संभल में मंदिर के पास तोड़े जा रहे अवैध निर्माण, 1978 के दंगों के बाद दशकों से बंद पड़ा मंदिर फिर खुला

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक ऐतिहासिक कदम के तहत मंदिर के पीछे अवैध निर्माण को ध्वस्त किया जा रहा है। मंदिर के मालिक मतीन ने निर्माण की अवैधता को स्वीकार करते हुए कहा कि उनके पास निर्माण के लिए कोई स्वीकृत खाका नहीं था। प्रशासन द्वारा अवैध संरचनाओं को हटाने की व्यापक पहल के तहत यह कार्रवाई की जा रही है। पुलिस की सहायता से ध्वस्तीकरण टीम अनाधिकृत क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रही है। मतीन ने भी इन अतिक्रमणों को स्वेच्छा से हटाने की इच्छा जताई और मंदिर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि यह उनके बच्चों से भी अधिक महत्वपूर्ण है।

1978 के दंगों के बाद दशकों तक बंद रहा मंदिर

कार्तिक महादेव मंदिर जो 1978 के दंगों के बाद से बंद पड़ा था। हाल ही में फिर से खोला गया है। बिजली चोरी से निपटने के लिए की गई जांच के दौरान इस मंदिर का पता चला था। इसके बाद 15 दिसंबर को पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ मंदिर के द्वार भक्तों के लिए खोले गए। मंदिर परिसर में अमृत कूप नामक एक प्राचीन कुआं भी मिला है। जो मंदिर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को और बढ़ाता है।

sambhal mandir

जिला मजिस्ट्रेट राजेंद्र पेंसिया ने मंदिर की सुरक्षा को लेकर सीसीटीवी कैमरे लगाने सहित विशेष इंतजाम किए जाने की जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की मदद से मंदिर की आयु का कार्बन डेटिंग के माध्यम से निर्धारण किया जाएगा।

1978 के दंगों की काली छाया और जनसांख्यिकीय बदलाव

मंदिर के फिर से खुलने के साथ ही 1978 के दंगों की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं। ये दंगे संभल के इतिहास का एक काला अध्याय माने जाते हैं। जिसके कारण हिंदू परिवारों को अपना घर और मंदिर छोड़कर क्षेत्र से पलायन करना पड़ा था। इस हिंसा के बाद 45 से अधिक हिंदू परिवारों ने संभल छोड़ दिया था।

इस दौरान हिंदू परिवारों के लिए शरणस्थली बने एक व्यवसायी की हत्या ने हालात को और भी भयावह बना दिया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी विधानसभा में इन दंगों का जिक्र करते हुए हिंसा की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि हिंसा भड़काने और सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने वालों को कठोर परिणाम भुगतने होंगे।

संभल की सांस्कृतिक विरासत का पुनर्निर्माण

संभल में मंदिर का फिर से खुलना न सिर्फ आस्था का प्रतीक है। बल्कि संप्रदायिक सौहार्द और मेल-मिलाप की एक नई उम्मीद को भी जन्म देता है। दशकों के अंधकार के बाद यह मंदिर अब संभल के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि अतीत के सांप्रदायिक संघर्ष के निशान आज भी क्षेत्र में मौजूद हैं और यह घटना एक कठोर सबक के रूप में याद की जाती है।

संभल का यह मंदिर इतिहास, आस्था और सामाजिक एकता के जटिल अंतर्संबंध को दर्शाता है। इसके दोबारा खुलने से क्षेत्र में शांति और सद्भाव की नई शुरुआत की उम्मीद जताई जा रही है।

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