रामपुर में BJP ने तोड़ा आजम का तिलिस्म, जानिए बसपा-कांग्रेस का न लड़ना कितना रहा फायदेमंद
लखनऊ, 26 जून: उत्तर प्रदेश के रामपुर में हुए लोकसभा उपचुनाव के जो नतीजे आए हैं उसकी गूंज 2024 तक सुनाई देगी। दो साल बाद होने वाले आम चुनाव में क्या सपा फिर रामपुर में वापसी कर पाएगी या बीजेपी ने अब रामपुर के तिलिस्म को अगली बार भी तोड़ पाएगी ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन फिलहाल आजम के किले में बीजेपी ने जिस तरह सेंध लगाई है उससे आजम के राजनीतिक रसूख पर तो सवाल उठेंगे ही साथ ही सपा के मुखिया अखिलेश यादव की रामपुर से दूरी भी चर्चा का विषय जरूर बनेगी। ऐसी क्या वजहें थीं कि अखिलेश ने अपने आपको रामपुर से अलग रखा और चुनावी मैदान में आजम को अकेला छोड़ दिया। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो रामपुर में कांग्रेस-बसपा के न लड़ने से भी बीजेपी को जीत हासिल करने में काफी मदद मिली।

आजम ने पूरे चुनाव में खुद की किया था प्रचार
दरअसल जेल से लंबे समय बाद बाहर आने के बाद आजम को लगा की उनको अपनी ताकत से ही रामपुर में विजयश्री मिल जाएगी। आजम की रामपुर में अपने दम पर सपा को जिताने की जिद सपा को ले डूबी। आजम ने पूरे चुनाव में अकेले ही प्रचार किया और योगी सरकार पर जमकर निशाने साधे। अपने उपर लदे मुकदमों की दुहाई भी आजम देते रहे। लेकिन दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ ने अपने प्रचार में आजम के जुल्मोसितम की बात की। आजम ने जनता को खासतौर से मुस्लिम समुदाय में यह संदेश देने के प्रयास किया कि अब एकजुट होने का समय आ गया है लेकिन चुनाव के जो नतीजे आए हैं वो आजम को निराश करने वाले हैं।

अखिलेश पर दबाव डालकर कासिम राजा को दिलाया था टिकट
जेल में बंद आजम से अखिलेश यादव मिलने नहीं गए थे। इसके बाद आजम के करीबियों ने आरोप लगाया कि अखिलेश को सिर्फ मुसलमानों का वोट चाहिए उनके लिए वो कुछ करने को तैयार नहीं हैं। इस मैसेज के कुछ दिनों के बाद ही आजम जमानत पर जेल से बाहर आ गए। बाहर आए आजम ने अपना भाव इस तरह से बढ़ाया कि अखिलेश को उनके सामने दंडवत होना पड़ा और उनकी हर बात माननी पड़ी। राज्यसभा का चुनाव हो या एमएलसी का सबमें आजम की चली। यहां तक की उपचुनाव में रामपुर का टिकट भी आजम ने अपने चहेते कासिम को दिलवाया। इसके बाद रामपुर में आजम की प्रतिष्ठा पूरी तरह से दांव पर लगी हुई थी।

रामपुर में आर के बाद क्या अखिलेश के सामने कमजोर होंगे आजम
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो रामपुर उपचुनाव के जो नतीजे आए हैं उसके बाद अपने ही गढ़ में आजम कमजोर होंगे। अब अखिलेश को आजम को दबाव में लाने का मौका मिलेगा लेकिन क्या अखिलेश आजम पर दबाव बना पाएंगे यह तो आने वाला समय बताएगा लेकिन रामपुर में सपा को मिली हार अखिलेश की हार थी या आजम का तिलिस्म टूटा है इस पर ज्यादा चर्चा होगी। हार के बाद अब आजम अलग अलग तरह के बयान दे रहे हैं लेकिन आजम के पास अपनी धूमिल हुई प्रतिष्ठा को पाने का मौका जल्द ही मिलेगा। 2024 में होने वाले आम चुनाव में आजम क्या वापसी कर पाएंगे ये बड़ा सवाल है।

रामपुर के चुनावी मैदान में अखिलेश ने आजम को अकेला क्यों छोड़ा
रामपुर लोकसभा का उपचुनाव हमेशा से सपा के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है लेकिन अखिलेश ने इसे हल्के में लेते हुए वहां प्रचार के लिए जाने की जहमत नहीं उठाई। राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन कहते हैं कि दरअसल अखिलेश यादव एक तरह से आजम खां की थाह लेना चाहते थे इसलिए उन्होंने आजम को चुनावी मैदान में अकेला छोड़ा दिया। शायद उनको इस बात का ओवर कांफिंडेंस था कि आजम रामपुर का चुनाव जिता ले जाएंगे लेकिन बीजेपी की सधी हुई रणनीति के आगे आजम के सारे प्रयास असफल साबित हो गए।

कांग्रेस-बसपा की रामपुर से दूरी ने क्या बीजेपी की राह आसान की
राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज की माने तो रामपुर में कांगेस और बसपा ने अपने आपको चुनाव से दूर कर लिया था इसका भी फायदा बीजेपी को मिला। खासतौर से कांग्रेस के मुस्लिम नेता ने तो उपचुनाव में बीजेपी का समर्थन करने का ऐलान कर दिया था। इससे बीजेपी के पक्ष में माहौल बना जिसका खामियाजा सपा को भुगतना पड़ा। दूसरी वजह यह है कि बसपा-कांग्रेस के न लड़ने से गैर मुस्लिम वोट बीजेपी के पक्ष में यूनाइट हो गया जिसका असर नतीजे में साफतौर पर दिखाई दे रहा है। जिस तरह से मायावती ने आजमगढ़ में चुनाव लड़कर सपा को हरवाने का काम किया उसी तरह रामपुर में चुनाव से अलग होकर भी एक तरह से बीजेपी की ही मदद की।
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