुर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत छह विधानसभा क्षेत्र और पीलीभीत संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। ऐसा नहीं है कि इन 11 सीटों पर बीजेपी की जीत पक्की है या इन 11 सीटों के नतीजे से बीजेपी बेअसर हो जाएगी। दोनों क्षेत्रों में मां-बेटे का प्रभाव भी है। फिर ऐसा क्या हुआ कि भाजपा ने मेनका और वरुण गांधी को जोखिम उठाकर भी चुनाव प्रचार से दूर रखने का फैसला कर लिया?

बीजेपी के साथ रिश्तों में आई खटास
बीजेपी में शामिल होने के बाद मेनका और वरुण गांधी ने पार्टी को निराश नहीं किया, मेनका 2004 से लगातार चार बार चुनाव जीत चुकी हैं और वरुण 2009 से लगातार तीन बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। जब बीजेपी की सरकार बनी थी। 2014 में केंद्र, मेनका गांधी को मंत्री बनाया गया और वरुण गांधी पार्टी के सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय महासचिव बने। लेकिन पिछले ढाई-तीन सालों में उनके रिश्ते में खटास आ गई है, खासकर किसान आंदोलन शुरू होने के बाद।

वरूण ने सीमा से बाहर जाकर कृषि कानूनों का किया विरोध
वरुण गांधी अकेले भाजपा नेता नहीं थे जो विवादास्पद कृषि कानूनों के विरोधी थे। लोकतंत्र में यह उम्मीद भी नहीं की जाती है कि पार्टी के सभी सांसदों की सोच एक जैसी हो। लेकिन जहां ज्यादातर नेताओं ने पार्टी की सीमा में रहकर कृषि कानूनों का विरोध किया, वहीं वरुण गांधी अपने चचेरे भाई राहुल गांधी की भाषा का इस्तेमाल करते दिखे, राहुल गांधी की तरह उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार पर केवल पूंजीपतियों के लिए काम करने का आरोप लगाया। आरोपित नहीं। यह इतना स्पष्ट था कि भाजपा का धैर्य टूट रहा था, क्योंकि भाजपा ने न तो मेनका और न ही वरुण गांधी को नवगठित राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल किया था और न ही उन्हें चुनाव प्रचार में कोई कर्तव्य दिया गया था।

वरुण अभी भी बीजेपी में क्यों हैं?
अपने बचाव में, वरुण गांधी कह सकते हैं कि वह नैतिकता की राजनीति करते हैं और नैतिकता पर कोई समझौता स्वीकार नहीं करते हैं। अगर नैतिकता से समझौता उन्हें मंजूर नहीं है, तो फिर क्या वजह है कि वह अभी भी बीजेपी में हैं। उन्हें भाजपा की कोई नीति पसंद नहीं है और न ही वरुण गांधी को अब भाजपा पसंद है। तो क्या वरुण गांधी बीजेपी में सिर्फ इसलिए रह रहे हैं कि उनके सांसद की कुर्सी को चोट न पहुंचे। अगर ऐसा है तो पार्टी की नीतियों के खिलाफ जाकर अनुशासन की हदों को लांघकर पार्टी में बने रहना किस नैतिकता की अहमियत दर्शाता है? विधानसभा चुनाव से मां-बेटे के अलग होने से अब लगने लगा है कि बीजेपी अब किसी काम की नहीं रही और बीजेपी शायद मेनका गांधी और वरुण गांधी को 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट भी न दे।

मेनका का क्या होगा ?
वरुण गांधी अपनी पुश्तैनी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो सकते हैं और उनका वहां बहुत जोश और सम्मान के साथ स्वागत किया जाएगा, क्योंकि वह न तो प्रचार करते हैं और न ही अपने परिवार के खिलाफ कुछ बोलते हैं। वरुण को अपनी बहन प्रियंका गांधी से बहुत लगाव है। और अगर ऐसा होता है, जो काफी संभव है, तो मेनका गांधी का क्या होगा। वह कांग्रेस पार्टी में जाने से दूर रहीं। उन्होंने काफी समय से अपनी भाभी सोनिया गांधी से बात करना भी बंद कर दिया है। ऐसे में वरूण की तो कांग्रेस में एंट्री हो जाएगी लेकिन तब मेनका के राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लग जाएगा।
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