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यूपी चुनावों में भाजपा को बहुमत दिलाने वाले कल्याण सिंह ने कैसे पहुंचाया बड़ा नुकसान?

लखनऊ, 7 दिसंबर। उत्तर प्रदेश में मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में 1991 में भारतीय जनता पार्टी ने 221 सीट जीतकर सरकार बनाई थी। 1989 के यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा ने महज 57 सीटें जीती थीं लेकिन अगले ही चुनाव में पार्टी ने बहुमत लाकर शानदार प्रदर्शन किया। इसके पीछे न सिर्फ राम जन्मभूमि आंदोलन था बल्कि ओबीसी लोध-राजपूत नेता कल्याण सिंह का भी बहुत बड़ा योगदान था। कल्याण सिंह ऐसे नेता थे जिन्होंने कमंडल की राजनीति और मंडल की राजनीति, दोनों को साध लिया और दोनों की ताकत से भाजपा की सरकार यूपी में बनवा दी। कल्याण सिंह ही मुख्यमंत्री भी बने थे। उनके कार्यकाल में ही राम मंदिर आंदोलन ने और ज्यादा जोर पकड़ा। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना उनकी ही सरकार के दौरान हुई थी। कल्याण सिंह को हिंदू हृदय सम्राट भी कहा जाता था। लेकिन जितनी तेजी से वे भाजपा में आगे बढ़े और पार्टी को आगे ले गए, उतनी ही तेजी से राजनीति में वो कमजोर भी पड़ते गए। आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक समय ओबीसी के कद्दावर भाजपा नेता कल्याण सिंह खुद भी डूबे और भाजपा को भी आगे आने वाले चुनावों में नुकसान पहुंचाया।

भाजपा को सवर्णों की पार्टी की पहचान से ऊपर उठाया

भाजपा को सवर्णों की पार्टी की पहचान से ऊपर उठाया

1990 में आरक्षण लागू होने के बाद ओबीसी की एकजुटता का फायदा वीपी सिंह की जनता दल को मिला। ओबीसी वोट की राजनीति को मंडल राजनीति के नाम से जाना जाता है। इसी पार्टी से मुलायम सिंह यादव जैसे नेता निकले थे। 80 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत हुई और 1990 तक आते-आते यह अपने चरम पर आ गया। हिंदुत्व की राजनीति को कमंडल राजनीति कहा जाता है। सितंबर 1990 में राम रथयात्रा लेकर लाल कृष्ण आडवाणी निकल पड़े थे। नवंबर 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में जमा हुए कारसेवकों पर गोली चलवाई थी। मुलायम सिंह यादव भी बड़े ओबीसी नेता थे। हिंदुत्व की लहर पर सवार भाजपा को 1991 में किसी मंडलवादी चेहरे की जरूरत थी। ऐसे में भाजपा में उस समय के चाणक्य कहे जाने वाले गोविंदाचार्य ने लाल कृष्ण आडवाणी को कल्याण सिंह का नाम सुझाया था। इस सोशल इंजीनियरिंग में भाजपा को भारी सफलता मिली और 1991 में कल्याण सिंह की सरकार बन गई थी। 6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद को हिंदू संगठनों और भाजपा के समर्थकों ने गिरा दिया तो उस समय उत्तर प्रदेश पुलिस मूकदर्शक बनी रही थी। इसी उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुलायम सरकार के आदेश पर कारसेवकों पर 1990 में गोली चलाई थी। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कल्याण सिंह हिंदुत्व के भी बड़े चेहरे बन गए। कल्याण सिंह की वजह से भाजपा सवर्णों की पार्टी की पहचान से ऊपर उठी और पिछड़ों के बीच में भी उसने जनाधार बनाया।

1999 में कल्याण सिंह के खिलाफ भाजपा में हुई बगावत

1999 में कल्याण सिंह के खिलाफ भाजपा में हुई बगावत

बाबरी विध्वंस के बाद कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था और 1993 के चुनाव में मुलायम की सपा और कांशीराम की बसपा ने साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में भी कल्याण सिंह ही भाजपा के चेहरे थे लेकिन मुलायम-कांशीराम के गठबंधन ने बहुमत नहीं पाने दिया हलांकि 177 सीटों के साथ भाजपा ही बड़ी पार्टी बनी थी। सपा-बसपा ने अन्य दलों के समर्थन से सरकार बना ली जो 1995 के गेस्ट हाउस कांड तक चली। इसके बाद कल्याण सिंह ने भाजपा हाईकमान को बसपा का समर्थन लेने पर राजी किया और पहले छह महीने के लिए मायावती मुख्यमंत्री बन गईं। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद मायावती ने समर्थन वापस ले लिया था और सरकार गिर गई थी। नरेश अग्रवाल के नेतृत्व में कांग्रेस से टूटे विधायकों ने फिर से कल्याण सिंह की सरकार बनवा दी थी। लेकिन कल्याण सिंह दो साल 52 दिन तक ही मुख्यमंत्री रह पाए। कल्याण सिंह के खिलाफ कई भाजपा विधायक और नेता आवाज उठाने लगे। उनको बदलने की मांग करने लगे। नवंबर 1999 में कल्याण सिंह को हटाकर भाजपा ने राम प्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री बना दिया। आइए पहले यह जानते हैं कल्याण सिंह को क्यों सीएम पद से हटाया गया?

