यूपी चुनाव 2022 के लिए अखिलेश यादव ने खुद को कितना बदला? ये समीकरण बिठाकर भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बने टीपू
लखनऊ, 30 नवंबर। अखिलेश यादव को राजनीति विरासत में मिली जरूर है लेकिन वर्ष 2000 में कन्नौज क्षेत्र से लोकसभा उपचुनाव में सांसद चुने जाने के बाद से अब तक 21 साल का राजनीतिक अनुभव ले चुके हैं। पिता मुलायम की जीती हुई सीट से ही वे सांसद चुने गए थे। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव 2012 के विधानसभा चुनाव में उतरे थे। पांच साल के मायावती शासन के बाद फिर से चुनाव हो रहे थे और मुलायम ने बेटे अखिलेश पर दांव लगाया था। 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर कमाल कर दिया और इसका श्रेय अखिलेश यादव को गया। इसके बाद से अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश की राजनीति में ही जमे हुए हैं। अखिलेश यादव 2012 और 2017 का चुनाव देख चुके हैं। 2017 में कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़े गए चुनाव का अनुभव अखिलेश के लिए अच्छा नहीं रहा। भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला और कांग्रेस खुद सात सीटें हासिल कर पाई। सपा भी 47 सीटों पर सिमट गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती की बसपा के साथ गठबंधन का अनुभव तो अखिलेश यादव के लिए और भी बुरा रहा। मायावती जीरो सीट से लोकसभा में 10 सीट पर पहुंच गई जबकि सपा के खाते में वही पांच सीट आई। 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश नए जोश और नई रणनीति के साथ मैदान में उतरे हैं। पिछले अनुभवों से मिले कड़वे सबक का असर उनके फैसलों पर साफ दिख रहा है। पिछले तीन चुनावों से भी साफ दिख रहा है कि यूपी की जनता ने खंडित जनादेश नहीं दिया, जिसको जिताया बहुमत से जिताया चाहे वो सपा हो, बसपा या फिर भाजपा। आइए 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगे अखिलेश यादव की रणनीतियों पर नजर डालते हैं और जानते हैं कि पिछले चुनावों की अपेक्षा वे कितने बदले हैं?

2022 के लिए अखिलेश कर रहे छोटे दलों से गठजोड़
2012 का विधानसभा चुनाव तो अखिलेश यादव ने अपने दम पर लड़ा था लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राहुल गांधी का हाथ थामकर उन्होंने इस साथ को आजमाया था। नतीजा अच्छा नहीं रहा लेकिन उसी 2017 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने समुदाय आधारित छोटे दलों के साथ गठबंधन बनाया था। छोटे दलों के साथ गठबंधन की रणनीति पूर्वांचल के कई सीटों पर जीत-हार तय करने में अहम है। भाजपा ने यही तीर छोड़कर पूर्वांचल की कई सीटों पर जीत का निशाना भेदा था। इस बार अखिलेश भी भाजपा के नक्शेकदम पर चलते हुए अकेले ही छोटे दलों को साथ लेकर चलने की कवायद कर रहे हैं। ओम प्रकाश राजभर इस बार सपा के साथ हैं। सुभासपा समेत सात दलों के साथ सपा का गठबंधन हो चुका है। अभी तीन-चार और दल भी सपा के साथ आ सकते हैं। सीटों के बंटवारे की चुनौती अखिलेश के सामने होगी लेकिन इस बार वो पूर्वांचल में भाजपा के ही तीर से कमल को मात देने की रणनीति पर चल रहे हैं। छोटे दलों के जरिए ही बड़ी पार्टियों के वोटबैंक में सेंध लगाया जा सकता है।

अखिलेश के भाषणों में सिर्फ भाजपा पर निशाना, विकास की बात
अखिलेश यादव अपने चुनावी अभियानों में भाजपा की योगी सरकार पर लगातार निशाना साध रहे हैं। कांग्रेस या मायावती पर अखिलेश अपने भाषणों में कुछ नहीं कहते हैं। ऐसा लग रहा है कि अखिलेश मान रहे हैं कि इस बार उनका मुकाबला सिर्फ भाजपा से है। योगी सरकार की आलोचना करते हुए वे अपनी सरकार में किए गए कामों को गिनाते हैं। वे दावा करते हैं कि भाजपा सरकार उनके किए गए कामों का उद्घाटन कर रही है। किसान समस्या, बेरोजगारी, नोटबंदी, कोरोना संकट समेत अन्य मसलों को वे भाषण में उठाते हैं और योगी सरकार की खामियों को गिनाते हैं। 2007, 2012 और 2017 के चुनाव में यूपी की जनता का वोट किसी एक पार्टी की तरफ झुकता नजर आता है। 2017 में बसपा सिर्फ 19 सीटें जीत पाई थी। कांग्रेस के खाते में 7 सीटें हैं। कांग्रेस के निशाने पर भी इस बार मुख्य रूप से भाजपा ही है। अखिलेश को उम्मीद है कि भाजपा से छिटके वोटर उनकी पार्टी की तरफ झुक सकते हैं। साथ ही, अगर किसी एक पार्टी को बहुमत देने के लिए अगर जनता भाजपा के अलावा किसी को विकल्प चुनेगी तो वो सपा ही है।

