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पंजाब विधानसभा चुनाव: किसानों ने तो एक जंग जीत ली लेकिन दूसरे की राह आसान नहीं, ये है वजह

पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सभी सियासी पार्टियां चुनावी तैयारियों में जुटी हुई हैं। वहीं किसानों की पार्टी भी चुनावी समर दांव आज़मा रही हैं।

चंडीगढ़, 29 जनवरी 2022। पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र सभी सियासी पार्टियां चुनावी तैयारियों में जुटी हुई हैं। वहीं किसानों की पार्टी भी चुनावी समर दांव आज़मा रही हैं। किसानों ने कृषि कानूनों की वापसी करवाकर एक जंग तो जीत ली लेकिन चुनावी जंग जीतने की राह आसान नहीं लग रही है। चुनाव से पहले ही किसानों की पार्टी में दरार पड़ गई है। किसान आंदोलन के वक्त सभी किसानों ने एकजुट होकर लड़ाई लड़ी लेकिन अब चुनाव में किसानों में एकजुटता नहीं दिख रही है। चुनाव में जब वोट देने की बात आ रही है तो किसान अपनी पुरानी पार्टी, जाती, समुदाय के तहत वोट देने की बात कर रहे हैं। किसान आंदोलन स्थगित होने के बाद 22 किसान संगठनों ने मिलकर संयुक्त समाज मोर्चा का गठन किया जिसकी अध्यक्षता किसान ने बलबीर सिंह राजेवाल कर रहे हैं।

farmers

बलबीर राजेवाल की राह आसान नहीं
संयुक्त समाज मोर्चा के गठन के विधानसभा चुनाव के रण किसानों की एंट्री हुई और किसानो ने चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। इसी के मद्देनज़र संयुक्त समाज मोर्चा की तरफ़ से 110 से ज़्यादा उम्मीदवारों को टिकट भी दिया जा चुका है। वहीं संयुक्त समाज मोर्चा के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल समराला विधानसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतरे हैं। इसी वजह से समराला की गिनती हॉट सीटों में हो रही है। लेकिन चुनाव से ठीक पहले बलबीर सिंह राजेवाल की मुश्किलें बढ़ती हुईं नजर आ रही है। भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहा) समेत दस किसान संगठन ने संयुक्त समाज मोर्चा को समर्थन देने से मना कर दिया है। ग़ौरतलब है कि बीकेयू (एकता उगराहां) का पंजाब के सबसे बड़े किसान संगठन में शामिल है।

किसान नेताओं की हुई अनदेखी
किसान नेताओं का आरोप है कि बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढ़ूनी जैसे किसान नेताओं ने टिकट बंटवारे में आंदोलन से जुड़े किसानों का अनदेखा किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि किसान नेताओं को दरकिनार करते हुए दूसरी पार्टी के नेताओं को टिकट दिया गया है। इसके साथ ही टिकट नहीं मिलने से नाराज किसान नेताओं ने मिलकर 'सांझा पंजाब मोर्चा' का गठन किया है और किसानों की पार्टी के खिलाफ़ हैं। सभी किसान नेताओं वह लोग भी अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हुए हैं। कोई शिरोमणि अकाली दल के साथ है तो कोई आम आदमी पार्टी को पसंद करता है। वहीं कुछ किसान कांग्रेस को वोट देते आ रहे हैं। इस बार भी वह अपनी पुरानी पार्टी को ही वोट करेंगे क्योंकि किसानों की पार्टी में किसान नेताओं की अनदेखी की गई है।

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