UP BJP के नए चीफ भूपेंद्र सिंह को साबित करनी होगी अपनी "चौधराहट", सामने खड़ी हैं ये 5 बड़ी चुनौतियां
लखनऊ, 25 अगस्त: विधानसभा चुनाव के बाद से ही यूपी बीजेपी में बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी। चुनाव बीतने के बाद अब बीजेपी आलाकमान ने मिशन 2024 के लिहाज से ओवरहालिंग करने का काम शुरू कर दिया है। संगठन मंत्री की विदाई के बाद पश्चिम के जाट नेता भूपेंद्र सिंह चौधरी को बीजेपी की कमान देने के पीछे मकसद जो भी हो लेकिन उनके सामने चुनौतियों भी कम नहीं हैं। भूपेंद्र को अपनी चौधराहट दिखानी है तो इन चुनौतियों से पार पाना ही होगा। आइए हम आपको बताते हैं कि वो कौन सी पांच चुनौतियां हैं जो बीजेपी के नए बॉस का इंतजार कर रही हैं।
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बीजेपी के 75 प्लस सीटों के टारगेट को पूरा करना
उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नए बॉस के सामने पहली चुनौती पार्टी के 75 प्लस सीटों के टारगेट को पूरा करना है। कुछ दिनों पहले ही लखनऊ में बीजेपी कार्यसमिति की बैठक हुई थी जिसमें सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस बात को दोहराया था कि यूपी में केंद्र और राज्य सरकार की लोककल्याण कारी नीतियों को जन जन तक पहुंचाकर ही इस लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है। बीजेपी के पास यूपी में अभी 66 सीटें हैं जिनको आगे लेकर जाना भूपेंद्र के लिए बड़ी चुनौती होगी। भूपेंद्र के सामने पहले ही ऐसे कीर्तिमान बन चुके हैं कि उनको बरकरार रखने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी।

गुटबाजी के बीच संगठन को आगे लेकर जाने की चुनौती
यूपी बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद अक्सर ऐसा देखा जाता है कि संगठन मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच तालमेल का आभाव होता है। दोनों अपनी समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में अपनी सूझबूझ से इन कमियों को दूर करना होगा। 2014 में सुनील बंसल जब संगठन मंत्री बनकर आए थे तब लक्ष्मीकांत वाजपेयी यूपी के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। उस समय दोनों के बीच खींचतान की खबरें मीडिया की सुर्खियां बनी थी। इसके बाद बंसल के ही समय में जब स्वतंत्रदेव सिंह बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बने तो अंदरूनी खींचतान देखने को मिली थी। पिछले इतिहास पर भी उनको नजर रखनी होगी।

नगर निगम चुनाव में बीजेपी को जीत दिलाने की जिम्मेदारी
यूपी में बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भूपेंद्र के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी नगर निगम के चुनाव में बीजेपी को जीत दिलाने की है। नगर निगम चुनाव में बीजेपी के सामने पुराने प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती होगी। यूपी में नगर निगम के चुनाव 2024 लोकसभा चुनाव के लिए सेमीफाइनल ही साबित होगा। इस चुनाव में सपा, बसपा के साथ ही इस बार आम आदमी पार्टी और एनसीपी भी अपने हाथ आजमाएगी इसलिए बीजेपी के सामने चुनौती पहले से ज्यादा बड़ी होगी।

संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाना
भूपेंद्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन और सरकार के बीच तालमेल बनाना है। अक्सर ऐसा देखा जाता है सरकार और संगठन के बीच तलवारें खिंची रहती है। यूपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयानों पर नजर डालें तो यह साफतौर पर दिखा कि संगठन और सरकार के बीच कितनी बड़ी लकीर खींची हुई है। इस लकीर को समाप्त कर सरकार के साथ तालमेल बनना और कार्यकताओं के हितों का ख्याल रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज कहते हैं कि भूपेंद्र के पास काफी लंबा सांगठनिक अनुभव है इसलिए ऐसी उम्मीद है कि वह संगठन को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे और उसकी बेहतरी के लिए काम करेंगे।

जाट बेल्ट में अपनी चौधराहट का करिश्मा दिखाना
भूपेंद्र चौधरी मुरादाबाद के रहने वाले हैं। ऐसा कहा जाता है कि पश्चिम यूपी में हुए किसान आंदोलन के दौरान उन्होंने खाप पंचायतों को साधने में काफी मदद की। भूपेंद्र सिंह की जाट बिरादरी में काफी अच्छी पकड़ मानी जाती है। लेकिन भूपेंद्र के सामने चुनौती पश्चिम में बने आरएलडी और सपा के बीच बने गठबंधन का असर कम करने की है। इस गठबंधन को बेअसर करने के लिए भूपेंद्र चौधरी को काफी मेहनत करनी होगी। बीजेपी ने उनको यह जिम्मेदारी यह सोचकर भी दी है कि जाट बहुल ऐसी सीटें जो पिछली बार बीजेपी के हाथ से निकल गईं थीं उन्हें दोबारा जीतना होगा तभी यूपी में बीजेपी के 75 प्लस का टारगेट पूरा हो पाएगा।












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