India Pakistan War: जब जैसलमेर एयरबेस पर कब्जा करने आई पाक सेना, 120 सैनिकों ने पलट दी बाजी
India Pakistan War: भारत ने पहलगाम आतंकी हमले का बदला आज 7 मई 2025 को ले लिया। 6 व 7 मई की रात करीब डेढ़ बजे भारतीय सेनाओं ने पीओके व पाकिस्तान में संयुक्त कार्रवाई करते हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाया और आतंकियों के 9 ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। करीब 90 आतंकी ढेर हो गए हैं।
पहलगाम हमले के बाद भारत-पाकिस्तान युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं। 7 मई 2025 को भारत के इलाकों में मॉक ड्रिल होने जा रही है। पूरे देश में हवाई हमलों के सायरन बजेंगे। लोगों को बताया जाएगा कि भारत-पाकितान के बीच जंग होने पर कैसे सुरक्षित रहना है?

भारतीय वायुसेना ने कहा कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्र और आस-पास के सरहदी इलाकों में 7 मई 2025 को वायुसेना अभ्यास करेगी, जिसमें राफेल, मिराज 2000 और सुखोई-30 सहित सभी अग्रणी विमान उड़ान भरेंगे।

इसी संदर्भ में भारत-पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात होने पर जानिए लोंगेवाला की उस ऐतिहासिक लड़ाई के बारे में, जिसमें भारतीय सेना के महज 120 जवानों ने पाकिस्तान सेना के 2000 जवानों को मिट्टी में मिला दिया था।
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लोंगेवाला की लड़ाई कब हुई थी?
साल 1971 का एक ऐसा युद्ध, जिसने दुनिया का नक्शा बदल दिया। एक ऐसा युद्ध, जिसने दुनिया का दृष्टिकोण बदल दिया। एक ऐसा युद्ध, जिसने रणनीति को नई परिभाषा दी। उस दुनिया बदलने वाले युद्ध में लोंगेवाला समेत कई ऐसी लड़ाइयां थीं, जो नजीर बनीं। हम बात कर रहे हैं साल 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की।

जैसलमेर युद्ध संग्रहालय में रखे पाकिस्तानी टैंक
भारत-पाकिस्तान युद्ध 1971 में राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित छोटे से पोस्ट लौंगेवाला पर भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। 120 भारतीय फौजियों ने पाकिस्तान के 2000 सैनिकों का न केवल डटकर सामना किया बिल्क उनको मार भी गिराया। इस बात के सबूत पाक सेना के टैंक आज भी जैसलमेर युद्ध संग्रहालय (Jaisalmer War Museum) में मौजूद हैं।

भारतीय फौज पूर्वी सीमा पर तैनात थी
उस समय राजस्थान में दूर-दूर तक फैले थार रेगिस्तान में स्थित भारत की लौंगेवाला पोस्ट की चौकसी में 120 जवान तैनात थे। यहां चौकसी तो रहती थी, मगर अतिरिक्त तैयारी की कमी थी, क्योंकि उस समय भारतीय फौज का बड़ा हिस्सा भारत की पूर्वी सीमा से लगते पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) से उलझा हुआ था। बाकी भारतीय सैनिक जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा में लगे थे।

राजस्थान की कितने जिलों की सीमा पाकिस्तान से लगती है?
पाकिस्तान ने सोचा कि अपनी गिरेबान पर भारतीय सेना की पकड़ ढीली करवानी है तो कम तैनाती वाली सरहद से दाखिल हुआ जाए और इलाके पर कब्जा जमा लेना चाहिए ताकि पूर्व की भरपाई पश्चिम में हो सके। पश्चिम में राजस्थान के चार जिलों श्रीगंगानगर (210 किमी), बीकानेर (168 किमी), जैसलमेर (464 किमी) और बाड़मेर (228) जिले की कुल 1070 किलोमीटर सीमा पाकिस्तान से लगती है।

