बिहार: तो क्या महादलितों के विरोधी हैं नीतीश कुमार?

नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। बिहार में चले राजनीतिक घटनाक्रम का एक मैसेज साफ है कि नीतीश कुमार महादलित समाज के विरोधी हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाया। मांझी ने 140 विधायकों का समर्थन रहने के बावजूद नैतिकता का परिचय देते हुए,सदन की गरिमा को बरकरार रखने के लिए और सदन में खून खराबा न हो, इसीलिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर उचित कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पद के लिए बेचैन नितीश जी का असली चेहरा जनता के सामने उजागर हो गया है।

महादलित का बलिदान

जीतन राम मांझी के इस्तीफे के बाद राजग ने नीतीश कुमार पर एक महादलित का बलिदान करने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस का मानना है कि भाजपा की घबराहट के चलते विश्वास मत से कुछ ही घंटे पहले मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने इस्तीफा दिया और बिहार के चुनाव में इस दल को अपने षडयंत्र की कीमत चुकानी पड़ेगी।

जनता को जवाब देना

बिहार मामलों के जानकार कहते हैं कि नीतीश कुमार को बिहार की जनता को जवाब देना होगा और उसे यह समझाना होगा कि उन्होंने आठ महीने पहले मांझी को मुख्यमंत्री क्यों बनाया था। नीतीश कुमार अपने राजनीतिक अवसरवाद के लिए इस तरह का खेल खेलते रहे हैं। उनका कोई सिद्धांत नहीं है। वह सत्ता में बने रहने के लिए इस तरह की अनैतिक चीजें करते रहते हैं।

दलितों में विभाजन पैदा किया

बिहार की जनता यह सब देख रही है। नीतीश कुमार ने महादलित की राजनीति करके पहले दलितों में विभाजन पैदा किया। उन्होंने पहले पासवान समुदाय को नुकसान पहुंचाया। खुद सत्ता हासिल करने के लिए अब उन्होंने एक महादलित जीतन राम मांझी का बलिदान किया।

इस बीच, भाजपा के वरिष्ठ नेता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि भाजपा महादलित मुख्यमंत्री के साथ खड़ी थी। पूरे मामले को जदयू का आंतरिक मामला बताते हुए शाहनवाज ने कहा कि किस गुट को बहुमत है इसका फैसला सदन में होना था। जो उचित था भाजपा उसके साथ खड़ी थी। हमने एक महादलित को अधर में नहीं छोड़ा। हम पूरी मजबूती से उनके साथ खड़े रहे।

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