बुंदेलखंड में महिलाओं की मेहनत से खड़ी हुई 278 करोड़ की कंपनी

नई दिल्ली, 09 अगस्त। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 16 जिलों में फैले बुंदेलखंड की चर्चा अक्सर सूखा, गरीबी और इनकी वजह से लोगों के पलायन और किसानों की आत्महत्याओं के लिये होती है. पिछले करीब तीन साल से यूपी में पड़ने वाले बुंदेलखंड के सात जिलों के आठ सौ गांवों की करीब 40 हजार महिलाओं दूध उत्पादन में एक बड़ी सफलता हासिल की है.
बुंदेलखंड के झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, जालौन, बांदा और चित्रकूट जिलों में बलिनी दुग्ध उत्पादन कंपनी ने स्वयं सहायता समूह के जरिए महज तीन साल के भीतर 278 करोड़ रुपये का कारोबार किया और 16 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा कमाया है. इसमें स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हजारों महिलाएं भी आर्थिक रूप से समृद्ध हुई हैं.
हर रोज एक लाख लीटर दूध
स्वयं सहायता समूह की सदस्यों के जरिए रोजाना करीब एक लाख लीटर दूध इकट्ठा किया जा रहा है जिसे दूध बेचने वाली कंपनियों को सप्लाई किया जाता है. बलिनी दुग्ध उत्पादन कंपनी से मुख्य रूप से दिल्ली की मदर डेयरी कंपनी दूध खरीदती है.
झांसी जिले की रानी भी एक स्वयं सहायता समूह के जरिए कंपनी से जुड़ी हैं. वो बताती हैं कि पहले अपने गांव में उन्हें 30 रुपये प्रति लीटर दूध बेचना पड़ता था लेकिन अब उनका दूध 40-45 रुपये प्रति लीटर खरीदा जाता है.

कंपनी के सीईओ डॉक्टर ओपी सिंह कहते हैं, "कंपनी दूध की जांच करके उसे औसतन 46 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से खरीदती है. दूध की गुणवत्ता के आधार पर यह 40 रुपये से लेकर 73 रुपये प्रति लीटर तक खरीदा जाता है. इसके अलावा कंपनी इन महिलाओं को तीन स्तरों पर पैसे का भुगतान करती है. दूध की कीमत तो देती ही है, जितने दिन तक पैसा कंपनी के पास रहता है, उसका ब्याज भी देती है और साल में एक बार कंपनी के लाभांश के हिसाब से इंसेंटिव भी दिया जाता है."
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डॉक्टर ओपी सिंह बताते हैं कि महिलाओं को कंपनी से जोड़ने के लिए नए गांव में कंपनी के लोग जाते हैं और महिलाओं को इसके फायदे के बारे में बताया जाता है. फिर जो भी लोग इसमें रुचि दिखाते हैं, उन्हें सदस्यता दी जाती है और उसके बाद उन्हीं में से किसी को यह जिम्मेदारी दी जाती है कि कौन सारा दूध इकट्ठा करेगा. वो बताते हैं, "डेयरी चलाने वाले को कंपनी मशीनरी इत्यादि देती है ताकि दूथ इकट्ठा करके उसे मुख्य केंद्र तक पहुंचाया जा सके. सदस्यों की डेटा प्रोसेसिंग के जरिए पहचान की जाती है. सुबह-शाम दूध जमा किया जाता है."
समय से पैसे का भुगतान
समूह से जुड़ी महिलाओं को सबसे ज्यादा सुविधा इस बात की है कि उन्हें यहां पैसे का भुगतान समय से हो जाता है और सीधे खाते में आ जाता है. रानी कहती हैं, "मैं अपने खर्चे के लिए पैसे निकाल रही हूं साथ ही कुछ बचा भी रही हूं. हमारे पास थोड़े खेत भी हैं. दूध से हमें अतिरिक्त आमदनी हो जाती है जिसे हम बच्चों की अच्छी शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं."
हालांकि बुंदेलखंड के जिन जिलों में कंपनी ने महिलाओं को जोड़ रखे हैं, वहां तमाम जगहों पर इसके बारे में लोगों को पता ही नहीं है. महोबा के सामाजिक कार्यकर्ता पंकज सिंह परिहार हमीरपुर और ललितपुर जैसे जिलों में अक्सर जाते हैं. पंकज सिंह परिहार कहते हैं, "हमने तो अब तक इस कंपनी और इस स्वयं सहायता समूह का नाम भी नहीं सुना है. यह भी नहीं पता है कि डेयरी के क्षेत्र में यहां की महिलाएं इतना काम कर रही हैं. मेरे कई रिश्तेदार हमीरपुर और ललितपुर के गांवों में रहते हैं, उन्हें भी इसके बारे में नहीं मालूम है."

