राजस्थान का यह अनूठा गांव जो जाना जाता है मोलेला, मृण शिल्प के नाम से, आज जानिए इसके बारे में
Special village of Rajasthan: वैसे तो पूरी दुनिया में राजस्थान की अपनी अलग ही पहचान है। रंग रंगीला यह प्रदेश पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक अपनी कला, संस्कृति और अनूठी परम्पराओं से पहचाना जाता है।
आज हम आपकों राजस्थान के एक ऐसे अनूठे गांव के बारे में बता रहे है जो सात समंदर पार तक मोलेला और मृण शिल्प जैसी अनूठी कला के बारे में जाता है।
राजसमंद की खमनोर तहसील का एक छोटा सा गांव है मोलेला। इस गांव का नाम मोलेला और मृण शिल्प एक दूसरे के पूरक माने जाते है।

इसका कारण है मृण शिल्प के जन्मदाता पद्मश्री स्व मोहनलाल कुम्हार ने इसी गांव मे रहकर अपनी कला को निखारा है। सिर्फ निखारने के साथ ही देश-विदेश मे इसकी ख्याति को पंहुचाया है। इस कला के चलते उन्होने करीब एक दर्जन विदेशों मे यात्राएं की और वहां रहने वाले कलाकारों को ये कलाकृतियां बनाना सिखाया।
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सबसे पहले वे एक विद्यालय मे चपरासी की नौकरी करते थे। इन्हे विदेशियों द्वारा 1984 आस्ट्रेलिया मे ले जाया गया। वहां पर करीब एक महीने तक रहकर कलाकारों को प्रशिक्षण दिया।
उसके बाद अमेरिका मे चालीस दिन की यात्रा करके प्रशिक्षण दिया। उसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री ईन्दिरा गांधी के आग्रह पर उन्हे पद्मश्री सम्मान दिया गया। उसके बाद से लगातार सफलता की सीढीयां चढते गये। संसाधनों के अभाव मे नदी और खेतो की चिकनी मिट्टी जमा करके उसे भिगोकर रखा जाता था।
उसके बाद बिना किसी सांचे के हाथों से उसे अलग अलग आकृति देकर सजीव मुर्तिया बनाना शुरू किया जो प्रकृति के अनुरूप इको फ्रेंडली थी। शुरुवाती दौर मे इन मूर्तियों का उपयोग स्थानीय घरों मे सजावट के लिए उपयोग किया जाता था।
लेकिन समय बीतने के साथ इस कला मे और निखार आता गया। धीरे धीरे इसका प्रचार प्रसार होता गया और आज इस कला ने देश विदेशो तक फेल गयी। उस दौर मे इस गांव से दिल्ली जाने के लिये साधन सुविधाएं भी उपलब्ध नही थे। लेकिन उन्होने हिम्मत नही हारी और निरंतर प्रयास करते रहे। इस यात्रा के दौरान एक बार उन्हे बस से नीचे उतार दिया गया। बामुश्किल वे दिल्ली तक पंहुच पाये।
सफलता के कदम बढते वे फ्रांस,ग्रीस,स्काईलैण्ड तक पंहुचे। स्व मोहनलाल कुम्हार की सफलता के सोपान 1984 से शुरु हुआ जब इस प्रयोग को किया गया था। उसके बाद 1988 मे मोहनलाल कुम्हार को राष्ट्रीय पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद 2002 मे शिल्पगुरु की उपाधी दी गई।
उसके बाद 2012 मे महामहिम प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के हाथों पद्मश्री की उपाधी प्रदान की गई। उन्होने इस कला को परिवारजनों के साथ गांव के युवाओं को भी सिखाया जो आज भी पूरे गांव के रोजगार का जरिया बन चुका है। उनके पुत्र राजेन्द्र कुमार और दिनेश कुम्हार भी इस कला को आगे बढा रहे है।
2016 मे उनके पुत्र राजेन्द्र कुम्हार को राष्ट्रीय पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। अब मोहनलाल के पौते इस कला को सीख रहे है। गांव के करीब सौ से अधिक परिवार सीधेतौर पर इस कला से जुडे हुए है। वर्तमान मे उनके पौते की मंशा इस कला को निखारने और अपने पद्मश्री दादाजी के नाम को आगे बढ़ाने की है।
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