यूपी चुनाव में सियासी दल गढ़ रहे सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला

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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। सभी प्रमुख सियासी दल मतदाताओं को साधने के लिए सियासी गणित भिड़ा रहे हैं। यूपी के मिजाज को समझते हुए सभी दल सोशल इंजीनियरिंग के जरिए मतदाताओं को रिझाने की कवायद में लगे हुए हैं।

akhlesh modi rahul

यूपी की जंग में किसे मिलेगी कामयाबी

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने प्रदेश की जनता का मिजाज समझते हुए सबसे पहले अपने उम्मीदवारों का ऐलान किया। इस सूची में मायावती ने अपने दलित वोटबैंक को साधने के साथ-साथ मुस्लिम वोटरों को भी बसपा से जोड़ने की कवायद की है। यही वजह है कि पार्टी ने 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। बीएसपी की लिस्ट में दलित उम्मीदवारों की संख्या 87 है, पार्टी ने रणनीति के तहत सवर्णों खास कर ब्राह्मण को साधने की कोशिश की है।

समाजवादी पार्टी की बात करें तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन किया है। इसमें सपा 298 और कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। समाजवादी पार्टी की बात करें तो उनका दांव एक बार फिर यादव वोटबैंक पर है, साथ ही मुस्लिम वोटबैंक को एक बार फिर से वो अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। उनकी रणनीति इसी के इर्द-गिर्द बुनी गई है। वहीं कांग्रेस पार्टी यूपी में एक बार फिर से खुद को मजबूत करने की कवायद में जुटी हुई है, इसीलिए पार्टी ने सपा से गठबंधन किया है। उन्हें उम्मीद है कि गठबंधन के बाद उन्हें यादव-मुस्लिम वोटबैंक का साथ तो मिलेगा ही साथ ही अगड़ों के वोट पर भी पार्टी की नजर है। फिलहाल देखना दिलचस्प होगा कि सपा-कांग्रेस गठबंधन को कितना फायदा यूपी चुनाव में मिलेगा।

केंद्र में सत्ता संभाल रही भारतीय जनता पार्टी की नजर भी यूपी की गद्दी पर है इसीलिए पार्टी उम्मीदवारों के चयन को लेकर खास रणनीति बना रही है। बीजेपी की नजर पिछड़े वोटरों के साथ-साथ सवर्ण वोटरों पर है। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की नजर मौर्य और कुशवाहा वोटरों पर है। प्रदेश में 54 फीसदी पिछड़े वर्ग के वोटर हैं। माना जा रहा है कि सोशल इंजीनियरिंग को देखते हुए इसमें सेंध जरूर लगेगी। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी का दांव कितना कामयाब होगा?

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English summary
In UP assembly election political parties are strong social engineering formula.
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