पंजाब के दिग्गज चेहरे किस वजह से चुनाव हारे, जानिए कहां हुई चूक ?
पंजाब के चुनावी नतीजे में आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। सभी 117 विधानसभा सीटों चुनावी नतीज़ों की बात की जाए तो आम आदमी पार्टी ने 92 सीटों पर जीत दर्ज की है।
चंडीगढ़, 10 मार्च 2022। पंजाब के चुनावी नतीजे में आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। सभी 117 विधानसभा सीटों चुनावी नतीज़ों की बात की जाए तो आम आदमी पार्टी ने 92 सीटों पर जीत दर्ज की है। कांग्रेस ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की है। वहीं शिरोमणि अकाली दल ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की है। भारतीय जनता पार्टी ने 2 सीटों पर और 1 सीट पर आज़ाद उम्मीदवार ने जीत दर्ज की की है। पंजाब की सियासत के दिग्गज चेहरे को क्यों मात मिली, कहां चूक हुई इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

दोनों सीटों पर हार गए चरणजीत सिंह चन्नी
कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम उम्मीदवार घोषित किया करते हुए चमकौर साहिब और भदौड़ विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा था लेकिन दोनों में से किसी भी सीटों पर उन्हें कामयाबी नहीं मिली। ग़ौरतलब है कि चमकौर साहिब विधानसभा सीट चन्नी की परंपरागत सीट रही है, वहीं उन्होंने सेफ़ गेम खेलते हुए भदौड़ सीट से भी किस्मत आज़माया था । चमकौर साहिब विधानसभा सीट से चरणजीत सिंह चन्नी के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी की तरफ़ से डॉ. चरणजीत सिंह चुनावी मैदान में उतरे थे। भदौड़ सीट की बात की जाए उनके ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी की तरफ़ से लाभ सिंह उगोके चुनावी बिगुल फूंका था। आपको बता दें कि लाभ सिंह एक मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान पर काम करते हैं और उनका कोई ख़ास जनाधार भी नहीं था लेकिन फिर भी उन्होंने चरणजीत सिंह चन्नी को चुनावी दंगल में मात दे दी।

चरणजीत सिंह चन्नी की क्यों हुई हार ?
चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री बने थे इसके बाद भी वह जीत दर्ज नहीं कर पाए आखिर क्या वजह रही ? जबकि अपने 111 दिनों के कार्यकाल में उन्होंने पंजाब की जनता के साथ-साथ दलित समुदाय काफ़ि लोकप्रियता भी हासिल की थी और उनके कामों की सराहना भी हो रही थी। लेकिन इन सबके बावजूद चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। सियासी जानकारों की मानें तो कैप्टन सरकार की नाकामियों का खामियाज़ा चरणजीत सिंह चन्नी को भुगतना पड़ा है। इसके साथ ही अवैध खनन के मामले उच्चस्तरीय जांच भी उनके लिए निगेटिव प्वाइंट साबित हुआ है। चुनाव के दौरान उनके भतीजे पर हुई कार्रवाई भी उनकी हार की वजह मानी जा रही है। जिस तरह से उन्होंने लोकप्रियता हासिल की थी, उनके भतीजे पर हुई कार्रवाई के बाद से जनता के बीच में उनके लिए निगेटिव छवि बन गई। बिहारी और यूपी वाले बयान से भी चन्नी का जनाधार खिसक गया। इसका नतीजा हुआ कि दोनों सीटों पर उन्हें शिकस्त मिली।

कैप्टन अमरिंदर सिंह से कहां हुई चूक ?
पंजाब के चुनाव में कैप्टन अमरिंदर सिंह की भी क़िस्मत दांव पर लगी हुई थी । कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पटियाला शहरी सीट से चुनावी बिगुल फूंका लेकिन कामयाबी हासिल नहीं कर पाए। उनके खिलाफ़ आम आदमी पार्टी की तरफ़ से अजीतपाल सिंह कोहली ने चुनावी ताल ठोका था। पहली बार में ही कैप्टन को उनके गढ़ में ही मात दे दी। कैप्टन से कहां चूक हुई इस मामले में सियासी जानकारों का कहना है कि वह अपने कार्यकाल के दौरान जनता की पहुंच से दूर थे। किसान आंदोलन के दौरान किसानों के साथ थे लेकिन उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन करना उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ। इसके साथ ही पिछले चुनाव के दौरान किए गए घोषणाओं को अमलीजामा नहीं पहनाना भी उनकी हार की एक बड़ी वजह है।

