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पंजाब में क्या हैं वोटों के समीकरण, कौन सी पार्टी अपना रही है क्या रणनीति, जानिए सियासी गणित

सभी राजनीतिक दल वोट बैंक को साधने के लिए वोट बैंक को साधने के लिए अलग-अलग रणनीतियां तैयार कर रही हैं। पंजाब में सभी सियासी पार्टियों की निगाह हिंदू वोट बैंक पर टिकी हुई हैं।

चंडीगढ़, अक्टूबर 13, 2021। पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सियासी पार्टियां प्रचार प्रसार जुट चुकी हैं। सभी राजनीतिक दल वोट बैंक को साधने के लिए वोट बैंक को साधने के लिए अलग-अलग रणनीतियां तैयार कर रही हैं। पंजाब में सभी सियासी पार्टियों की निगाह हिंदू वोट बैंक पर टिकी हुई हैं। इसी बाबत शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी हिंदू वोट बैंक को अपने पाले में करने की पुरज़ोर कोशिश कर रही है। चूंकि भारतीय जनता पार्टी को किसान आंदोलन की वजह से हर तरफ़ से विरोध का सामना करना पड़ा रहा है, इसलिए वह ख़ास तौर से हिंदू आबादी वाले क्षेत्र में ज़्यादा मेहनत कर रही है। विधानसभा चुनाव में हिंदू वोट बैंक के सहारे ही सियासी दलों की नैय्या पार हो सकती है।

पंजाब के सियासी समीकरण

पंजाब के सियासी समीकरण

पंजाब में हिंदू वोट बैंक की बात की जाए तो करीब 39 फ़ीसद हिंदू और 33 फीसद अनुसूचित जाति (हिंदू और सिख) चुनाव में जीत दर्ज करने में अहम किरदार अदा करते हैं। पंजाब कांग्रेस ने मास्टरस्ट्रोक खेलते हुए दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। कांग्रेस आलाकमान के इस फ़ैसले कहीं न कही अन्य राजनीतिक पार्टियों को नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं उप मुख्यमंत्री को के कुर्सी पर ओपी सोनी को बैठाकर कांग्रेस ने हिंदू वोट बैंक में सेंधमारी करने की कोशिश ज़रूर की है लेकिन कैप्टन अमरिंदर के इस्तीफ़ा देने के बाद यह वोट बैंक कहीं न कहीं जाने कांग्रेस के पाले से खिसक सकता है। पंजाब की सियासत में यह देखा भी गया है कि हिंदू वोट बैंक जिस पाले में जाता है सरकार उसी पार्टी की बनती है। हालांकि पंजाब कांग्रेस के पास जट्ट नेताओँ की कमी नही हैं लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह के बग़ावती सुर ने पंजाब में कांग्रेस की परेशानी बढ़ा दी है।

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    कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती

    कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती

    पंजाब में सभी सियासी पार्टी अनसुचित जाती के चेहरा को सीएम बनाने का ट्रंप कार्ड खेल ही रही थी की इसी बीच पंजाब कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया। इससे कांग्रेस के पास अनुसूचित जाति चेहरा तो आ गया। अब सवाल यह है कि कांग्रेस के पास कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसा कोई और चेहरा नहीं है जो पूरे पंजाब में अपनी एक अलग पहचान रखता हो। वहीं बात की जाए तो सुनील जाखड़ एक विकल्प के तौर पर नज़र आ रहे हैं लेकिन मौजूदा हालात में वह कांग्रेस से दूरी बनाए हुए नज़र आ रहे हैं। पंजाब कांग्रेस में हिंदू चेहरे के तौर पर अगर भारत भूषण आशु की बात जाए तो उनका दायरा सिर्फ़ लुधियाना तक ही सीमित है। उन्हें पूरे पंजाब में कांग्रेस हिंदू चेहरा के तौर पर प्रोजेक्ट करेगी भी तो ज़्यादा फ़ायदा नहीं मिल पाएगा। ऐसे में कांग्रेस के लिए यह बड़ी चुनौती बनी हुई है कि किस तरह से वह हिंदू वोटर को अपने पाले में बनाए रखे।

