पुराने तेवर में लौटेगी बसपा, मुस्लिम-जाटवों पर फोकस, नई सोशल इंजीनियरिंग में जुटीं मायावती
लखनऊ, 27 अप्रैल: उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के समाजवादी पार्टी और खासकर इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से नाराजगी की बातें आम हो चुकी हैं। पार्टी के कई मुस्लिम नेताओं ने अपनी भावनाएं खुलकर जाहिर भी की हैं। सपा की इस मुश्किल घड़ी में बहुजन समाज पार्टी को अपने लिए बड़ी उम्मीद दिख रही है। पार्टी के पास फिलहाल यूपी की राजनीति ने में खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं बचा है। उसे लगता है कि अगर वह अपने पुरानी रणनीति पर ही फिर से काम करे तो 2024 के लोकसभा चुनाव तक वह भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभर सकती है। हाल के दिनों में मायावती ने कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिससे यही संकेत मिल रहा है कि पार्टी ने गंभीरता से अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने की कोशिशें शुरू कर दी हैं और आने वाले दिनों में इसमें काफी कुछ बदलाव देखने को मिल सकता है।

बसपा ने नई रणनीति पर काम शुरू किया
2007 में बसपा ने यूपी में 30 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किया था और यूपी विधानसभा की 403 में से 206 सीटें जीतकर पार्टी सुप्रीमो मायावती पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनी थीं। तब मायावती ने दलित-मुस्लिम वोट को अपने साथ किया था और काफी तादाद में ब्राह्मणों ने भी उन्हें समर्थन दिया था। लेकिन, उसके बाद बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ लगातार गिरा है और 2022 के चुनाव में तो पार्टी वोट शेयर (12.8%) के मामले में सिर्फ कांग्रेस से आगे रह गई है। 2012 में इसे 80, 2017 में 19 और इस बार सिर्फ 1 सीट मिली हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में 10 सीटें तब आई थी, जब मायावती ने सारी पुरानी कड़वाहट भुलाकर सपा के साथ गठबंधन किया था। यानी मायावती के लिए अब खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा है, और इसलिए उनकी पार्टी ने नए सिरे से नई रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है।

पुराने जाटव और मुस्लिम नेताओं की वापसी
इसी कड़ी में वे नेता जो पार्टी से निकाले गए थे या जो बसपा छोड़कर गए थे उनमें से कुछ नेताओं को मायावती ने फिर से पार्टी में शामिल किया है। इनमें कुछ प्रमुख नाम हैं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री मुकेश जाटव, शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली, रामप्रसाद प्रधान और पूर्व विधायक वहाब चौधरी। सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में कुछ और पुराने और बड़े नाम हाथी की सवारी करते दिख सकते हैं। गुड्डू जमाली को बीएसपी ने आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है। ये मुसलमान नेताओं में बड़ा नाम हैं (प्रॉपर्टी के मामले में भी)। यह सीट सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के इस्तीफे की वजह से खाली हुई है, जो मैनपुरी के करहल से विधायक बनने के बाद विधानसभा में विपक्ष के नेता बने हैं।

बसपा संगठन में भी बदलाव शुरू
इसी तरह बीएसपी संगठन में भी मायावती ने कुछ पुराने दलित और मुस्लिम नेताओं को नियुक्त किया है। आने वाले दिनों में ऐसी नियुक्तियों की तादाद बढ़ने की संभावना है। दरअसल, यूपी में 22 फीसदी दलित और मुसलमानों के समर्थन ने 2007 में बसपा को 30 फीसदी से ज्यादा वोट तक पहुंचाने में प्रमुख भूमिका निभाई थी और समाजवादी पार्टी से मुसलमानों की कथित नाराजगी की वजह से मायावती फिर से पुरानी स्थिति हासिल करने का बहुत बड़ा मौका देख रही हैं।