राजस्थान बॉर्डर पर तैनात रहते हैं बीएसएफ जवान
Battle of Laungewala इसलिए भी खास थी कि क्योंकि यहां पर दूर-दूर तक सिर्फ रेत ही रेत है। न तो दुश्मन को कोई आड़ और न ही हमें। रेतीले टीले भी ऐसे कि आज यहां तो कल वहां। जगह बदल लेते थे। राजस्थान की सरहद पर नजर रखना अलग ही तरह की चुनौती होती है। आमतौर पर भारत-पाक इंटरनेशनल बॉर्डर का यह इलाका सीमा सुरक्ष बल की देखरेख में रहता है, लेकिन युद्ध के ऐलान के साथ ही भारतीय सेना भी यहां तैनात हो जाती है। 1971 की जंग में ऐसा ही हुआ था।
पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन की अल्फा कंपनी
लौंगेवाला वाला एक सामान्य सा पोस्ट था। लिहाजा 23वीं पंजाब रेजिमेंट की एक कंपनी को इस पोस्ट का जिम्मा दिया गया। भारत-पाकिस्तान के इस अंतरराष्ट्रीय कभी कोई विवाद नहीं रहा। यहां सबसे लंबी 464 किलोमीटर लंबी सरहद जैसलमेर जिले में है। सबसे महत्वपूर्ण इलाका सादेवाला था। लौंगेवाला पोस्ट पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन की अल्फा कंपनी तैनात थी।

मेजर कुलदीप चांदपुरी अगुवाई कर रहे थे
पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन की अल्फा कंपनी की अगुवाई कर रहे थे मेजर कुलदीप चांदपुरी। 1971 की जंग में लौंगेवाला पर किसी तरह का खतरा होगा? यह किसी ने नहीं सोचा था। हालांकि यहां तैनात कंपनी ने ऐसी आशंका जरूर जताई थी, मगर तब यह आशंका बेबुनियाद लग रही थी। पाकिस्तान को भी ऐसा लगता था कि लौंगेवाला पोस्ट से भी भारतीय फौज किसी भी वक्त पूर्वी पाकिस्तान की ओर कूच कर जाएगी।
3 दिसंबर 1971
पाक ने अपने इसी तरह के नापाक मंसूबों के साथ 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने राजस्थान बॉर्डर पर भारतीय फौज के 11 अग्रिम एयरफील्ड और रडार स्टेशन पर एक साथ आक्रामण कर दिया। पाकिस्तान फौज की 18वीं डिविजन के GOC जनरल बीएम मुस्तफा को भारत सीमा में घुसकर यह यह हमले करने का जिम्मा दिया गया था। पाकिस्तान के इस ऑपरेशन का नाम था-"ऑप लव बैक"
जैसलमेर एयरबेस पर कब्जा करने की योजना थी
पाकिस्तानी फौज के ब्रिगेडियर तारिक मीर की अग्रवाई ने बटालियन को आगे बढ़ना था। उनकी योजना लौंगेवाला को बाइपास करते जैसलमेर के रामगढ़ तक दाखिल होते। इनके साथ टैंकों का एक स्क्वाड्रन भी होता। दूसरी ओर से ब्रिगेडियर जहान जे अरबाब की अगुवाई में एक बटालियन को लौंगेवाला पर कब्जा करना था। अंतिम लक्ष्य के तौर पर जैसलमेर एयरबेस पर कब्जा करने की योजना थी, लेकिन आखिरी लम्हे पर तारिक मीर ने प्लान बदलवा दिया।
लौंगेवाला में नाश्ता, रामगढ़ में लंच और जैसलमेर में डिनर
बदले हुए प्लान के तहत तारिक मीर ने लंबे-चौड़े ऑपरेशन की बजाय एक ही साथ पूरी ताकत से आगे बढ़ने की योजना रखी। तर्क यह था कि सीधा पक्का सड़क वाला रास्ता वक्त बचाएगा और 2000 पाकिस्तानी सैनिकों को लौंगेवाला जैसे पोस्ट पर कब्जा जमाने में वक्त भी नहीं लगेगा। पाकिस्तान का प्लान था कि लौंगेवाला में नाश्ता करेगा और रामगढ़ में लंच और जैसलमेर में डिनर।

