'मैं मृत्यु से बड़ा हूं', Jaspal Rana के इंस्टाग्राम बायो की वो आखिरी लाइन, आखिरी सांस तक नहीं मानी हार
Jaspal Rana Insta Bio: महान निशानेबाज और द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता कोच जसपाल राणा (Jaspal Rana) का जाने खेल जगत सदमे में है। अगर आप जसपाल राणा के इंस्टाग्राम प्रोफाइल को देखेंगे तो देवनागरी में लिखी उनकी बायो की पहली लाइन सीधे दिल को छूती है, जिसमें लिखा है कि जब मृत्यु निश्चित हो, स्वयं को अच्छे कारण के लिए समर्पित करना सर्वोत्तम है।
बायो की पहली लाइन पर टिकी फैंस की नजरें (Jaspal Rana Insta Bio)
अपने 50वें जन्मदिन से महज दो हफ्ते पहले दुनिया को अलविदा कहने वाले राणा ने अपने जीवन के आखिरी पलों से रवींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कविता 'मृत्युंजय' की उन अमर पंक्तियों को जीवंत कर दिया, जिसमें कहा गया है कि तुम मृत्यु से बड़े नहीं हो सकते, लेकिन मैं यह कहते हुए विदा लूंगा कि मैं मृत्यु से बड़ा हूं। उन्होंने देश के लिए मेडल जीतने और चैंपियन तैयार करने को ही अपना वह अच्छा कारण बनाया।

जर्मनी में जब जूनियर शूटर के लिए खुद खरीद कर लाए सामान
जसपाल राणा का बड़प्पन इस बात में था कि वे जितने बड़े खिलाड़ी थे, उतने ही जमीन से जुड़े इंसान थे। हरियाणा के जमीनी स्तर के कोच सुरेश सिंह ने म्यूनिख (जर्मनी) वर्ल्ड कप की एक घटना को याद करते हुए बताया कि जब उनकी बेटी मुस्कान वहां टीम के साथ गई थी, तो उसने खेल के किसी जरूरी सामान की कमी का जिक्र किया। राणा ने तुरंत कहा कि बेटा, तुम्हें क्या चाहिए? मैं अभी लाता हूं। वे खुद स्टॉल पर गए, अपने पैसों से सामान खरीदा और उसे सौंप दिया। जब मुस्कान ने पैसों के बारे में पूछा, तो उन्होंने हंसकर कहा कि कोई पैसे नहीं बेटा, यह तुम्हारे लिए है।
जमीनी स्तर के कोचों को देते थे सम्मान
जसपाल राणा ने कभी भी अपनी तकनीकी समझ को सिर्फ अपने व्यक्तिगत शिष्यों तक सीमित नहीं रखा। वे राष्ट्रीय सेटअप से बाहर काम करने वाले छोटे कोचों का हौसला बढ़ाते थे। कोच सुरेश सिंह के मुताबिक राणा अक्सर उनसे कहते थे कि भाई, तुम बहुत अच्छे कोच हो। तुम भारत के लिए असली टैलेंट तैयार कर रहे हो। इन बच्चों को आगे ले जाने की जिम्मेदारी हमारी है, तुम बिल्कुल चिंता मत करो। जब भी कोई युवा शूटर उनसे सलाह मांगता, वे शूटिंग लेन पर उसके पीछे खड़े होकर शॉट की बारीकियां समझाने लगते थे।
रात 2 बजे एयरपोर्ट पर बिगड़ी तबीयत
म्यूनिख वर्ल्ड कप से लौटते समय हवाई अड्डे पर मौजूद लोगों ने बताया कि जर्मनी से ही उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। रात 2 बजे जब वे फ्लाइट से उतरे, तो उन्हें बहुत तेज पसीना आ रहा था और वे असहज दिख रहे थे। वे एयरपोर्ट से घर जाने के बजाय सीधे अस्पताल के लिए रवाना हुए। जब उनके निधन की खबर आई तब भारतीय टीम देहरादून में कैंप के लिए जुटी थी। वही उत्तराखंड जो राणा की जन्मभूमि है।
गुरु के जाने की खबर मिलते ही पेरिस ओलंपिक की स्टार और उनकी सबसे प्रिय शिष्या मनु भाकर गहरे सदमे में डूब गईं और तुरंत कैंप छोड़कर दिल्ली के लिए रवाना हो गईं। जसपाल राणा आज शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपनी इसी उदारता और निस्वार्थ योगदान के कारण वे भारतीय खेल इतिहास में हमेशा मृत्युंजय बनकर अमर रहेंगे।















Click it and Unblock the Notifications