कपिल देव समेत 6 दिग्गज क्रिकेटरों पर आखिर क्यों लगा था 1 साल का प्रतिबंध ?
छह दिग्गजों को बैन करने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया था। 34 साल पहले ऐसी घटना हुई थी।

विराट कोहली-गौतम गंभीर घटना की गूंज अभी भी खत्म नहीं हुई है। क्रिकेट के जानकार और प्रशंसक यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर क्रिकेट बोर्ड इस मामले में शामिल खिलाड़ियों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा रहा ? आज क्रिकेट बोर्ड इतना मजबूर और बेबस क्यों नजर आ रहा है ? एक जमाना वो था जब भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड बड़े से बड़े खिलाड़ियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाने में देर नहीं करता था। 34 साल पहले बोर्ड ने अनुबंध की शर्त तोड़ने पर कपिल देव, रवि शास्त्री, दिलीप वैंगसरकर, मोहम्मद अजहरुद्दीन, अरुण लाल और किरण मोरे पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया था। इस फैसले के बाद भारतीय क्रिकेट में भूचाल आ गया था। यह भारत की इतनी बड़ी घटना थी कि इस मुद्दे पर कांग्रेस के सांसदों में फूट पड़ गयी थी। बात इतनी बढ़ गयी कि मामला सुप्रीम कोर्ट जा पहुंच गया।
जुर्माना से अनुशासन नहीं खरीद सकते- नारी कंट्रैक्टर
जब कपिल समेत छह खिलाड़ियों पर एक साल का प्रतिबंध लगाया गया था तब भारत का जनमानस दो हिस्सों में बंट गया था। एक हिस्सा प्रतिबंध के समर्थन में था जब कि दूसरा हिस्सा विरोध में। इस घटना पर पूर्व कप्तान नारी कंट्रैक्टर ने कहा था, प्रतिबंध जरूरी था क्यों कि आप जुर्माना दे कर अनुशासन नहीं खरीद सकते। कोई भी खिलाड़ी खेल से बड़ा नहीं हो सकता। कोहली-गंभीर के मामले में भी नारी कंट्रैक्टर का यह कथन बिल्कुल प्रासंगिक है। वैसे भी कोहली और गंभीर पर लगाया गया जुर्माना दिखावटी दंड की तरह है। एक मैच का सौ फीसदी कितना होगा, यह खिलाड़ियों के सालाना वेतन और मैचों की संख्या पर निर्भर करता है। अगर संबंधित खिलाड़ी की टीम प्लेऑफ में पहुंची तो उसे अधिक मैच खेलने को मिलेंगे। इससे उसके एक मैच की राशि कम हो जाएगी। कोहली और नवीनुल हक के सालना वेतन की तो जानकारी है लेकिन लखनऊ के मेंटर गौतम गंभीर को एक साल में कितना पैसा मिलता है, इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं है। अगर खिलाड़ियों पर लगाया गया आर्थिक दंड फ्रेंचाइजी ने अदा कर दिया तो फिर इसका क्या मतलब रह जाएगा ?
34 साल पहले लगा था 6 क्रिकेटरों पर प्रतिबंध
बहरहाल जानते हैं कि कपिल समेत 6 क्रिकेटरों पर लगे प्रतिबंध का क्या हुआ ? भारत में क्रिकेट के लिए कितनी दिवानगी है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। इस घटना ने भारत की राजनीति को भी हिला कर रख दिया। प्रतिबंध के विरोध में कांग्रेस के 26 सांसदों ने एक बयान जारी किया था। जबकि क्रिकेट बोर्ड से जुड़े कांग्रेस के सांसद प्रतिबंध के समर्थन में थे। माधव राव सिंधिया और एनकेपी साल्वे प्रतिबंध को सही मान रहे थे। जिन 26 कांग्रेस सांसदों ने प्रतिबंध का विरोध किया था उनमें असलम शेर खान थे। वे हॉकी के प्रतिष्ठित खिलाड़ी थे। उन्होंने भारत को 1975 में विश्वविजेता बनाने में बड़ी भूमिका निभायी थी। कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री और बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एनके पी साल्वे इस बात को लेकर असलम शेर खान पर भड़क गये। तब असलम शेर खान ने बेहद गुस्से में उनसे कहा, आप खिलाड़ियों को तवायफों की तरह ट्रीट नहीं कर सकते। यह प्रतिबंध भारतीय क्रिकेट के लिए चिंताजनक और निराशाजनक है।
भारतीय क्रिकेटरों का बागी दौरा
भारत की टीम मार्च 1989 में वेस्टइंडीज के दौरे पर गयी थी। भारत के कप्तान दिलीप वेंगसरकर थे। वेस्टइंडीज के खिलाफ भारत चार टेस्ट मैचों की श्रृंखला 0-3 से हार गया था। एकदिवसीय मैचों में भी भारत 0-5 से हार गया था। इस शर्मनाक प्रदर्शन के बाद भारतीय टीम अमेरिका और कनाडा में आयोजित निजी क्रिकेट मैच खेलने चली गयी थी। पाकिस्तानी मूल के कुछ अमेरिकी कपड़ा व्यापारियों ने इस प्रतियोगिता का आयोजन किया था जिसमें भारत, वेस्टइंडीज और पाकिस्तान की टीमों ने भाग लिया था। इसे विद्रोही दौरा माना गया। इस दौरे पर मैच खेलने के लिए हर भारतीय खिलाड़ी को दो हजार अमेरिकी डॉलर (करीब 33 हजार रुपये) दिये गये थे। चूंकि भारतीय खिलाड़ियों ने इस दौरे के लिए क्रिकेट बोर्ड से मंजूरी नहीं ली थी इसलिए अनुशासन का उल्लंघन माना गया।
बोर्ड का सख्त फैसला
अनुबंध के प्रावधानों के उल्लंघन के आरोप में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने कप्तान दिलीप वेंगसरकर, कपिल देव, रवि शास्त्री, मोहम्म्द अजरुद्दीन, किरण मोरे और अरुण लाल पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया। इसके साथ ही इन छह खिलाड़ियों पर 35-35 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। जबकि टीम के अन्य सदस्य-संजय मांजरेकर, रॉबिन सिंह, एम वैंकटरमन, नरेन्द्र हिरवानी, संजीव शर्मा और अजय शर्मा पर केवल 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। भारतीय टीम के अमेरिका और कनाडा के अनधिकृत दौरे पर बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष बीएन दत्ता ने कहा था, कुछ खिलाड़ी पूरी तरह भाड़े के व्यापारी बन गये हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सुलह
जबकि दूसरी तरफ बागी खिलाड़ियों में से एक अरुण लाल ने कहा था, एक व्यापारी के पास पैसा कमाने के लिए औसतन 45 साल होते हैं जबकि एक क्रिकेटर के पास सिर्फ 10 साल। अगर वह पैसा बनाने के लिए जल्दबाजी करता है तो इसमें बुरा क्या है। इस विवाद के बढ़ने से क्रिकेट बोर्ड और खिलाड़ियों की बहुत फजीहत हो रही थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका था। तब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई कर रही जस्टिस वैंकटरमैया की बेंच ने बोर्ड को तत्काल सुलह करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा था, मुकदमेबाजी से भारतीय क्रिकेट पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा इसलिए समझौता कर लिया जाना चाहिए। इसके बाद क्रिकेट बोर्ड ने सितम्बर 1989 में खिलाड़ियों पर लगाया गया प्रतिबंध वापस ले लिया। लेकिन इस विवाद के बाद भारतीय खिलाड़ी नियमों के बंधन में बंध गये।












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