Bahubali Files: UP का वो खूंखार बाहुबली, सत्ता को बनाया गुलाम-पुलिस की उधेड़ी चमड़ी! खेली MLA के खून से होली
Uttar Pradesh Bahubali Files Atiq Ahmed: आज भी संगम नगरी प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में कोई बंदूक की गोली गूंजती है, वो 1990 के दशक की खौफनाक यादें ताजा हो जाती हैं। जिसके डर से पुलिस भी कांपती थी। नाम है- अतीक अहमद। वो बस एक नाम नहीं, एक आतंक की कहानी है, जो उत्तर प्रदेश की सत्ता को गुलाम बनाने वाली सबसे खतरनाक ताकत थी। लोग उसे बाहुबली कहते थे, लेकिन उसकी असली ताकत नाम नहीं, डर थी। डर जो सत्ता को भी झुकाता था, पुलिस को चुप कराता था, और न्याय को टालता रहता था। उसने अपराध, राजनीति और डर के सहारे एक ऐसा साम्राज्य खड़ा किया, जिसके सामने प्रशासन, पुलिस और न्याय व्यवस्था भी कई बार झुकती नजर आई।
अतीक की मौत 15 अप्रैल 2023 में हो चुकी है। आज Oneindia Hindi अपनी Bahubali Files की गुरुवार सीरीज में उस गरीब लड़के की कहानी सुना रहा है, जो अपराध की दुनिया में उतरा और सत्ता के खेल में खून से होली खेल गया...

चैप्टर 1: गरीबी से शुरुआत - एक तांगा चालक का बेटा
10 अगस्त 1962 को प्रयागराज (तब इलाहाबाद) की तंग गलियों में तांगा या घोड़ागाड़ी चलाने वाले फिरोज अहमद के घर अतीक अहमद का जन्म हुआ। पिता तांगा चलाते थे, घर तीन कमरों का, भाई-बहन कई, लेकिन पैसे की कभी कमी नहीं थी-कमी सिर्फ सपनों की थी। स्कूल की पढ़ाई अधूरी रह गई, क्योंकि जिंदगी ने जल्दी ही उसे अमीर बनने का सपना दिखाया। किशोरावस्था में छोटे-मोटे झगड़े, मारपीट... और फिर 1979 में, महज 17 साल की उम्र में पहला हत्या का केस खुल्दाबाद थाने में दर्ज हुआ।

वो केस उसके लिए पहला कदम था-अपराध की दुनिया में। इलाहाबाद की तंग गलियों में वह 'लोकल डॉन' बनने लगा। वो समझ गया था कि यहां ताकत सिर्फ बंदूक से नहीं, बल्कि राजनीति से मिलती है।
चैप्टर 2: राजनीति और AK-47
1989 आया, तब अतीक 27 साल का था। निर्दलीय चुनाव लड़ा, इलाहाबाद वेस्ट सीट से जीत गया। वो जीत उसके लिए अलादीन का चिराग थी। राजनीतिक कवच मिलते ही उसका साम्राज्य फैलने लगा। झूंसी, करेली, चकिया, धूमनगंज-ये इलाके उसकी सल्तनत बन गए। AK-47 की गूंज सुनते ही पुलिस समझ जाती-ये अतीक का काम है। कभी छिपकर नहीं मारा, बल्कि खुलेआम डर फैलाया। जमीनें हड़पीं-सरकारी, निजी, विवादित।

किसी को पैसे दिए, किसी को धौंस दिखाई। व्यापारी 'सुरक्षा' के नाम पर रंगदारी देते। ठेके जबरन हासिल किए-निर्माण, सप्लाई, ट्रांसपोर्ट। अतीक का साम्राज्य तीन स्तंभों पर टिका था- जमीन, ठेके और डर। हथियार सिर्फ हथियार नहीं, डर का संदेश था- 'विरोध मत करो, गवाही मत दो, वरना अंजाम भुगतोगे!'
चैप्टर 3: अतीक के आतंक का साम्राज्य, जेल से भी राज
1989 से 2020 तक अतीक ने हजारों करोड़ की संपत्ति बनाई। प्रयागराज में होटल-कॉम्प्लेक्स, लखनऊ-नोएडा में आलीशान कोठियां, यहां तक कि विदेशों में निवेश। नौकरों के नाम पर भी जमीनें खरीदीं-क्योंकि कानून को चकमा देना आसान था। सरकारी आंकड़ों में उसकी संपत्ति 3000 करोड़ से ज्यादा बताई जाती है, और पुलिस ने 2023 के बाद हजारों करोड़ कुर्क किए। लेकिन वो दिन याद आते हैं जब अतीक जेल में बैठा होता था, और बाहर साम्राज्य चलता रहता।