    BJP का चुनावी एजेंडा

    BJP का चुनावी एजेंडा

    भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो उनक ज़्यादातर चुनावी एजेंडा हिंदुत्व पर रहता है। हालांकि अभी किसान आंदोलन की वजह भारतीय जनता पार्टी का पक्ष कमज़ोर है लेकिन अगर दूसरी सियासी पार्टी हिंदू वोट बैंक को साधने की सही रणनीति तैयार नहीं कर पाती है तो पंजाब में इसका सीधा फ़ायदा भाजपा को मिलेगा। वहीं अगर शिरोमणि अकाली दल की बात की जाए तो शिअद अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल हिंदु वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। चूंकी शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन में एक साथ चुनाव लड़ रही है। तो इस बाबता सुखबीर सिंह बादल ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी की सरकार में एक अनुसूचित जाति और एक हिंदू मुख्यमंत्री होगा। वहीं सुखबीर सिंह बादल ने हिंदू वोट बैंक का साधने की कोशिश में अपनी घोषणाओं में भी हिंदूओं पर ख़ास ध्यान दे रहे हैं।

    सुखबीर बादल की रणनीति

    सुखबीर बादल की रणनीति

    शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर शिअद में शामिल होने वाले सदस्यों का भी गर्म जोशी स्वागत कर रहे हैं। भाजपा से निकाले जाने के बाद शिरोमणि अकाली दल ने अनिल जोशी को पार्टी में शामिल लिया। पंजाब में अनिल जोशी की छवी बतौर हिंदू नेता काफ़ी अच्छी रही है। हिंदू वोट बैंक को साधने के लिए हि सुखबीर सिंह बादल हिंदुत्व छवी को तरजीह दे रहे हैं क्योंकि भाजपा के साथ गठबंधन में उन्हें बिना मेहनत किए हिंदू समुदाय के वोट मिल जाते थे, लेकिन भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद कहीं न कहीं समीकरण बदले हैं। यही वजह है कि उन्होंने माता चिंतपूर्णी के दर्शन कर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह हिंदुओं के साथ खड़े हैं।

    किसान आंदोलन की शुरुआत

    किसान आंदोलन की शुरुआत

    किसान आंदोलन की शुरूआत पंजाब से ही हुई थी, भारतीय जनता पार्टी बहुत ही अच्छे से जानती है कि कृषि कानून के विरोध की वजह से उन्हें गांवों में और सिखों के वोट नहीं मिलेंगे । BJP ने पंजाब की उन सीटों को चुना है जहां पर हिंदू और दलित आबादी 60 फीसद से ज़्यादा है। ग़ौरतलब है की पंजाब 73 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां पर हिंदू और दलित वोटर की भूमिका अहम रहती है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी इन्हीं सीटों पर अपना खास ज़ोर लगाने जा रही है। फिलहाल भारतीय जनता पार्टी की नज़र उन 45 सीटों पर है जहां पर हिंदू आबादी 60 फीसद से ज़्यादा है। इसके अलावा 28 ऐसी सीटें है जहां पर हिंदू और दलित की आबादी 60 फीसद से ज़्यादा है। वहीं इन सीटों पर किसान आंदोलन का कोई खास असर भी नहीं है। राजनीतिक सलाहकारों की मानें तो यहां की बड़ी आबादी किसान आंदोलन की वजह से पैदा हुए हालातों से नाराज़ भी चल रही है।

    AAP की चुनावी तैयारियां

    AAP की चुनावी तैयारियां

    आम आदमी पार्टी की बात की जाए तो चरणजीत सिंह चन्नी ने मुख्यमंत्री बनते ही आम आदमी पार्टी की ज़्यादातर घोषणाओं को अमलीजामा पहना कर उसके मुद्दे लपक लिए। वहीं अब चुनावी प्रचार-प्रसार में कहीं ना कहीं आम आदमी पार्टी के पास सीएम पद का चेहरा नहीं होना भी मुश्किलें पैदा कर रहा है। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी यह मांग कर रहे हैं कि सीएम पद के दावेदार की घोषणा की जाए लेकिन अरविंद केजरीवाल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। अगर देखा जाए तो आम आदमी पार्टी सामने सबसे बड़ी चुनौती सीएम पद का दावेदार है क्योंकि भगवंत मान के समर्थक आए दिन मान को सीएम पद का दावेदार बनाने की मांग करते रहते हैं। आपसी खींचतान की वजह से आम आदमी पार्टी बिखरी हुई दिख रही है। भगवंत मान भी पार्टी के ज़्यादातर कार्यक्रमों से किनारा किए हुए हैं। भगवंत मान आम आदमी पार्टी पंजाब के वरिष्ठ नेताओं में शुमार किए जाते हैं उनका इस तरह से पार्टी से दूरी बनाए रखना कहीं ना कहीं आम आदमी पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।


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