Ghosi Election Result: उपचुनाव से दूर रहीं मायावती को घोसी के नतीजों ने कैसे दिया डबल झटका?
Ghosi ka result: उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की घोसी सीट का सियासी घमासान अब थम चुका है और भाजपा प्रत्याशी दारा सिंह चौहान को हराकर समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह विधानसभा पहुंच गए हैं।
घोसी उपचुनाव में बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था और अपील की थी कि पार्टी के वोटर्स या तो घर बैठें या फिर नोटा का बटन दबाएं। लेकिन, मायावती की इस अपील का असर होता नहीं दिखा और उन्हें इस उपचुनाव से दो बड़े झटके लगे।

शुक्रवार को जब घोसी सीट पर 33 राउंड की गिनती पूरी हुई, तो सुधाकर सिंह के खाते में 124427 और दारा सिंह चौहान को 81668 वोट मिले। नोटा का बटन दबाने वाले मतदाताओं की संख्या महज 1725 थी। इनके अलावा घोसी के सियासी मैदान में 8 प्रत्याशी और थे, जिनमें पीस पार्टी के सनाउल्लाह को सबसे ज्यादा 2570 वोट मिले। ऐसे में साफ तौर पर कहा जा सकता है कि घोसी में मुकाबला दो तरफा ही था और दलित मतदाताओं में मायावती की अपील का असर नहीं दिखा।
पहला झटका- दलित वोटर्स को समेटने की कोशिश नाकाम
2022 के विधानसभा चुनाव में घोसी से सपा के टिकट पर, भाजपा छोड़कर आए दारा सिंह चौहान ही लड़े थे और उन्हें 42.21 फीसदी वोट शेयर के साथ 108430 वोट मिले। भाजपा ने यहां से विजय राजभर को उतारा था, जिनके पक्ष में 33.57 फीसदी वोट शेयर के साथ 86,214 वोट पड़े। तीसरे नंबर पर बीएसपी थी, जिसके प्रत्याशी वसीम इकबाल को 21.12 फीसदी वोट शेयर और 54,248 वोट मिले।
2023 में ये तस्वीर पूरी तरह से बदल गई। इस बार सपा के खाते में 57.19 फीसदी और भाजपा को 37.54 फीसदी वोट शेयर मिला। मायावती ने अपने वोटर्स से नोटा दबाने की अपील की थी, लेकिन नोटा के हिस्से में केवल 0.79 फीसदी वोट शेयर गया। संकेत साफ है कि दलित वोटर्स बड़ी संख्या में साइकिल का बटन दबाकर आए।
2019 के लोकसभा चुनाव में जब बीएसपी और समाजवादी पार्टी को उम्मीद के मुताबिक सीटें नहीं मिलीं, तो मायावती ने गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया। उस समय दलित वोटर्स का एक हिस्सा गठबंधन टूटने से नाराज था और उसकी सहानुभूति अखिलेश यादव की तरफ थी। तभी से, मायावती लगातार अपने परंपरागत दलित मतदाताओं को समेटने में जुटी थीं, लेकिन घोसी में उनकी इस कोशिश को एक झटका लगा।
दूसरा झटका- घोसी के समीकरण 2024 के लिए खतरे की घंटी
घोसी में जो समीकरण बने, वो मायावती के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर भी खतरे की घंटी हैं। घोसी सीट पर दलित और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है, जो 90 हजार से 1 लाख के बीच बताई जा रही है। सियासी जानकारों के मुताबिक, 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर्स बड़ी संख्या में समाजवादी पार्टी के साथ गए थे, लेकिन जब अखिलेश यादव भाजपा को रोकने में नाकाम रहे तो इस वर्ग में एक निराशा थी कि अब वो किस पार्टी के साथ जाएं।
2022 के नतीजों के बाद खुद मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बात को स्वीकारा कि इस चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने सपा को वोट दिया, लेकिन समाजवादी पार्टी इसके बावजूद भाजपा को नहीं रोक पाई। इसके बाद से ही मायावती का पूरा ध्यान इस बात पर था मुस्लिम वोटर्स में ये भरोसा पैदा किया जाए कि भाजपा को केवल बहुजन समाज पार्टी ही रोक सकती है। घोसी के नतीजे बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता 'इंडिया' गठबंधन के साथ गए हैं। वोटिंग वाले दिन खुद सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने कहा कि अगर मुस्लिम मतदाताओं को वोट डालने से नहीं रोका गया तो समाजवादी पार्टी बहुत बड़ी जीत हासिल करेगी।
ऐसे में स्वाभाविक है कि मायावती के लिए घोसी के समीकरण खतरे की घंटी हैं। लोकसभा चुनाव में महज 6 महीने का वक्त बचा है और घोसी की जीत से अखिलेश यादव ने इशारा कर दिया है कि यूपी में भाजपा को रोकने के लिए 'इंडिया' गठबंधन एक मजबूत विकल्प है। आमतौर पर कहा जाता है कि मुस्लिम मतदाता भाजपा को हराने में सक्षम पार्टी के साथ ही जाता है। और, करीब 19 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले यूपी में अगर इंडिया गठबंधन भाजपा का विकल्प बनता है तो मायावती की चिंताएं बढ़ना तय है।












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