अगर मेगा ऑक्शन के दौरान हुआ टाई तो कैसे होता है खिलाड़ी के भाग्य का फैसला, जानें क्या हैं नियम

नई दिल्ली। इंडियन प्रीमियर लीग के 15वें सीजन के लिये खिलाड़ियों की नीलामी की तैयारी पूरी हो चुकी है और बेंगलुरू में (शनिवार-रविवार) यह बड़ा दो दिवसीय इवेंट शुरू हो रहा है। आईपीएल 2022 में 10 टीमें हिस्सा लेने वाली है, जिसके चलते यह टूर्नामेंट पहले से ज्यादा बड़ा हो गया है। इतना ही नहीं बीसीसीआई ने इस सीजन पहले से शामिल सभी टीमों को अधितकम 4 खिलाड़ी ही रिटेन करने की इजाजत दी है तो वहीं दो नई टीमें नीलामी से पहले 3 खिलाड़ी ड्रॉफ्ट कर सकते हैं, जिसकी वजह से सभी फ्रैंचाइजियों को अपनी टीम का निर्माण फिर से करने की दरकार है। इसी के चलते कई दिग्गज खिलाड़ी जो पिछले कई सीजन से एक टीम के साथ खेलते नजर आ रहे थे, वो इस साल नीलामी में दूसरी फ्रैंचाइजियों के साथ जुड़ते हुए नजर आ सकते हैं। टीमों के पास राइट टू मैच के तहत रिटेन करने का नियम नहीं है तो सभी के लिये चीजें बराबर रहने वाली हैं।
इंडियन प्रीमियर लीग के 15वें सीजन के लिये 1200 से ज्यादा प्लेयर्स ने रजिस्ट्रेशन कराया था लेकिन 590 खिलाड़ियों को छांटकर नीलामी में जगह दी गई है। इसमें 370 भारतीय और 220 विदेशी खिलाड़ी शामिल हैं, जिन पर बोली लगने के बाद फैन्स को आईपीएल 2022 के लिये अपनी टीमों का पता चलेगा। ऐसे में वो फैन्स जो नीलामी पर करीब से नजर रखने वाले हैं उनके लिये मेगा ऑक्शन के नियमों का जानना जरूरी है। आइये एक नजर उन सभी नियमों पर डालें जो कि मेगा नीलामी के दौरान बड़ा रोल निभा सकते हैं-
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कब इस्तेमाल होता है साइलेंट टायब्रेकर का नियम
वैसे तो खिलाड़ियों के लिये नीलामी के नियम काफी आसान है जिसके तहत हर फ्रैंचाइजी को अपनी टीम बनाने के लिये एक पर्स अलॉट किया गया है, जिसमें सिर्फ 90 करोड़ की राशि खर्च करने की अनुमति दी गई है, हालांकि जब यह टीमें नीलामी में उतरेंगी तो सबसे पर्स की सीमा अलग-अलग होगी, क्योंकि हर टीम ने जिन खिलाड़ियों को रिटेन किया है या फिर ड्रॉफ्ट किया है उनके करार के पैसे भी इसी पर्स में से ही कम होते हैं। नियमों के अनुसार जब ऑक्शनर खिलाड़ी का नाम लेगा तो हर फ्रैंचाइजी उसको लेकर अपनी बोली लगायेगी, जो टीम सबसे ज्यादा बोली लगायेगी उसे उस खिलाड़ी की सेवायें प्राप्त हो जायेंगी।
हालांकि तब क्या हो जब कोई टीम पर्स की बची हुई सारी राशि किसी एक खिलाड़ी को हासिल करने के लिये खर्च कर दिया जाये, उल्लेखनीय है कि आईपीएल के इतिहास में अभी तक ऐसी स्थिति आयी नहीं है लेकिन अगर आती है तो उसके लिये भी आईपीएल मैनेजमेंट ने खास नियम बनाया है जिसे साइलेंट टायब्रेकर कहा जाता है।

इस नियम के तहत खरीदे जा चुके हैं जडेजा-पोलार्ड
साइलेंट टायब्रेकर के नियम के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह कोई नया नियम नहीं है बल्कि साल 2010 से नीलामी के दौरान मौजूद है। इतना ही नहीं इस नियम का इस्तेमाल भी किया जा चुका है। आईपीएल ऑक्शन के शुरुआती दौर में हर खिलाड़ी पर बोली लगाने की एक अधिकतम सीमा तय की जाती थी, उसी दौरान इस नियम के तहत कायरन पोलार्ड को मुंबई इंडियंस और रविंद्र जडेजा को गुजरात लायंस की टीम की ओर से खरीदा जा चुका है।

अब नियम में हो चुका है बदलाव
गौरतलब है कि मौजूदा समय में ऑक्शन के दौरान किसी भी खिलाड़ी पर बोली लगाने की कोई सीमा नहीं है जिसके चलते इस नियम में भी बदलाव कर पड़ा है। अब साइलेंट टायब्रेकर के नियम का इस्तेमाल किसी टीम की आखिरी बोली के लिये किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी टीम की बोली दूसरी टीम के बराबर होती है लेकिन उसके पर्स में खर्च करने को पैसा नहीं बचा होता है, तब यह नियम सामने आता है। इस नियम के तहत भले ही फ्रैंचाइजी के पर्स में पैसा नहीं बचा हो लेकिन जिस टीम ने सबसे ज्यादा बोली लगाई होती है उसे खिलाड़ी की सेवायें मिल जाती हैं, और इस नियम के तहत उसे प्लेयर के साथ करार करने का मौका मिलता है।

कैसे काम करता है यह नियम
इस नियम के तहत दोनों टीमें आखिरी बोली के लिये लिखित में करार देंगे, जिसका पता दोनों में से किसी भी टीम को नहीं होगा। आईपीएल गवर्निंग काउंसिल इस बोली को देखेगी और जिस टीम ने सबसे ज्यादा बोली लगाई होगी उसे इस खिलाड़ी की सेवायें मिल जायेंगे।
गौरतलब है कि साइलेंट टायब्रेकर के नियम के तहत टीमों के बोली लगाने पर कोई सीमा तय नहीं की गई है। हालांकि पर्स से अतिरिक्त राशि खिलाड़ी के बजाय आईपीएल के पास जायेगी। नीलामी में यह स्थिति आखिरी स्टेज में ही देखने को मिल सकती है।












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