बीजेपी के ओबीसी कार्ड को काउंटर करने की तैयारी, जातीय जनगणना की मांग को और तेज करेगा विपक्ष

लखनऊ, 24 अगस्त: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव और 2024 में होने वाला लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए काफी अहम साबित होने वाला है। चुनाव में ओबीसी वोटरों को लुभाने में जुटी बीजेपी को घेरने में अब विपक्ष भी पूरी तरह से जुट गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जातीय जनगणना का मुद्दा भाजपा के लिए गले की फांस बन सकता है। हालांकि यूपी विधानसभा चुनाव में अभी सात महीने ही बचे हैं और भाजपा इसे अभी ठंडे बस्ते में ही रखना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो भाजपा के ओबीसी कार्ड के काउंटर के तौर पर दूसरे दलों ने जातीय जनगणना का शिगूफा छोड़ा है। भाजपा की रणनीति यही होगी कि अभी इस मुद्दे को जितना लंबा हो सके खींचा जाए।

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जातीय जनगणना की मांग बहुत पुरानी है। 2011 में हुई जनगणना के बाद उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई थी। जातीय जनगणना के मुद्दे को लेकर ही रोहिणी कमीशन का गठन किया गया था। लेकिन इस समिति का कार्यकाल 9 बार बढ़ाया जा चुका है। उत्तर प्रदेश की जाति आधारित पार्टियां रोहिणी कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने का दबाव बनाती रही हैं। खासतौर पर उत्तर प्रदेश की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी समेत कई छोटे दल इस मामले को काफी समय से उठा रहे हैं।

मोदी के ओबीसी कार्ड का जवाब है विपक्ष की जातीय जनगणना
दरअसल चुनावी लिहाज से जातीय जनगणना का मुद्दा विपक्ष को सूट कर रहा है। इस मामले को लेकर बिहार के एक प्रतिनिधिमंडल ने पीएम मोदी से मुलाकात भी की थी। और जातीय जनगणना के मुद्दे को उठाया था। हालाकि पीएम ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि जल्द ही उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा। लेकिन बिहार से सटे यूपी में नीतीश के इस कदम की आहट सुनाई दे रही है। लंबे समय से जातीय जनगणना की मांग कर रही छोटी छोटी पार्टिंयां भी अब सक्रिय हो गई हैं और इस मांग को और तेज करने की बात कह रही हैं।

अपनी मांग को लेकर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण राजभर ने कहा,

''हमारी पार्टी तो लंबे समय से मांग कर रही है की सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के साथ ही रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट को लागू किया जाय लेकिन सरकार जानबूझकर उसे लागू नहीं करना चाहती है। भाजपा सरकार को जातीय जनगणना करानी चाहिए ताकि उन जातियों को भी प्रतिनिधित्व मिल सके जिनके लिए आजादी के बाद से ही कुछ नहीं हुआ है।''

बीजेपी के जातीय समीकरण में सेंधमारी करने की कोशिश
भारतीय जनता पार्टी वर्तमान में पूरी तरह से जातीय समीकरण के फार्मूले पर ही आगे बढ़ रही है। संगठन हो या सरकार भाजपा हर जगह जातीय गोटी फिट करने की कोशिश करती है। बीजेपी की प्लानिंग जातीय समीकरण में उन जातियों को तरजीह देने की है जिनकी अब तक उपेक्षा होती रही है। इसी प्लान पर काम करते हुए बीजेपी ने ओबीसी में गैर यादव जातियों को साधने की कोशिश की है। यादव के अलावा जो छोटी छोटी उप जातियां हैं उनको आगे लाना और उनको संगठन और सरकार में शामिल करना है। इस तरह से भाजपा उन जातियों को अपने लिए वोट बैंक में तब्दील करती है। अब यही बात विरोधियों को खटक रही है उन्हे लगता है कि जातीय जनगणना का मुद्दा सामने लाकर बीजेपी को घेरा जा सकता है।

