आजमगढ़ से धर्मेंद्र यादव नहीं लड़ना चाहते थे चुनाव ?, जानिए सपा-बसपा-बीजेपी में कैसे होगी टक्कर ?
लखनऊ, 06 जून: उत्तर प्रदेश में दो लोकसभा सीटों आजमगढ़ और रामपुर में उपचुनाव होना है। इसमें भी आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। एक तरह से कहें कि अखिलेश की छोड़ी हुई सीट पर ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि उनकी पत्नी डिंपल यादव चुनाव लड़ेंगी लेकिन समाजवादी पार्टी के सूत्रों की माने तो डिंपल का नाम अंत में इसलिए हटा लिया गया क्योंकि सपा मुखिया अखिलेश यह मानते थे कि कहीं आजमगढ़ सीट हाथ से निकल गई और डिंपल हार गईं तो सीधेतौर पर अखिलेश पर इसकी जिम्मेदारी होगी। इसीलिए बीच का रास्ता निकालकर धर्मेंद्र यादव को वहां से उतारा गया था। हालांकि एक दिन पहले तक धर्मेंद्र यादव इस सीट से लड़ने के लिए तैयार नहीं थे लेकिन अखिलेश जिद्द के बाद उनको मैदान में उतरना पड़ा।

2019 में गठबंधन कर चुनाव लड़ने वाली सपा-बसपा आमने सामने
समाजवादी पार्टी ने पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव को चुनावी मैदान में उतारा है। बीजेपी (BJP) ने दिनेश लाल यादव और बसपा ने गुड्डू जमाली को मैदान में उतारा है। जिसके बाद उपचुनाव का सियासी गणित बदल गया है। खास बात यह है कि लोकसभा चुनाव 2019 में गठबंधन करने वाली सपा और बसपा इस बार के उपचुनाव में आमने-सामने हैं, वहीं बीजेपी की जोरदार एंट्री ने मामले को दिलचस्प बना दिया है। आजमगढ़ (आजमगढ़) को सपा का गढ़ कहा जाता है और इस बार सपा को वहां कड़ी चुनौती मिल रही है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी ने अंतिम समय में इस सीट के लिए प्रत्याशी के नाम की घोषणा कर दी। क्योंकि सपा अध्यक्ष को पता है कि इस बार राह आसान नहीं है।

दलित मुस्लिम समीकरण ने दी यादव मुस्लिम को टक्कर
आजमगढ़ सीट पर वोटों की संख्या पर नजर डालें तो यहां करीब साढ़े 19 लाख मतदाता हैं, जिनमें से 50 प्रतिशत यादव और मुसलमान हैं। यादवों की जिले में सबसे बड़ी आबादी है और वे 26 प्रतिशत हैं जबकि मुसलमान 24 प्रतिशत आबादी के साथ दूसरे नंबर पर हैं। यहां 17 फीसदी सवर्ण और 20 फीसदी दलित हैं। इसके अलावा करीब 13 फीसदी गैर यादव हैं। इसलिए यहां बसपा दलित मुस्लिम और सपा यादव और मुस्लिम समीकरण के दम पर चुनाव जीतती रही है। लेकिन भाजपा ने सवर्ण, पिछड़े वर्ग और दलित वोट बैंक वाले यादवों के माध्यम से चुनाव में प्रवेश किया है। इसलिए पार्टी ने एक बार फिर दिनेश लाल यादव निरहुआ पर दांव लगाया है।

जमाली ने मुलायम सिंह को दी थी कड़ी टक्कर
हालांकि, 2014 का लोकसभा चुनाव आजमगढ़ से सपा संरक्षक मुलायम सिंह ने जीता था। लेकिन इस चुनाव में बसपा के गुड्डू जमाली ने उन्हें कड़ी टक्कर दी। इसलिए बीएसपी ने एक बार फिर जमाली को मैदान में उतारा है। ताकि इस बार वह सपा को कड़ी टक्कर दे सकें। आजमगढ़ को लेकर राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सपा और बसपा की लड़ाई में बीजेपी को फायदा मिल सकता है। राज्य में बीजेपी सत्ता में है और उसे इसका फायदा मिल सकता है।

निरहुआ के लिए बीजेपी ने तैयार की रणनीति
दरअसल लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी ने आजमगढ़ लोकसभा सीट से दिनेश लाल यादव निरहुआ को मैदान में उतारा था और उन्हें अखिलेश यादव ने 2,59,874 वोटों से हराया था। इस चुनाव में अखिलेश यादव को 6,21,578 वोट और दिनेश लाल यादव निरहुआ को 3,61,704 वोट मिले थे। लेकिन उस समय सपा और बसपा का गठबंधन था। इसलिए बीजेपी इस बार निरहुआ के जरिए सपा के यादव वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है। जबकि जमाली के जरिए बसपा मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाएगी।

बसपा के आने से सपा का चुनावी गणित बिगड़ा
आजमगढ़ लोकसभा सीट पर ज्यादातर सपा का कब्जा था। लेकिन इस सीट पर बसपा ने कई बार सपा को कड़ी टक्कर भी दी। अब बीजेपी भी इस सीट पर दावा पेश करने जा रही है। बीजेपी ने दिनेश लाल यादव निरहुआ को टिकट दिया है जबकि लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें सपा प्रत्याशी अखिलेश यादव ने 2.59 लाख वोटों से हराया था. उस समय सपा के साथ बसपा का भी वोट बैंक था। वहीं इस बार उपचुनाव में बसपा सपा के खिलाफ मैदान में है। जिससे सपा का गणित बिगड़ गया है। खासकर बसपा मुस्लिम वोट बैंक पर सेंध लगाने की तैयारी में है और बसपा ने यहां से गुड्डू जमाली को टिकट दिया है। आजमगढ़ के अब तक के राजनीतिक गणित पर नजर डालें तो यहां जीत पर यादव-मुस्लिम और दलित-मुस्लिम समीकरण हावी रहे हैं। जिससे सपा यहां पांच बार और बसपा चार बार चुनाव जीत चुकी है। राज्य की सत्ताधारी भाजपा को उम्मीद है कि वह 2009 की जीत को एक बार फिर दोहराएगी। यह सीट पूर्व सांसद रमाकांत यादव ने बीजेपी के टिकट पर जीती थी।












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