शोध: डिस्पोजेबल कॉफी कप से पैदा होते माइक्रोप्लास्टिक कण

नई दिल्ली, 26 अप्रैल। माइक्रोप्लास्टिक को लेकर हुए एक नए शोध में पाया गया है कि ये आपके पेय पदार्थ में अरबों सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को मिलाने के लिए जिम्मेदार होते हैं. अमेरिका स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्टैंडर्ड एंड टेक्नोलॉजी (एनआईएसटी) के शोधकर्ताओं ने इन सूक्ष्म प्लास्टिक को बेहतर ढंग से समझने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले कुछ उपभोक्ता उत्पादों का विश्लेषण किया है. उन्होंने पाया कि जब प्लास्टिक उत्पादों को गर्म पानी के संपर्क में लाया जाता है, तो वे प्रति लीटर अरबों माइक्रोप्लास्टिक को पानी में छोड़ देते हैं.
एनआईएसटी शोधकर्ताओं ने अपने नतीजे वैज्ञानिक पत्रिका एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी प्रकाशित किए हैं.
एनआईएसटी के रसायनशास्त्री क्रिस्टोफर जैंगमाइस्टर कहते हैं, "यहां मुख्य बात यह है कि हम जहां भी देखते हैं वहां प्लास्टिक के कण होते हैं. ऐसे बहुत से हैं. हर लीटर में खरबों नैनोप्लास्टिक. हम नहीं जानते कि इनका लोगों या जानवरों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है या नहीं. हमें बस बहुत भरोसा है कि वे हर जगह हैं." कप को वाटरप्रूफ बनाने के लिए उसमें नाजुक लचीले प्लास्टिक लो डेंसिटी पॉलीथीन का पतला लेप लगा होता है. ऐसे में जब कप 100 डिग्री सेल्सियस तापमान के पानी के संपर्क में आता है तो प्रति लीटर खरबों की संख्या में नैनोपार्टिकल्स छोड़ता है.
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प्लास्टिक सामग्री खतरनाक
प्लास्टिक सामग्री कई प्रकार की होती है, लेकिन वे सभी पॉलीमर, प्राकृतिक या मानव निर्मित पदार्थों से बनी होती हैं जो एक साथ जुड़े बड़े अणुओं से बने होते हैं. वैज्ञानिकों ने महासागरों और कई अन्य वातावरणों में इन बड़े प्लास्टिक से सूक्ष्म कण पाए हैं. शोधकर्ता उन्हें दो समूहों में वर्गीकृत करते हैं: सूक्ष्म और नैनोप्लास्टिक.
इन प्लास्टिक उत्पादों से निकलने वाले नैनोकणों का विश्लेषण करने के लिए, शोधकर्ताओं को पहले यह निर्धारित करने की जरूरत थी कि उनका पता कैसे लगाया जाए. जैंगमाइस्टर कहते हैं, "सोचिए एक सामान्य कॉफी कप में एक कप पानी है. इसमें कई अरब कण हो सकते हैं, और हमें यह पता लगाना होगा कि इन नैनोप्लास्टिक्स को कैसे खोजा जाए. यह भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा है."
इसलिए शोधकर्ताओं की टीम ने एक नए दृष्टिकोण का इस्तेमाल किया. जैंगमाइस्टर ने बताया, "हमने कप में मौजूद पानी को निकालने का एक तरीका इस्तेमाल किया, पानी को मिस्ट की तरह छिड़का और उसे सुखा दिया और बाकी को घोल में रहने दिया. इस प्रक्रिया के जरिए बाकी बचे नैनोकण घोल से अलग हो गए."
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जटिल प्रक्रिया से लगाया पता
मिस्ट के सूख जाने के बाद उसमें मौजूद नैनोकणों को उनके आकार और भार के मुताबिक क्रमबद्ध किया गया. शोधकर्ता तब एक विशेष आकार तय कर सकते थे, उदाहरण के लिए लगभग 100 नैनोमीटर नैनोकणों को एक विशेष कण काउंटर में रख सकते थे. इसके बाद नैनोकणों को ब्यूटेनॉल के गर्म वाष्प जो कि एक प्रकार का अल्कोहल है, उसके संपर्क में लाया गया, फिर तेजी से ठंडा किया गया. जैसे ही अल्कोहल गाढ़ा होता है, कण नैनोमीटर के आकार से माइक्रोमीटर तक बढ़ जाते हैं, जिससे उनके बारे में और अधिक पता लगाया जा सकता है. यह पूरी प्रक्रिया कंप्यूटर द्वारा की जाती है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि माइक्रोप्लास्टिक को इंसान के शरीर में पहुंचने से रोकने का सबसे कारगर तरीका यही होगा कि प्लास्टिक का निर्माण और उपयोग घटाया जाए.
Source: DW












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