सुखबीर सिंह बादल को क्यों मिली मात ?
पंजाब के दिग्गज नेताओं में सुखबीर सिंह बादल का नाम शुमार किया जाता है। उन्हे एक सुलझे हुए नेता और चुनावी रणनीति में कुशल प्रबंधक के तौर पर जाना जाता है। ग़ौरतलब है कि सिखबीर सिंह बाद ने जब से चुनावी सफ़र का आग़ाज़ किया कभी भी मात नहीं खाई थी। इस बार आम आदमी पार्टी की सुनामी ने उनके इस रिकॉर्ड को भी ख़ाक में मिला दिया। सुखबीर सिंह बादल ने जलालाबाद विधानसभा सीट से चुनावी बिगुल फूंका था। उनके ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी की तरफ़ से जगदीप 'गोल्डी' कंबोज चुनावी मैदान में उतरे थे। उन्होंने ने ही सुखबीर बादल को मात दी है। सियासी जानकारों का कहना है कि सुखबीर सिंह बादल के हारने की सबसे बड़ी वजह शिअद की सरकार में बेअदबी का मामला, रेत, ड्रग्स, केबल जैसे मामले में ठोस क़दम नहीं उठाना है। इसके साथ ही उनपर हथियारों के बल पर अपने व्यापार को बढाने का आरोप भी हार की वजहों में से एक है।

दो दिग्गजों को एक साथ मात
शिअद नेता बिक्रम सिंह मजीठिया और पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू अमृतसर ईस्ट विधानसभा सीट से आमने-सामने चुनावी मैदान में उतरे थे। इन दोनों के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी की तरफ़ से जीवनजोत कौर ने चुनावी बिगुल फूंका था और उन्होंने यहां से जीत भी दर्ज कर ली। नवजोत सिंह सिद्धू के लिए अमृतसर ईस्ट विधानसभा सीट से चुनाव में जीत दर्ज करना नाक का सवाल बना हुआ था। दूसरी ओर सिद्धू की चुनौता क़बूल करते हुए शिअद नेता बिक्रम सिंह मजीठिया अपने गढ़ को छोड़कर अमृतसर ईस्ट विधानसभा चुनाव से पर्चा भरते हुए जीत का दावा किया था। दोनों प्रत्याशी एक दूसरे को हराने की चक्कर में ख़ुद ही हार गए। बिक्रम सिंह मजीठिया के हारने की सबसे बड़ी वजह चुनाव के दौरान ड्रग्स मामले में गिरफ़्तार होना बताई जा रही है। वहीं सिद्धू के हारने की वजह अपनी पार्टी के खिलाफ़ ही रणनीति तैयार करना और बयानबाज़ी बताई जा रही है।

प्रकाश सिंह बादल को अपने ही गढ़ में मात
पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल के सबसे वरिष्ठ नेता प्रकाश सिंह बादल ने लांबी विधानसभा सीट से चुनावी बिगुल फूंका था। इस सीट से उनके ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी के गुरमीत सिंह खुडियां चुनावी मैदान में उतरे थे। आप की लहर में उन्होंने (गुरमीत सिंह खुडियां) प्रकाश सिंह बादल को उनके ही परंपरागत सीट पर मात दे दी। ग़ौरतलब है कि प्रकाश सिंह बादल 1997 से लेकर पांच बार इस सीट से विधायक चुने जा चुके हैं। वह अपने सियासी सफ़र के दौरान अभी तक 10 बार विधायक चुने जा चुके हैं। सियासी जानकारों की मानें तो प्रकाश सिंह बादल ने किसी को भी पार्टी में अपने समानांतर खड़ा होने नहीं दिया। शिरोमणि अकाली दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती एसजीपीसी के अध्यक्ष जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा थे इसलिए उन्हें भी प्रधान के पद से हटवा दिया था।

जनता ने सीनियर बादल पर क्यों नहीं जताया भरोसा ?
प्रकाश सिंह बादल चुनाव हार जाएंगे इसकी कल्पना अच्छे-अच्छे चुनावी रणनीतिकारों ने भी नहीं की थी। लेकिन हक़ीक़त यही है कि वह चुनाव हार चुके हैं। सियासी जानकारों की मानें तो प्रकाश सिंह बादल के चुनाव में हार की सबसे की बड़ी वजह उनकी उम्र है। 8 दिसंबर 2020 को प्रकाश सिंह बादल 94 साल की आयु पूरी कर चुके हैं। शिरोमणि अकाली दल की चुनावी रणनीति का एक हिस्सा यह भी था कि प्रकाश सिंह बादल को लंबी विधानसभा से चुनावी रण में उतारा जाए ताकि वह सीट शिअद के खाते में आ जाए। लेकिन उनकी उम्र की वजह से जनता नें उन पर भरोसा नहीं जताया। सियासी जानकारों की मानें तो मतदाताओं में यह चर्चा ज़ोरों पर थी कि प्रकाश सिंह बादल सिर्फ़ डमी प्रत्याशी हैं, लंबी से जीत दर्ज करने के बाद सारे फ़ैसले कोई और ही लेगा। इस वजह से भी जनता ने उन्हें वोट नहीं किया क्योंकि उनकी उम्र ज़्यादा हो चुकी है और ज़्यादातर वह बीमार भी रहते हैं।
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