राजस्थान का एक डॉक्टर, जिसने 'मरे हुए गांव' को 'जिंदा' कर दिया, राजघाट की कहानी डॉ. अश्वनी की जुबानी
Dholpur News in Hindi, राजघाट (धौलपुर)। मिलिए राजस्थान के एक ऐसे डॉक्टर से, जिसने एमबीबीएस की पढ़ाई करते-करते मरे हुए गांव को जिंदा कर दिया। हम बात रहे हैं डॉ. अश्वनी पाराशर की। इन्हें के प्रयासों का नतीजा है कि राजस्थान के धौलपुर जिला मुख्यालय के नजदीक स्थित गांव राजघाट (शहरी क्षेत्र का गांव) में आजादी के बाद पहली बार 5 मई 2019 को बिजली पहुंची है। अगले ही दिन बेटी की शादी थी और गांव में बिजली आने की वजह से यह पहला मौका था जब किसी बेटी की शादी का कार्यक्रम देर रात तक जारी रहा।

(Hindi.oneindia.com) वन इंडिया से खास बातचीत में डॉ. अश्वीन पाराशर ने गांव राजघाट की बदहाली से लेकर इसके विकास का सफर शुरू होने तक की पूरी कहानी सिलसिलेवार बयां की।
वर्ष 2016 तक राजघाट गांव ( Rajghat Village in Dhopur Rajasthan ) के हालात अच्छे नहीं थे। दो साल पहले 21 साल का एमबीबीए स्टूडेंट अश्वनी पाराशर ( Dr. Ashwani Parashar ) राजघाट पहुंचा। फिर इसने जो किया, उससे गांव राजघाट तकदीर और तस्वीर बदलते देर नहीं लगी। देखते ही देखते ही राजघाट के घर-घर में फिल्टर वाटर सिस्टम लग गए। घर सोलर ऊर्जा से रोशन होने लगे। शुद्ध पेयजल के लिए पाइप लाइन डल गई और सड़क का ख्वाब भी बस पूरा होने ही वाला है।

2016 में ऐसे शुरु हुई राजघाट के बदलाव की कहानी
राजघाट में बदलाव की यह कहानी बेहद प्रेरणादायक है। शुरुआत वर्ष 2016 में उस समय हुई जब राजस्थान की राजधानी जयपुर से एमबीबीएस कर रहे अश्वनी पाराशर दिवाली की छुट्टियों में अपने घर धौलपुर आए। उस समय अश्वनी के मेडिकल, इंजीनियरिंग और लॉ के अन्य साथी भी घर आए हुए थे। सबने तय किया कि क्यों ना इस बार की दिवाली की खुशियां किसी ऐसी जगह मनाई जाए, जहां जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान लाई जा सके।

लाशें हटाकर पानी पीने को मजबूर थे ग्रामीण
अश्वनी पाराशर और उनके करीब 15 दोस्तों ने 8-9 हजार रुपए एकत्रित किए और उबाड़-खाबड़ रास्ते, गहरी खाई और पगडंडियों से होते हुए चार वाहनों के जरिए चंबल किनारे बसे राजघाट पहुंचे। यहां पहली बार आए थे। इस गांव के हालात किसी ढाणी से भी बदतर थे। गांव वालों के साथ दिवाली मनाई और उनकी समस्याओं पर सामान्य तौर चर्चा शुरू की तो ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें पीने का शुद्ध पानी तक नसीब नहीं हो रहा है। कई बार चंबल नदी के पानी में बहकर आने वाली लाशों को हटाकर हलक तर करने को मजबूर हैं। अन्य मूलभूत सुविधाओं से भी महरूम हैं। इसके बाद सभी दोस्त अपने घर लौट आए।

राइट टू लाइफ दिलवाने की ठानी
दिवाली की छुट्टियों मनाकर अश्वनी जयपुर आने के बाद एमबीबीएस की पढ़ाई में जुट गए, मगर दिल में ग्रामीणों की लाशें हटाकर पानी पीने वाली बात घर कर गई। लगा कि देश में राइट टू एजुकेशन, राइट टू इनफार्मेशन जैसी बातें हो रही हैं और राजघाट के लोगों को राइट टू लाइफ तक नहीं मिला। राजघाट में सरकार ने एक हैण्डपंप और 5वीं तक की सरकारी स्कूल के अलावा कभी कुछ करवाया। हैण्डपंप का पानी 16 टीडीएस का था, जो खारा था। ग्रामीण उस पानी को पीने की बजाय कपड़े में ही काम ले रहे थे।

पीएम को खत लिखा, फंड जुटाना शुरू किया
जयपुर में पढ़ाई के साथ अश्वनी ने राजघाट के लोगों को राइट टू लाइफ दिलवाने की ठानी और मेडिकल स्टूडेंट, डॉक्टरों आदि से फंड जुटाना शुरू किया। तब किसी ने सलाह दी कि राजघाट के लिए कुछ करना ही चाहते हो तो इसमें सरकार को भी शामिल करो ताकि मूलभूत सुविधाएं स्थायी हो सके। ऐसे में अश्वनी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खत लिखा और पूरे हालात बयां किया। राइट टू लाइफ का सवाल उठाया।
दिसम्बर 2016 में पीएमओ से न केवल खत का जवाब आया बल्कि जनवरी 2017 में धौलपुर कलक्टर सूची त्यागी, एसपी राजेश सिंह, एसडीएम मनीष फौजदार व बिजली-पानी महकमे के अभियंताओं समेत 15 अधिकारियों की टीम गांव राजघाट भी पहुंची। यह पहला मौका था कि जब इतनी बड़ी संख्या में अधिकारी राजघाट की सुध लेने पहुंचे थे।
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हाईकोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया
गांव में अधिकारियों के पहुंचने से पहले तक अश्वनी और ग्रामीणों के बीच कोई खास जुड़ाव नहीं था, लेकिन अश्वनी के पास गांव के एक लड़के का फोन आया कि गांव में बड़े-बड़े अफसर आए और बड़ी-बड़ी घोषणाएं करके गए हैं कि आपको जल्द ही बिजली मुहैया करवाई जाएगी ताकि गांव से शहर जाकर फोन चार्ज करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। गांव के लड़के की ये बातें सुनकर अश्वनी को लगा कि उसकी मुहिम रंग लाने लगी है। इस ओर थोड़ा और ध्यान दिया जाना चाहिए। यही सोचकर अश्वनी ने राजस्थान हाईकोर्ट में राइट टू लाइफ के लिए जन याचिका लगा दी।