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जातीय जनगणना से जातीय संघर्ष बढ़ेगा, फिर शुरू होगी क्रिमिलेयर और नॉन क्रिमिलियर की लड़ाई
वरिष्ठ पत्रकार अवनीश त्यागी कहते हैं कि, ''इस मुद्दे के गरमाने से जातीय संघर्ष को ही बढ़ावा मिलेगा। बीजेपी फिलहाल इस मुद्दे को आगे के लिए टाल सकती है। हो सकता है विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा बीजेपी के लिए मुसीबत खड़ी करे लेकिन लोकसभा चुनाव में इसकी गूंज जरूर सुनाई देगी। विरोधी पार्टियों के पास बीजेपी को घेरने के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं है , लिहाजा उनको लगता है कि इस मामले पर भाजपा को घेरा जा सकता है।''

वह कहते हैं कि, ''एक बार जातीय जनगणना हो भी गई तो उसके बाद फिर उन जातियों के भीतर ही क्रीमीलेयर और नॉन क्रीमीलेयर की लड़ाई शुरू होगी। आप यूपी में ही देखते आए हैं कि कई जातियों के नेता आरोप लगाते हैं कि आजादी के बाद से ही ओबीसी में कुछ जातियों को ही लाभ मिला बाकी जातियां पिछड़ी रह गईं। इस तरह की लड़ाई देखने को मिलेगी। यूं कहें तो एक तरह से मंडल कमिशन की वापसी हो सकती है।''

वहीं, विद्यांत कॉलेज में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर मनीष हिन्दवी कहते हैं,

''सारा खेल ओबीसी का ही है। यूपी के संदर्भ में नोटिस करेंगे तो पिछले पांच छह सालों में सारा खेल इसी का हो गया है। एक तो वोट ज्यादा है और यूपी में भाजपा की सरकार बनाने वाले ओबीसी ही हैं। 2007 और 2012 के चुनाव में भाजपा को 15 प्रतिशत ओबीसी वोट मिले थे। 2007 में 16.93 और 2012 में मिले थे 15 प्रतिशत। लेकिन 2017 में बीजेपी को 39 प्रतिशत वोट मिला। जब आप इन चुनावों की तुलना करेंगे तो देखेंगे कि पहले उन्हें जनरल वोट मिल रहा था लेकिन अचानक से 24 प्रतिशत वोट बढ़ गया तो बीजेपी 325 सीट पर पहुंच गई।''

अगला विधानसभा चुनाव ओबीसी और हिन्दुत्व पर ही लड़ा जाएगा

हिन्दवी ने कहा, ये लोग कौन थे। ओबीसी का एक बड़ा समुदाय बीजेपी की तरफ चला गया था। 2022 का चुनाव भी भाजपा ओबीसी और हिन्दुत्व को ही केंद्र में रखकर लड़ेगी। इसीलिए ओबीसी की चर्चा हो रही। इसीलिए अब विपक्ष ने बीजेपी का काउंटर करते हुए जनगणना का शिगूफा छोड़ दिया है। तो सारा लब्बोलुबाब यही है कि ओबीसी फैक्टर महत्वपूर्ण होने जा रहा है। ओबीसी का एक बड़ा समूह बीजेपी को वोट देता है। जो टैक्टिकल वोटर है जो सोच समझकर ही वोटिंग करता है। इसीलिए जातिगत जनगणना महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने कहा कि,

''इसको दूसरे तरह से भी आप देख सकते हैं। जातियों का एक समूह बनाइए जैसे मौर्य, कुशवाहा और निषाद। इसी तरह की छोटी जातियों के नेता भी सामने आने लगे हैं। इनको लगता है कि हमारे लोगों की संख्या ज्यादा है तो हम क्यों नहीं आगे जा सकते। यही नेता अब चाहते हैं कि जातीय जनगणना हो जिससे उनकी जातियों का एक एक्जेक्ट फीगर सामने आए ताकि वो अपना दावा ठोंक सकें और बारगेनिंग कर सकें।''

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