अतीक पर 100 से ज्यादा आपराधिक मामले थे-हत्या, अपहरण, रंगदारी, गैंगस्टर एक्ट। जेल उसके लिए सजा नहीं, कमांड सेंटर थी। मोबाइल, शूटर, वकील, राजनेता-सब उसके इशारे पर रहते थे। पांच बार विधायक बना, समाजवादी पार्टी से सांसद भी (फूलपुर, 2004)। राजनीति ने उसे वैधता दी-केस कमजोर होते, गवाह मुकर जाते।
चैप्टर 4: सबसे खूंखार कांड - राजू पाल हत्याकांड (2005)
लेकिन सबसे दर्दनाक याद है 2005 की वो रात-राजू पाल हत्याकांड। 2004 के उपचुनाव में अतीक के भाई अशरफ को बसपा के राजू पाल ने हराया था। राजू की जीत अतीक के गढ़ पर हमला थी। 25 जनवरी 2005 को, गणतंत्र दिवस के ठीक पहले, राजू पाल अपनी गाड़ी में थे। दो गाड़ियां आगे आईं, रास्ता रोका। AK-47 और हथियारों से हमला हुआ। पोस्टमार्टम में राजू के शरीर से 19 गोलियां निकलीं। राजू की शादी को सिर्फ 10 दिन हुए थे, पूजा पाल विधवा हो गई। उनके साथ संदीप यादव और देवीलाल भी मारे गए।

पत्नी पूजा पाल ने FIR दर्ज कराई, जिसमें अतीक का नाम, अशरफ, फरहान, आबिद... समेत कई थे। मुख्य गवाह उमेश पाल (राजू के रिश्तेदार) ने बयान दिए, लेकिन अतीक ने दबाव बनाया। 2006 में उमेश का अपहरण हुआ। 2019 में इस केस में उम्रकैद मिली। लेकिन खून का खेल रुका नहीं। 2023 में उमेश पाल की हत्या हुई-सीधा अतीक के परिवार पर आरोप लगा।
चैप्टर 5: अतीक... अपराध, राजनीति और डर का गठजोड़
अतीक अन्य बाहुबलियों से अलग था। मुख्तार अंसारी पूर्वांचल में, हरिशंकर तिवारी गोरखपुर में, ब्रजेश सिंह ठेके-गैंगवार में... लेकिन प्रयागराज और मध्य यूपी में अतीक का खौफ सबसे गहरा था।

दिनदहाड़े फायरिंग, गैंगवार-मीडिया में हेडलाइन बनतीं, लेकिन तस्वीरें कम, अफवाहें ज्यादा। अतीक सिस्टम की कमजोरी का प्रतीक था। अपराध, राजनीति और डर का गठजोड़, जो अजेय लगने वाला साम्राज्य।
चैप्टर 6: पतन की शुरुआत - 2017 के बाद
फिर आया साल 2017। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई। बुलडोजर चले, संपत्तियां कुर्क हुईं। 2023 में उमेश पाल हत्या के बाद मेरे बेटे असद का एनकाउंटर हुआ। और फिर वो काला दिन-15 अप्रैल 2023। पुलिस कस्टडी में अस्पताल जाते वक्त तीन शूटर्स ने लाइव टीवी पर गोलियां बरसाईं।

18 गोलियां, अतीक और अशरफ दोनों मारे गए। अतीक ने सोचा भी नहीं होगा, ऐसी खौफनाक मौत मिली। उसका भ्रम कि कोई मुझे नहीं छू सकता, लेकिन दुश्मनों की रंजिश और कानून के लंबे हाथ आखिर पहुंच ही गए।
अतीक की कहानी सिखाती है-ताकत कभी स्थायी नहीं होती। डर से जो साम्राज्य बनता है, वो डर से ही ढह जाता है। अतीक ने खून बहाया, वो उसकी ही मौत का कारण बना।
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