क्राउड फंडिग के जरिए जुटाए पैसे
गांव में अधिकारियों ने दौरा जरूर किया, मगर कई माह तक भी नतीजा सिफर था। ऐसे में अश्वनी और उसके साथियों ने क्राउड फंडिंग के जरिए राजघाट के लिए रुपए जुटाने शुरू किए और तय किया सरकार कुछ करें ना करें, मगर हमारे प्रयासों से वर्ष 2017 की दिवाली से पहले राजघाट में बदलाव दिखना चाहिए। इसी दौरान गुजरात की एनजीओ कर्मा कनेक्ट भी अश्वनी व उसके साथियों से जुड़ गई। दिवाली से पहले तक गांव के उन पांच घरों में सोलर लाइट के जरिए बिजली पहुंचाई, जहां की बेटियां पांचवीं के बाद पढ़ने के लिए गांव से बाहर जाती हैं। नया साल 2018 आते-आते तो पूरे गांव में दिल्ली के एक बिजनेसमैन की आर्थिक मदद से सोलर लाइटें लगवा दी। हर घर में तीन वॉट के तीन-तीन बल्ब जलने लगे। 26 जनवरी 2018 तक गांव के सभी घरों में फील्टर वाटर सिस्टम लगवा दिए।

हाईकोर्ट के नोटिस के बाद चेते अधिकारी
अश्वनी कुमार की ओर से राइट टू लाइफ के लिए हाईकोर्ट में लगाई गई जनयाचिका पर कोर्ट ने राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव, जिला कलेक्टर को नोटिस जारी किया। इसके बाद तो अधिकारियों ने गांव में नियमित दौरे शुरू कर दिए। बिजली पहुंचाने के लिए खम्भे खींच दिए। तार लगा दिए। 7 घरों के नाम से डिमांड राशि जमा करवाई और फिर 5 मई 2019 को गांव राजघाट में बिजली भी पहुंच गई। अगले ही दिन गांव की बेटी उर्मिला की शादी हुई। यह पहली शादी दी कि देर रात तक चली थी क्योंकि गांव में अब बिजली की कोई समस्या नहीं थी।

एनआरआई भी आए मदद को आगे
राजघाट की स्टोरी अब तक देशभर के कई मीडिया संस्थान प्रकाशित कर चुके थे। स्टोरी पढ़कर कई एनआरआई भी राजघाट की मदद को आगे आए। नार्वे इंडियन नार्वेजन कम्यूनिटी ने संदेश भेजा कि लाखों की मदद को तैयार हैं। उन्होंने वहां पर राजघाट के लिए प्रोजेक्ट सक्षम लांच भी किया। इसके अलावा भी अश्वनी की टीम से 250 लोग जुड़े हुए हैं। शुरुआत अकेले ने की, फिर टीम में प्रहलाद, लोकेन्द्र, सौरभ, प्रणव, सीएस राजपूत, विकास, हरचरण, तरुण, रवि दिव्यांक आदि जुड़े और कारवां बढ़ता ही चला गया।

जब गांव से 22 साल बाद निकली बारात
आपको यह जानकारी ताज्जुब होगा कि राजघाट कोई घोषित गांव नहीं बल्कि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के गृहक्षेत्र धौलपुर की नगर परिषद के वार्ड 15 का हिस्सा है। 350 लोगों की आबादी वाला राजघाट राजस्थान-मध्यप्रदेश की सीमा पर चंबल किनारे करीब एककिलोमीटर में फैला आखिरी गांव है। यहां मूलभूत सुविधाएं नहीं होने के कारण कोई अपनी बेटी की शादी करने को तैयार नहीं था। ऐसे में राजघाट को कुंवारा का गांव भी कहा जाने लगा था। हालांकि यहां की बेटियों की शादी दूसरे गांव में होने कोई दिक्कत नहीं थी। अश्वनी के प्रयास से गांव के हालात सुधरे तो 22 साल बाद गांव के पवन की बारात निकली।

मुझे बस एक लाख में से एक गांव कम करना है- अश्वनी पाराशर
राजघाट की दशा बदलने में अश्वनी का सफर जितना आसान दिख रहा है, उतना था नहीं। बकौल, अश्वनी बताते हैं कि एक बार मीडियाकर्मी ने धौलपुर विधायक से राजघाट की समस्या पर सवाल किया तो जवाब मिला कि राजघाट धौलपुर में है क्या? इसी तरह एक वाक्या और हुआ जिसमें खुद अश्वनी से ही पूछ लिया गया कि आप राजघाट को ही क्यों बदलना चाहते हो गांव तो और भी बहुत हैं। अश्वनी ने कहा कि राजघाट जैसे लाखों गांव होंगे, मगर मुझे लाख में से एक गांव कम करना है।
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