Hate Story of Bihar: अस्पताल के कूड़ेदान के पास सोयी महिला
पटना (मुकुंद सिंह)। देश की अदालतों में क्रूर हत्याओं के कई मामले हैं, जहां केवल इसलिये सजा नहीं हो पा रही है, क्योंकि मानवाधिकार आयोग अपनी टांग अड़ाये हुए है। मानवाधिकार आयोग से जुड़े लोग मनुष्यों के अधिकार को बचाने के हर संभव प्रयास में रहते हैं, चाहे फिर वो बलात्कारी ही क्यों न हो। उन्हीं से हम मात्र दो सवाल पूछ रहे हैं। साथ में तीन सवाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बिहार के स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन से।
- पहला सवाल: बिहार में इस प्रकार के सरकारी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर उनकी नज़र क्यों नहीं जाती?
- दूसरा सवाल: कानून द्वारा बनाये गये मानवाधिकार क्या इन गरीबों पर लागू नहीं होते?
अंतिम तीन सवाल इसआंखों देखी दास्तां और उसकी तस्वीरों के बाद-
सहरसा के सदर थाना क्षेत्र के भेरधरी वार्ड नंबर 37 में रहने वाली वृद्ध महिला- बाबू दाए दासी (उम्र करीब 65), सुबह शौच के लिये निकली और तभी अचानक मेड़ के पास पैर फिसल गया और वो गिर गई। इस दौरान उसके पैर और कमर की हड्डी टूट गई। दर्द से करहाती, ये महिला किसी तरह सदर अस्पताल के इमरजेंसी वॉर्ड में पहुंची।
दर्द से करहाती महिला जब डॉक्टर के कमरे में दाखिल होने लगी तो उसे रोक दिया गया। असहाय अवस्था में वो इमरजेंसी कक्ष के मुख्य द्वार पर महिला कूड़ेदान के पास ही लेट गई। देखते ही देखते उसकी आंख लग गई। अस्पताल का बाकी स्टाफ भी आ गया। जमीन पर महिला सोई हुई थी और बगल में ही डॉक्टर और कंपाउंडर बैठे रहे। किसी ने भी वृद्ध महिला को देखने का कोई प्रयास नहीं किया।
महिला सोते-सोते करहा रही थी, आंख खुली तो दर्द से रोने लगी। वहां से जो भी गुजरता, वह महिला उसके पैर पकड़ लेती और कहती, "हमार देहियां बहुते पीराता भईया इलाज करा द"। गेट के बाहर जमीन पर लेटी महिला दर्द से करहाती रही, लेकिन कोई उसकी सुनने वाला नहीं था।
एक नजर कूड़े दान पर
यह वो कूड़े दान है, जिसमें लोग पान, गुटखा, आदि की पीक थूकते हैं। घाव की ड्रेसिंग के वक्त हटायी जाने वाली रुई, पट्टी, आदि इसमें फेंकी जाती है। इस्तेमाल किये गये सिरिंज इसमें फेंके जाते हैं और ढेरों कीटाणुओं से युक्त इस्तेमाल किये गये रुई के फाये भी। ऐसा कूड़ेदान जिसे आपका बच्चा अगर छू भर ले, तो आप पांच बार डिटॉल से हाथ धुलवायेंगे।
क्या हुआ आगे
वहां मौजूद शख्स ने जब महिला की तस्वीर खींची, तब डॉक्टर अचानक हलकान हो गये। कंपाउंडर और डॉक्टर को समझ आ गया कि यह खबर मीडिया में जा सकती है। बस देखते ही देखते ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर एनके सादा अपनी टीम के साथ उस कचरे के डिब्बे के पास पहुंच गये, जहां महिला पड़ी थी। वृद्ध महिला के लिये बेड का इंतजाम किया गया और एक्सरे कराया गया। फिलहाल इलाज जारी है।
स्लाइडर में देखें अस्पताल की तस्वीरें-

अस्पताल में पड़ी महिला
इस सरकारी अस्पताल में अधिकांश गरीब लोग इलाज कराने के लिए आते हैं, लेकिन किसी के पास इन ईलाज के लिए समय ही नहीं है।

ठंड से बचने के इंतजाम नहीं
सदर अस्पताल में इलाज करवाने के लिए आने वाले मरीजों के लिए भीषण ठंड से बचाने का कोई इंतजाम नहीं है।

रात को कंबल तक नहीं मिलता
अस्पताल में भर्ती महिला मरीजो को शीत लहर से बचने के लिए न ही कम्बल नसीब हो रहा है और न ही बेड पर कोई बिछावन। इस वजह से इस भीषण ठंड में भर्ती मरीजों को ठंड से रात में ठिठुरना पड़ रहा है।

क्या कहते हैं भर्ती मरीज
भर्ती महिला मरीजों ने बताया कि सरकार द्वारा रात में ठंड से बचने के लिए दिए गए कम्बल नहीं दिया जाता है और तो और कई बार तो अस्पताल में बेड भी उपलब्ध नहीं कराया जाता है।

डिलीवरी के बाद मिलती है जमीन
महिलायें अक्सर रात को ही अस्पताल में डिलीवरी कराने आती हैं। लोग जानते हैं बेड और कंबल नहीं मिलेगा इसलिये औरतें रात को विछावन या कम्बल लेकर आती हैं। नहीं लाने पर ठंड से ठिठुरना पड़ता है।

तीसरा सवाल- नीतीश कुमार से
10 साल राज करने के बाद एक बार फिर आपको मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाने वाली गरीब जनता क्या कूड़े दान के पास सोने के लिये बनी है?

चौथा सवाल- तेज प्रताप से
बिहार के अस्पतालों में मूलभूत सुविधाएं कब मुहैया करायी जायेंगी। कब तक जमीन पर बच्चे जन्म लेंगे। और कब कूड़े के पास सोते रहेंगे मरीज?

पांचवां सवाल- डा. हर्षवर्धन से
बतौर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री क्या आप बता सकते हैं कि वो दिन कब आयेगा जब देश के प्रत्येक क्षेत्र में शौचालय होगा?












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