4 दिसंबर 1971
लौंगेवाला पोस्ट पर चार दिसंबर 1971 को सेकंड लेफ्टिनेंट धर्मवीर की अगुवाई में एक पार्टी गश्त के लिए निकली थी। थार रेगिस्तान के सन्नाटे में उन्हें एक अजीब सी घरघराहट सुनाई दे रही थी। लेफ्टिनेंट धर्मवीर ने तुरंत अपने कमांडिंग अफसर मेजर कुलदीप चांदपुरी को सूचना दी। पता चला कि सामने से पाकिस्तान के करीब 2000 सैनिक, 54 टी-59 शरमन टैंक और लौंगेवाला के पोस्ट पर कुल 120 सैनिक तैनात थे। उनके पास एक जीप लगी गन थी।। मीडियम मशीन गन और तीन मोर्टार। 120 में से भी 30 सैनिक सेकंड धर्मवीर के साथ पेट्रोलिंग कर रहे थे।
मेजर कुलदीप चांदपुरी जानते थे कि पाकिस्तान की दो बटालियन से मुकाबला कर पाना लगभग असंभव था। उन्हें यह भी पता था कि अगर लौंगेवाला पोस्ट पर पाकिस्तान फौज को कुछ समय रोककर रखा जाए तो पीछे तैयारी के लिए वक्त मिल सकता है वरना जैसलमेर एयरबेस तक पाक फौज को पहुंचने से शायद ही कोई रोक पाएगा।

हंटर विमानों के पहुंचने के लिए भी सुबह तक का इंतजार
लौंगेवाला की लड़ाई में पाकिस्तान फौज को मिट्टी में मिला देने वाले मेजर कुलदीप चांदपुरी के साथ-साथ उनकी पूरी कंपनी दिलेर थी। ऐसे में पोस्ट छोड़कर पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं था। लेकिन सवाल यह था कि अब क्या किया जाए? क्योंकि सुरक्षा के नाम पर लौंगेवाला की पोस्ट पर कुछ भी नहीं था। हालांकि तीन तरफ कांटेदार तार लगे थे, लेकिन ये सब दुश्मन को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं थे। चूंकि इस मोर्चे पर अतिरिक्त टैंक व बल पहुंचाना संभव नहीं था। मेजर चांदपुरी ने एयर सपोर्ट की मदद की भी गुजारिश की थी। हंटर विमानों के पहुंचने के लिए भी सुबह तक का इंतजार करना था।
लौंगेवाला की लड़ाई सिर्फ हौसलों से जीती गई
सुबह होने में करीब 5 घंटे का वक्त था। इतनी देर तक तो दुश्मन के खिलाफ डटे रहना जरूरी था। सुबह तक पाकिस्तान सैनिकों को रोके रखना था। जान तो लेकर या जान देकर। मेजर चांदपुर जानते थे कि एक छोटी सी टुकड़ी लेकर इतनी फौज के सामने टकराने का क्या मतलब था? उन्हें पता था यह जंग सिर्फ हौसलों से ही जीती जा सकती है।
जैसे-जैसे शाम ढल रही थी। वैसे-वैसे पाकिस्तानी फौज के टैंकों की आवाज और करीब आती जा रही थी। दरअसल, लौंगेवाला की ओर बढ़ना पाकिस्तान के मूल प्लान का हिस्सा नहीं था। ऐसे में पाक फौज के पास लौंगेवाला पोस्ट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। रात करीब 12 पाकिस्तानी सैनिक लौंगेवाला की पोस्ट के करीब पहुंचे तब तक भारतीय सैनिकों ने पोस्ट के आस-पास कांटेदार तार बिछा दिए थे।

भारतीय सैनिकों के सटीक निशाने से पाक सेना के दो टैंक धवस्त
यूं तो कांटेदार तार बिछाना सिर्फ सतही कोशिश थी, मगर इसे देखकर पाकिस्तानी फौज का माथा ठनका और लगा कहीं यह एंटी टैंक माइन तो नहीं। हालांकि भारतीय सैनिकों ने कई जगहों पर एंटी टैंक माइन भी बिछाई थी। भारतीय सैनिकों को सिर्फ यह फायदा था कि लौंगेवाला पोस्ट थोड़ी ऊंचाई पर था। करीब आकर पाकिस्तानी फौज ने फायरिंग शुरू की तो भारतीय फौजियों ने उन्हें मुंह तोड़ जवाब दिया। भारतीय सैनिकों के सटीक निशाने व एंटी टैंक माइन की चपेट में आने से पाक सेना के दो टैंक धवस्त हो गए।

