भगवान के नाम पर भीख मांगना मना है
कुल्लू। हिमाचल प्रदेश में सप्ताहभर चलने वाले सदियों पुराने कुल्लू दशहरा से ठीक पहले सरकार ने देवताओं के नाम पर भीख नहीं मांगने का दिशा निर्देश जारी किया है। परंपरा के मुताबिक, श्रद्धालु तुरही और ढोल के मधुर संगीत के बीच अपने गांव के मंदिरों से देवताओं की प्रतिमा एक सुंदर सी पालकी में लेकर कुल्लू पहुंचते हैं।

पर्व के पहले और अंतिम दिन सारे देवता यहां इकट्ठा होते हैं और मुख्य देवता भगवान रघुनाथ के नेतृत्व में दशहरा जुलूस में भाग लेते हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने एक दिशा-निर्देश जारी कर कहा है कि पर्व के दौरान देवताओं की गरिमा बनाए रखी जाना चाहिए।
हालिया बैठक के दौरान मुख्यमंत्री ने जिले के अधिकारियों से कहा, "देवताओं का प्रतीक लिए उनके नाम पर सड़कों पर भीख मांगने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे लोग जनता के विश्वास से खेलकर अनावश्यक तौर पर संस्कृति को बदनाम करते हैं।"
अधिकारियों ने कहा कि यह भी निर्देश जारी कर दिया गया है कि इस बार देवताओं को ले जाने के लिए केवल पालकी का इस्तेमाल होगा, इस दौरान परिवहन के लिए किसी भी वाहन का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। कंवर ने बताया कि लगभग 200 देवी-देवताओं को त्योहार में शामिल होने के लिए आमंत्रण भेजा गया है। यह आमंत्रण पुरोहितों द्वारा भेजा गया है। उल्लेखनीय है कि कुल्लू दशहरे का आयोजन तीन अक्टूबर से नौ अक्टूबर तक होगा।
यह दशहरे का अनोखा त्योहार है, क्योंकि जिस दिन देशभर में दशहरा खत्म होता है, यहां उसकी शुरुआत होती है। यह त्योहार 1637 में तब से मनाया जा रहा है, जब राजा जगत सिंह कुल्लू के महाराज थे।
दशहरा के दौरान भगवान रघुनाथ के सम्मान में उन्होंने तमाम स्थानीय देवताओं को कुल्लू आमंत्रित किया था। तब से सैकड़ों गांवों के मंदिरों के देवी-देवताओं को हर वर्ष इस समारोह में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है। अन्य जगहों की तरह दशहरा में यहां रावण, मेघनाद और कुभकर्ण के पुतले नहीं जलाए जाते।












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