इंजीनियर नीतीश विपक्षी एकता के बड़े आर्किटेक्ट, पटना महासम्मेलन को लेकर जबर्दस्त माहौल
Patna Opposition Party Meeting: गणतंत्र की जननी बिहार अब राष्ट्रीय राजनीति को नयी दिशा देगी। राजधानी पटना में शुक्रवार को विपक्ष के 18 दलों की बहुचर्चित बैठक हो रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले दो महीने से जिस विपक्षी एकता के लिए मुहिम चला रहे थे अब उसकी नीतिगत परिणति होने वाली है। इंजीनियर नीतीश अब विपक्षी एकता के नये आर्किटेक्ट हैं। इस बैठक में विचार-विमर्श के बाद यह तय होगा कि 2024 में भाजपा को केन्द्र की सत्ता से कैसे हटाया जाया।
सबसे पहले महबूबा मुफ्ती पटना पहुंची
पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती गुरवार साढ़े दस बजे ही पटना पहुंच गयीं। विपक्षी नेताओं में सबसे पहले आगमन उनका ही हुआ। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, सीपीआइ के महासचिव डी राजा, भाजपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य गुरुवार को पटना पहुंच रहे हैं। झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन, एनसीपी के नेता शरद पवार, फारुख अब्दुल्ला, महाराष्ट्र के पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे, उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश यादव और सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी शुक्रवार की सुबह पहुंचेंगे। बैठक शुक्रवार को दिन के 11 बजे से होगी।

मुख्य आकर्षण राहुल गांधी
विपक्षी नेताओं की बैठक शुक्रवार को मुख्यमंत्री आवास में आयोजित है। पहले यह बैठक 12 जून को आयोजित होने वाली थी। लेकिन यह इसलिए टल गयी थी क्यों कि कांग्रेस और द्रमुक के बीच कुछ गतिरोध हो गया था। फिर इसकी तारीख 23 जून निर्धारित की गयी। इस बैठक के खास आकर्षण हैं राहुल गांधी। राहुल गांधी और कांग्रेस के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे शुक्रवार की सुबह पटना पहुंचेंगे। विपक्षी एकता की बैठक में शामिल होने से पहले राहुल गांधी प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बिहार कांग्रेस के नेताओं के साथ राय विचार करेंगे। इस बैठक की कामयाबी इस बात पर निर्भर है कि इस संबंध में कांग्रेस क्या रुख अपनाती है। आज की तारीख में कांग्रेस (51) ही लोकसभा में सबसे बड़ी पिपक्षी पार्टी है। जब कि द्रमुक के 24 और तृणमूल के 22 सांसद ही हैं। इसलिए इस बात पर भी निगाह रहेगी कि एमके स्टालिन, ममता बनर्जी, शरद पवार और अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के प्रति क्या रवैया अपनाते हैं। इन नेताओं के मन में कांग्रेस को लेकर एक हिचक रही है।
कांग्रेस नेता के बयान से नीतीश कुमार असहज !
अभी तक नीतीश कुमार कांग्रेस के बड़े तरफदार रहे हैं। वे इस बात की वकालत करते रहे हैं कि कांग्रेस को भी विपक्षी एकता में साझादीर बनाया जाना चाहिए। लेकिन हाल के दिनों में उनकी कांग्रेस को लेकर नाखुशी बढ़ी है। चार दिन पहले बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने कहा था कि 23 जून के बाद बिहार में कैबिनेट का विस्तार होगा जिसमें कांग्रेस के दो नेता शामिल होंगे। अखिलेश सिंह के इस बयान को मुख्यमंत्री के विशेषाधिकार में हस्तक्षेप माना गया। नीतीश कुमार इससे असहज माने जा रहे हैं। नीतीश कुमार ने आखिरी समय में चेन्नई की यात्र क्यों स्थगित की ? उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव एयरपोर्ट पर सीएम का इंतजार करते रहे। फिर उन्हे अचानक सूचना मिली कि सीएम ने चेन्नई की यात्रा स्थगित कर दी। वैसे तो सीएम की यह यात्रा स्वास्थ्य कारणों से स्थगित की गयी है। लेकिन जानकारों का कहना है कि इसकी वजह राजनीतिक है।
नीतीश ने चेन्नई यात्रा क्यों स्थगित की थी ?
कांग्रेस और द्रमुक के बीच असहमति के कारण ही 12 जून की की बैठक स्थगित की गयी थी। कांग्रेस के लिए द्रमुक को मनाने की जिम्मेदारी नीतीश कुमार पर आ गयी। उन्होंने तेजस्वी यादव के साथ चेन्नई जाने का कार्यक्रम भी बना लिया था। लेकिन ऐन वक्त पर उन्होंने ये यात्रा स्थगित कर दी। क्या नीतीश कुमार का आग्रह कांग्रेस के प्रति कम हो गया है ? क्या वो कांग्रेस को उसकी हाल पर छोड़ देना चाहते हैं ? विपक्ष के इस महासम्मेलन में माकपा, भाकपा और भाकपा माले के नेता भी शामिल हैं। कांग्रेस को वाम दलों से भी दिक्कत हो सकती है। बिहार में कांग्रेस की (दो मंत्री पद) मांग को लेकर तेजस्वी यादव पहले से ही नाराज बताये जा रहे हैं। वे कह चुके हैं कि कैबिनेट विस्तार में कांग्रेस को केवल एक मंत्री पद मिलेगा।
कांग्रेस की भी अपनी परेशानियां
कांग्रेस का मानना है कि कुछ क्षेत्रीय दल बिना आधार वाले राज्यों में भी चुनाव लड़ते हैं जिससे कांग्रेस को नुकसान पहुंचता है। भाजपा विरोधी मतों के बंटवारा का मतलब है कांग्रेस का वोट काटना। कांग्रेस को अरविंद केजरीवाल से ज्यादा दिक्कत है। आप ने गुजरात और गोवा में चुनाव लड़कर कांग्रेस का वोट काटा जिससे भाजपा को फायदा मिला। अब आप ने मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी चुनाव लड़ने की घोषणा की है। आप का कहना है कि यदि कांग्रेस चाहती है कि हम मध्यप्रदेश और राजस्थान में चुनाव नहीं लड़े तो उसे भी दिल्ली और पंजाब छोड़ना पड़ेगा। ऐसे में राहुल गांधी से संबोधन पर सबकी निगाह रहेगी।
विपक्षी एकता के पक्ष में जबर्दस्त माहौल
लेकिन एक बात तो तय है कि पटना में आयोजित विपक्ष के महासम्मेलन से राष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ गयी है। योजना बना कर इतनी बड़ी बैठक शायद ही पहले हुई है। इनका एक मंच पर जुटना, वैकल्पिक राजनीति की दिशा में बढ़ाया गया एक बड़ा कदम माना जाएगा। विपक्षी दलों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं तो उनकी मजबूरियां भी हैं। वे भी मानते हैं कि बिना एक हुए भाजपा को हराना मुमकिन नहीं। ये मजबूरी अब बढ़ती जा रही है। अगर आज एक नहीं हुए तो कल बहुत देर हो जाएगी। इसलिए हो सकता है कि शुक्रावार को अलग अलग राग अलापने वाले दल समूहगान के लिए तैयार हो जाएं।












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