ओवैसी के साथ भी हो सकती है बात?
मायावती की बदली रणनीति के बारे में एक सूत्र ने बताया कि 'बसपा, ओवैसी के साथ भी चली जाए तब भी उसका वोटर रुका रहेगा। गुड्डी जमाली मुलायम से भी बहुत कम वोटों से हारे थे, तब सपा की सरकार थी। वह बहुत मजबूत उम्मीदवार हैं। अगर मुस्लिम देखेगा कि मायावती अपने पुराने तेवर में लौट चुकी हैं और दलित-मुस्लिम गठबंधन फिर से मुमकिन है तो वह 2024 में उनके साथ जा सकता है। इस बार अच्छे से लड़कर हारने वालों को भी प्रभारी बनाया जा रहा है। जिनमें ज्यादातर मुस्लिम हैं।'

सपा से मुसलमानों की नाराजगी में अवसर
दरअसल, समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे और पूर्व मंत्री आजम खान की पार्टी खासकर अखिलेश यादव से नाराजगी के किस्से अब आम हो चुके हैं। यही नहीं, पार्टी एमएलए शहजिल इस्लाम के पेट्रोल पंप पर जिस तरह से बुलडोजर चला है, उसपर अखिलेश यादव की चुप्पी ने भी मुसलमानों को निराश किया है। जानकार मानते हैं कि इस बार यूपी में मुसलमानों ने जिस तरह से अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट दिया था, वैसा कभी नहीं हुआ। लेकिन, फिर भी सपा हार गई। सूत्र का कहना है कि 'आजम खान, पेट्रोल पंप जैसे मुद्दों से मुस्लिमों के गढ़ माने जाने वाले रामपुर, मुरादाबाद और सहारनपुर में अखिलेश के खिलाफ मुसलमानों में नाराजगी है।' कहा जाता है कि चुनाव के दौरान भी अखिलेश इमरान मसूद या दूसरे मुस्लिम चेहरों से खुद को दूर रखना चाहते थे, जो बात मुसलमानों को पसंद नहीं आई। हालांकि, उन्होंने फिर भी वोट दिया, लेकिन अब वह हताश और निराश हो रहे हैं और विकल्प तलाशने के मूड में हैं। बीएसपी इसी में अवसर देख रही है।

जाटव वोटरों पर है फोकस
कहते हैं कि पसमांदा मुसलमान यूपी में समाजवादी पार्टी के कट्टर वोटर रहे हैं। लेकिन, कहा जा रहा है कि यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने इन्हें बीजेपी की ओर भी आकर्षित करना शुरू किया है। सपा के लिए यह दोहरी मार से कम नहीं है। मायावती को भी इसके चलते अपने कोर जाटव वोटर की चपत लगी है;और इसलिए मुसलमानों के अलावा उनका मूल फोकस उन्हीं पर है। यूपी में 22 फीसदी अनुसूचित जातियों में से करीब 12-13 फीसदी आबादी जाटवों की ही बताई जाती है। हालिया चुनाव में सिर्फ 12.8% वोट मिलना ही सबूत है कि मायावती का कोर वोटर भी उनके हाथ से फिसल चुका है। इनके बारे में कहा जा रहा है कि कुछ युवा तबके का वोट अखिलेश यादव को सीएम बनाने और भाजपा को हराने के लिए सपा में शिफ्ट कर गया और कुछ कल्याणकारी योजनाओं के लाभ के चक्कर में बीजेपी के साथ चला गया।

कैडर का भरोसा जीतने के लिए तेवर बदलेंगी मायावती ?
पार्टी के अंदर इस बार पर जोरदार मंथन चल रहा है कि दलितों और गरीबों को अपने साथ जोड़ने के लिए बीजेपी जमीन पर उतरकर काम कर रही है, लेकिन पार्टी के नेता एसी रूम से निकलना ही नहीं चाहते। जबतक, बीएसपी अपने पुराने उसूलों पर नहीं लौटेगी, कैडर का भरोसा जीतना नाममुकिन होगा। वैसे जानकारों का मानना है कि अगर वाकई मायावती दलित खासकर जाटव वोट बैंक को अपने साथ वापस लाकर, समाजवादी पार्टी से मुसलमानों के मोहभंग होने का लाभ उठाना चाहती हैं तो उनके अपने बयानों में भी वही पुराना और सख्त तेवर लाना होगा, जिसको सुनकर ही उनका कैडर गदगद हो जाता था।












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