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Allahabad High Court: यौन शोषण मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को मिली जमानत! कोर्ट ने जांच पर उठाए सवाल

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश की प्रमुख धार्मिक हस्ती स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने उनके खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज मामले में अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है। पिछले महीने एक विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को स्वामी के खिलाफ लगे यौन शोषण के आरोपों की जांच के लिए मामला दर्ज करने का आदेश दिया था।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने एक शिविर में दो नाबालिग लड़कों का यौन शोषण किया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह मामला कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद के वादी शंकुरी पीठाधीश्वर आशुतोष महाराज की शिकायत पर दर्ज कराया गया था। प्रयागराज पुलिस द्वारा FIR दर्ज किए जाने के बाद, स्वामी ने अग्रिम जमानत के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

Swami Avimukteshwaranand

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां और फैसले के आधार

Bar and Bench की रिपोर्ट के अनुसार, आज सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की बेंच ने मामले की विसंगतियों पर कड़े सवाल उठाए और पीड़िता के व्यवहार पर टिप्पणी की। आइए जानते हैं कोर्ट ने क्या कहा और किन आधारों पर जमानत दी...

  • मानवीय आचरण पर सवाल: कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों का घटना के बारे में अपने प्राकृतिक अभिभावकों (माता-पिता) को न बताकर शिकायतकर्ता को बताना, जो कि एक अजनबी है, सामान्य मानवीय आचरण और व्यवहार के अनुरूप नहीं है।
  • FIR में देरी: कोर्ट ने मामले को दर्ज करने में हुई देरी पर भी सवाल उठाए।

अदालत ने कहा कि, 'पीड़ितों ने कहा है कि उन्होंने अपराध के बारे में प्रथम सूचना देने वाले को 18.01.2026 को सूचित किया था और इसलिए, पहली बार पुलिस को सूचना देने में 6 दिनों की देरी हुई है और इसके लिए, प्रथम सूचना देने वाले ने कारण बताया है कि वह 'पूजा/यज्ञ' में व्यस्त था।'

कानून का उल्लंघन और मीडिया ट्रायल
कोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई कि FIR दर्ज होने के बाद पीड़ितों का विभिन्न हिंदी समाचार चैनलों द्वारा इंटरव्यू लिया गया, जो POCSO और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन है।

कोर्ट ने कहा कि, 'पीड़ितों को प्रमुख हिंदी समाचार चैनलों को इंटरव्यू देते हुए पाया गया, जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में अत्यधिक निंदनीय और खेदजनक है और POCSO मामलों से संबंधित कानून और प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।'

अदालत ने आरोपी के खिलाफ उपलब्ध मेडिकल साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए। बेंच ने कहा कि डॉक्टर द्वारा तैयार की गई मेडिकल रिपोर्ट में पीड़ितों के शरीर पर कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई है और यह राय दी गई है कि यौन शोषण से इनकार नहीं किया जा सकता है और FSL रिपोर्ट मांगी गई है, जो स्पष्ट रूप से दिखाती है कि पीड़ितों पर यौन शोषण होने के संबंध में डॉक्टर द्वारा निर्णायक निष्कर्ष नहीं दिया गया है। आवेदकों की चिकित्सा जांच नहीं की गई है, जो यौन शोषण से जुड़े मामलों में आवश्यक है।'

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कोर्ट ने विशेष रूप से नोट किया, 'जिस दिन (18 जनवरी 2026) शिकायतकर्ता को पीड़ितों से कथित अपराध की जानकारी मिली, ठीक उसी दिन मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर संगम स्नान को लेकर आरोपी स्वामी और प्रशासन के बीच तीखा विवाद भी हुआ था। चूंकि घटना की सूचना मिलने और प्रशासन के साथ विवाद होने की तारीख एक ही है (18.01.2026), इसलिए इन तथ्यों की गहराई और सावधानी से जांच किया जाना आवश्यक है।'

बता दें कि 27 फरवरी को कोर्ट ने स्वामी को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण दिया था। आज कोर्ट ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में उन्हें अग्रिम जमानत पर रिहा कर दिया जाए। अदालत में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप कुमार और उनके सहयोगियों ने रखा, जबकि राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल और शासकीय अधिवक्ता पतंजलि मिश्रा पेश हुए।

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