Khatu Mela 2025: बाबा श्याम ने 3 बाण से जो पीपल छेदा, वो आज भी मौजूद, VIDEO में देख लो हर पत्ते में हैं छेद
Khatu Mela 2025: खाटूश्यामजी को'तीन बाण का धारी' भी कहते हैं। बाबा श्याम ने जिन तीन बाण से पीपल का जो पूरा पेड़ छेद दिया था वो पेड़ हरियाणा के चुलकाना धाम में आज भी मौजूद है। उसके हर पत्ते में छेद है। पीपल के उस पेड़ पर लोग अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए मन्नत का धागा बाधते हैं और परिक्रमा करते हैं।
इस समय राजस्थान के सीकर जिले के दांतारामगढ़ के खाटू कस्बे में श्री श्याम फाल्गुन लक्खी मेला 2025 चल रहा है, जो 28 फरवरी से शुरू हुआ और 11 मार्च तक चलेगा। खाटू मेला 2025 के मौके पर आइए जानते हैं कि खाटू श्यामजी की तीन बाण से पीपल के पत्तों को छेदने की अद्भुत कहानी।

बाबा श्याम की तीन बाण से पीपल के पत्तों को छेदने की कहानी
यह महाभारत के समय की एक दिलचस्प और रहस्यमयी घटना, जो आज भी रहस्य का रूप लिए हुई है। कहानी वीर बर्बरीक और भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी है।
कथा के अनुसार, जब महाभारत युद्ध की तैयारी हो रही थी, तब भगवान श्री कृष्ण ने घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक (खाटूश्यामजी) को चुनौती दी थी कि वह अपनी तीन अजेय बाणों से पीपल के वृक्ष के पत्तों को छेद कर दिखाए। बर्बरीक ने श्री कृष्ण की चुनौती स्वीकार करते हुए, अपने दिव्य बाण से पीपल के सभी पत्तों को छेद दिया।
यह घटना अद्भुत थी, क्योंकि न केवल पेड़ के पत्तों में छेद हुआ, बल्कि नीचे गिरे पत्तों में भी वही छेद दिखाई देने लगे। यहाँ तक कि बर्बरीक का बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा, क्योंकि एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबा रखा था।
हालांकि, इस घटना के बाद भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए, उसका सिर मांग लिया। बर्बरीक ने भगवान के विराट रूप को देखने की इच्छा जाहिर की और अपनी शर्त पर अपना शीश दान कर दिया। हरियाणा में चुलकाना धाम वह स्थान है जहाँ बर्बरीक ने भगवान कृष्ण को दान में अपना सिर दिया था।
भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक का सिर काटकर उसे एक पहाड़ी पर रख दिया, जहां से बर्बरीक ने युद्ध के सभी घटनाओं को देखा। इस घटना के बाद यह जगह वीर बर्बरीक के नाम से प्रसिद्ध हो गई और यहाँ का पीपल का पेड़ अब भी मौजूद है, जिसमें वह रहस्यमय छेद आज भी दिखाई देते हैं।
खाटूश्यामजी में शीश की पूजा व शीश के दान की पूरी कहानी
खाटूश्यामजी की पूजा विशेष रूप से बर्बरीक के शीश (सिर) की पूजा के रूप में जानी जाती है, जो महाभारत के समय का एक महत्वपूर्ण पात्र था। बर्बरीक, जो घटोत्कच का पुत्र और भीम का पौत्र था, भगवान श्री कृष्ण के साथ युद्ध के समय एक विशेष भूमिका निभाई थी। बर्बरीक के पास तीन अजेय बाण थे, जो उसे महादेव से प्राप्त हुए थे। इन बाणों की शक्ति इतनी महान थी कि वह एक ही बाण से सम्पूर्ण शत्रु सेना का नाश करने में सक्षम था।
महाभारत के युद्ध से पहले जब भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक की शक्ति को देखा, तो वह चिंता में पड़ गए कि अगर बर्बरीक ने कौरवों के पक्ष में युद्ध किया तो अधर्म की जीत हो सकती है। इस वजह से भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया। बर्बरीक ने बिना किसी संकोच के अपना सिर श्री कृष्ण को दे दिया, लेकिन एक शर्त रखी कि वह भगवान श्री कृष्ण का विराट रूप देखना चाहता है और महाभारत युद्ध के सभी घटनाओं को देखना चाहता है।
बाबा श्याम का शीश खाटू कैसे आया?
कथाओं के अनुसार बर्बरीक का शीश सीकर जिले के खाटू में दफ़नाया गया। कहते हैं कि एक गाय उस स्थान पर आकर रोज अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी। बाद में खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया। वहां पर बाद में बाबा श्याम का मंदिर बनाया गया।
मान्यता है कि चुलकाना धाम में वह पीपल का पेड़ आज भी है, जिसके सारे पत्तों में सिर्फ एक बाण से बर्बरीक ने छेद कर दिए थे, जो आज भी नजर आते हैं. पीपल के पेड़ पर लोग अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए मन्नत का धागा बाधते हैं और परिक्रमा करते हैं. कहानियों के अनुसार कहा जाता है कि इस जगह पर ही बाबा ने शीश का दान दिया था।
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