सड़क छोड़कर पाकिस्तानी फौज ने की गलती
भारतीय सैनिक पाकिस्तान के उन टैंकों पर निशाना साध रहे थे, जिन पर जंग के लिए ईंधन रखा हुआ था। इस दौरान पाक सैनिक लौंगेवाला पोस्ट के आस-पास एंटी टैंक माइन तलाशने के साथ-साथ पोस्ट पर कब्जा करने का दूसरा रास्ता भी खोजने लगे। इसी गफलत में पाक सेना ने पक्की सड़क छोड़ दी और रेत में टैंक उतार दिए। यह गलती पाक सैनिकों को सबसे महंगी पड़ने वाली थी। रेत में फंसे पाकिस्तान टैंक भारतीय सैनिकों के लिए आसान टारगेट बन गए। भारतीय सैनिकों ने निशाना साध-साधकर एक-एक टैंक का सफाया करना शुरू किया।
5 दिसंबर 1971
अब तक 12 पाकिस्तानी टैंक को नष्ट किया जा चुका था। 5 घंटे का वक्त बीत चुका था और सुबह हो गई थी। सुबह की पहली किरण के साथ ही भारतीय वायुसेना के हंटर विमान पाकिस्तानी टैंकरों पर मौत बनकर मंडराने लगे थे। पहले ही हमले में हंटर विमानों ने पाकिस्तानी टैंक की लौंगेवाला में कब्र बना दी। एक-एक विमान बाज की तरह झपट रहा था। एक बार हमला करते। फिर ईंधन के लिए जैसलमेर एयरबेस पहुंचते और दुबारा आकर पाक फौज पर कहर बरपा देते। पहले दिन के अंत तक पाकिस्तान के कुल 15 टैंक व 22 अन्य वाहन नष्ट हो चुके थे, लेकिन जंग यही समाप्त नहीं हुई थी।

6 दिसंबर 1971
भारतीय वायुसेना के फाइटर विमानों द्वारा पाकिस्तान फौज को खदेड़ने व राजस्थान की मिट्टी में मिला देने का काम जारी रहा। दिन खत्म होने तक पाकिस्तान 37 और टैंक गंवा दिए थे। आसमां और जमीन से एक साथ भारतीय सैनिकों के प्रहार से पाकिस्तान की एक पूरी टी-59 रेजिमेंट मिट्टी में मिल गई थी। 200 पाकिस्तानी सैनिकों मारे जा चुके थे।

पाकिस्तानी सैनिकों के मैसेज में दिखा खौफ
इस जंग के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों के जो मैसेज इंटरसेप्ट हुए वो भारतीय जवानों के बहादुरी के किस्से बयां करने वाले थे। पाकिस्तान सैनिकों ने अपने अफसरों को मैसेज भेजे थे कि ''भारतीय वायुसेना के विमानों ने नाक में दम कर रखा है। एक विमान जाता है। दूसरा आता है। 20 मिनट तक ऊपर नाचता है। 40 फीसदी फौज व राशन तबाह हो चुका है। आगे जाने तो क्या पीछे लौटना भी मुश्किल हो गया है। जल्दी हवाई फौज मदद के लिए भेजो, वरना वापस मुड़ना नामुमकिन है।''

मेजर कुलदीप चांदपुरी को महावीर चक्र
लौंगेवाला पोस्ट अदम्य साहस दिखाने वाले वीरों को उनके शौर्य के लिए सम्मानित किया गया। मेजर कुलदीप चांदपुरी को महावीर चक्र से नवाजा गया।
आधा दर्जन देशों की मिलिट्री अकादमी में लौंगेवाला लड़ाई की पढ़ाई
खास बात है कि लौंगेवाला में भारतीय जवानों की जीत पर खूब अध्ययन हुआ। ब्रिटेन की फील्ड मार्शल कारवर ने लौंगेवाला का दौरा किया और मेजर कुलदीप चांदुपरी से पूरी रणनीति समझी। आज ब्रिटेन, फ्रांस, बांग्लादेश समेत आधा दर्जन देशों की मिलिट्री अकादमी में लौंगेवाला की लड़ाई के बारे में विस्तार से पढ़ाया जाता है।

इस जीत पर बनी थी 'बॉर्डर' फिल्म
इस ऐतिहासिक लड़ाई पर 1997 में 'बॉर्डर' फिल्म बनी थी। इसमें सनी देओल ने मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी का किरदार निभाया था। यह फिल्म उस समय की सबसे बड़ी देशभक्ति फिल्मों में शामिल रही।
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