केंद्र और राज्य सरकार का सहयोग
बलिनी मिल्क प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड की स्थापना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के संयुक्त प्रयास से की गई थी. इसे राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड यानी एनडीडीबी की ओर से तकनीकी सहायता मिलती है. जबकि राष्ट्रीय आजीविका मिशन और राज्य आजीविजिका मिशन इसे वित्तीय सहायता दे रहे हैं.
कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉक्टर ओम प्रकाश सिंह बताते हैं, "मिशन के तहत अब तक कंपनी में 839 गांवों के 950 स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं समेत कुल 40 हजार महिलाएं सदस्य बन चुकी हैं. इसमें स्वयं सहायता समूह से इतर महिलाएं भी शामिल हैं. इस साल के अंत तक 12 हजार और महिलाओं को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है. ये समूह 675 केंद्रों के माध्यम से 839 गांवों में काम कर रहे हैं."
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डॉक्टर ओम प्रकाश सिंह ने बताया कि कंपनी में कुल दस निदेशक हैं जिनमें से आठ महिला निदेशक वही हैं जो कि दुग्ध उत्पादन से जुड़ी हैं जबकि एक निदेशक तकनीकी क्षेत्र से होते हैं और एक निदेशक का पद कंपनी के सीईओ के पास रहता है.
बलिनी की सदस्यों को सस्ता चारा भी उपलब्ध कराया जाता है. ओपी सिंह बताते हैं, "हम लोग गांव वालों को यह भी बताते हैं कि वो पशुओं को हरा चारा खूब खिलाएं. हमारे लोगों ने गांव-गांव जाकर करीब पांच हजार किसानों के यहां हरे चारे की फसल लगाई है, वो भी बंजर भूमि पर. बुंदेलखंड में पशुओं में बांझपन की समस्या बहुत थी, उसे भी हम दूर कर रहे हैं."

सूखे से बेहल बुंदेलखंड की उम्मीद
झांसी जिले के गणेशगढ़ गांव की अनीता राजपूत पिछले दो साल से समूह से जुड़ी हैं. उनके बेटे विनय कुमार राजपूत बताते हैं कि वो लोग करीब दो-ढाई लाख रुपये का लाभ कमा लेते हैं. विनय राजपूत खुद सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे हैं. वो कहते हैं, "पहले हमारे पास एक भैंस थी लेकिन समूह से जुड़ने के बाद हम और भैंस ले आए हैं और आज हमारे पास दस भैंस हैं. हमारे गांव में कुल 125 सदस्य इससे जुड़े हैं. लोगों को अच्छी आमदनी हो रही है और दूध लेकर इधर-उधर भटकना भी नहीं पड़ता है."
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बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति इस इलाके में खेती को न सिर्फ दुष्कर बनाती है सिंचाई के लिए पानी का अभाव और भीषण के कारण पूरा क्षेत्र कृषि में अत्यंत पिछड़ा हुआ है. इस क्षेत्र में 60 फीसदी से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. गर्मी शुरू होते ही पानी की समस्या सतह पर दिखने लगती है, नल, कुएं, हैंडपंप सूखने लगते हैं और पानी की तलाश में लोग कई किलोमीटर तक संघर्ष करते दिखते हैं. यहां से लोगों के पलायन की मुख्य वजह भी यही है. पानी की वजह से खेती ठीक से नहीं होती तो पशुओं को चारा भी ठीक से नहीं मिल पाता.
बहुत से इलाकों में लोगों ने स्वयं सहायता समूहों के जरिये ही गांव की स्थिति सुधारने में सफलता पाई है. कहीं तालाब बना कर तो कहीं पेड़ लगाकर हालात को बेहतर किया गया है. इन्हीं कोशिशों का नतीजा है कि अब कई इलाके फिर से हरे भरे दिखने लगे हैं. इन महिलाओं की कामयाबी भी ऐसी ही कोशिशों का नतीजा है.
Source: DW
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