वाजपेयी से तनातनी में कल्याण और भाजपा दोनों का हुआ नुकसान

वाजपेयी से तनातनी में कल्याण और भाजपा दोनों का हुआ नुकसान

अटल बिहारी वाजपेयी और कल्याण सिंह के बीच तनातनी 1996 के यूपी चुनाव के बाद शुरू हुई थी। पहले मायावती छह महीने के लिए मुख्यमंत्री रहीं, फिर जब कल्याण सिंह की बारी आई तो वे मायावती के लिए फैसलों को पलटने लगे। इससे दोनों पार्टियों के बीच तनाव बढ़ा और मायावती ने अक्टूबर 1997 में समर्थन वापस ले लिया। मायावती से रिश्ते की खटास का असर केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर पड़ा। 1999 में लोकसभा में विश्वास मत के दौरान बसपा ने वाजपेयी सरकार के खिलाफ मत दिया था। उस समय भाजपा ने मायावती को पक्ष में मत देने के बदले उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाने तक की पेशकश की थी। वाजपेयी सरकार गिरने के बाद लोकसभा चुनाव हुए और इसमें उत्तर प्रदेश में भाजपा सिर्फ 29 सीटें जीत पाईं। इसके पीछे वजह बने कल्याण सिंह जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ काम किया था। कहा जाता है कि कल्याण सिंह ने समर्थकों से कहा था कि प्रधानमंत्री बनने से पहले वाजपेयी को सांसद बनकर दिखाना चाहिए। 1999 लोकसभा चुनाव में यूपी में खराब प्रदर्शन करने वाली भाजपा के भीतरखाने में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के खिलाफ मोर्चा खुल गया। कल्याण सिंह का आरोप था कि वाजपेयी के शह पर उनके समर्थक विधायक विरोध कर रहे हैं। कल्याण सिंह को केंद्र में कृषि मंत्री बनाने का ऑफर पार्टी ने दिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को कहा। कल्याण सिंह ने पार्टी का प्रस्ताव मानने से इनकार दिया। इसके बाद उनसे पार्टी ने इस्तीफा लिया। कल्याण सिंह ने पार्टी में अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी। इस पर भाजपा ने कल्याण सिंह को 6 साल के लिए पार्टी ने निकाल दिया। पार्टी से निकलकर कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई। कल्याण सिंह ने 2002 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाया। राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लड़ी पार्टी 88 सीटों पर सिमट गई थी।

मुलायम से मिलकर कल्याण ने भाजपा को यूपी में गिराया

मुलायम से मिलकर कल्याण ने भाजपा को यूपी में गिराया

2002 के विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी ने चार सीटों पर जीत हासिल की। पहले तो मायावती को समर्थन देकर भाजपा ने सरकार बनवा दी लेकिन यह ज्यादा समय तक चल नहीं पाई। 2003 में भाजपा ने पर्दे के पीछे से समर्थन दिया और मुलायम की सरकार बनी जिसमें राष्ट्रीय क्रांति पार्टी भी शामिल थी। 2004 में कल्याण सिंह फिर भाजपा में वापस आए। 2004 के लोकसभा चुनाव में कल्याण सिंह सांसद बने और 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में उनको भाजपा ने फिर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया। लेकिन कल्याण सिंह के पास उतनी ताकत नहीं बची थी जितनी उनके पास 1991 में थी। सियासत में वो 2007 तक आते-आते काफी कुछ गंवा चुके थे और रही-सही कसर 2009 में मुलायम सिंह के साथ ने पूरी कर दी। 2007 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 47 सीट मिली थी। 2009 में कल्याण सिंह ने पार्टी में उपेक्षा का आरोप लगाकर भाजपा छोड़ दी और मुलायम सिंह के साथ हो लिया। 2009 में मुलायम की मदद से कल्याण सिंह निर्दलीय सांसद बने लेकिन चुनाव के बाद मुलायम को लगा कि कल्याण की वजह से मुस्लिम वोटबैंक उनसे दूर जा रहा है। मुलायम ने कल्याण का साथ छोड़ दिया। 2013 में भाजपा में कल्याण सिंह की पार्टी का विलय हुआ और इस बार वापसी के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी ने उनको मैदान में उतारा। 2014 के चुनाव में भाजपा ने यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 71 पर जीत दर्ज की। कल्याण सिंह के राजनीतिक सफर की चर्चा कुसुम राय के बिना अधूरी होगी। कुसुम राय कल्याण सिंह को पिता समान मानते थे। लेकिन कल्याण सिंह के शासनकाल में कुसुम राय इतनी प्रभावशाली हो गई थी कि 1999 के दौर में भाजपा नेताओं ने इसकी शिकायत आलाकमान से की थी। यही वह दौर था जब कल्याण सिंह को सीएम की कुर्सी से उतारकर भाजपा से निकाला गया था।

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