'बुआ' से दूरी, चंद्रशेखर के नजदीक गए अखिलेश
उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा आगे भविष्य में साथ आएगी, इसके आसार कम ही नजर आते हैं। वैसे भी मायावती और बसपा के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं। एक समय में मायावती देश और प्रदेश की बहुत बड़ी ताकत थीं लेकिन आज उनके वोट बैंक पर दावेदारी करने के लिए भीम आर्मी नेता और आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रेशखर उभर आए हैं। उत्तर प्रदेश में दलित नेता के तौर पर चंद्रशेखर आजाद ने अपनी पहचान बनाई है। अखिलेश और चंद्रशेखर के बीच गठबंधन की चर्चा जोरों पर है। पूर्वांचल को साधने के लिए अखिलेश छोटे दलों के सहारे हैं तो वहीं वे पश्चिमी यूपी को साधने के लिए रालोद के जयंत चौधऱी और चंद्रेशखर आजाद के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। जाट-मुस्लिम-दलित का समीकरण अगर अखिलेश बिठा ले जाते हैं तो पश्चिमी यूपी में सपा को लाभ मिल सकता है। किसान आंदोलन की वजह से जाट-मुस्लिम एक मंच पर आ गए हैं और मुजफ्फरनगर दंगे की कड़वाहट अब कम होती नजर आ रही है। जाट वोटबैंक से भाजपा को 2017 के चुनाव में बड़ा फायदा मिला था।

जिन्ना को स्वतंत्रता सेनानी बताकर मुस्लिमों को दिया मैसेज
अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव राम मंदिर आंदोलन के दौरान 1990 में अयोध्या में जमा हुए कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश देकर मुस्लिमों के नेताजी बन गए थे। मुलायम के नाम के आगे मुल्ला लगाया जाने लगा था। सपा के मुस्लिम वोटबैंक को ध्यान में रखते हुए ही अखिलेश यादव ने सरदार पटेल की जंयती पर हरदोई में जनसभा को संबोधित करते हुए मोहम्मद अली जिन्ना का नाम लिया था और उनको स्वतंत्रता सेनानी बताया था। इसके बाद भाजपा ने अखिलेश पर फिर से मुस्लिम तुष्टिकरण करने का आरोप लगाया। अखिलेश एक बार फिर से पिता की राह पर चलते हुए एक तरफ दलित-पिछड़ा-मुस्लिम समीकरण साधने में जुटे हैं तो इस बार वे विकास के मुद्दों को भी अपने एजेंडे में रखे हुए हैं।

मुलायम और परिवारवाद की छवि से निकलने की कवायद
कहा जाता है कि 2016-17 में मुलायम की विरासत को लेकर शिवपाल और अखिलेश के बीच हुई राजनीतिक उठापटक के बाद अखिलेश की छवि को धक्का लगा था। भाजपा नेता तो कहते ही रहे जो अपने बाप-चाचा का नहीं हुआ, वो किसी का नहीं हो सकता। यहां तक कि यही बात मुलायम ने भी कह दी थी। 2012 के चुनाव में जब अखिलेश को जनता की तरफ से भारी समर्थन मिला था तब इस युवा नेता ने समाजवादी पार्टी को मुलायम की छवि से मुक्त किया था। दरअसल मुलायम की समाजवादी पार्टी परिवारवाद, अपराधियों को संरक्षण देने, भ्रष्टाचार और एक जाति को बढ़ावा देने के लिए बदनाम हुई थी। अखिलेश सपा को मुलायम से आगे ले गए। अखिलेश अपने भाषणों में जनता के सामने अपने पांच साल के शासन में किए कामों को गिनाते हैं और यूपी की राजनीति में पिछले दस सालों में ही वो ऐसी जगह बना चुके हैं जहां अगर किसी वजह से भाजपा चूक गई तो सत्ता अखिलेश के पास ही आएगी।












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