जज भी करें संपत्ति की घोषणा, संसदीय समिति की मांग

संसद की कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी समिति ने अपनी 133वीं रिपोर्ट में न्यायपालिका से संबंधित कई मामलों पर अपने विचार सामने रखे हैं. इनमें सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी हाई कोर्ट के जजों की संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक किये जाने का मामला भी शामिल है.
मौजूदा व्यवस्था में जजों के लिए यह जानकारी देना अनिवार्य नहीं है. 2009 में सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट के जजों ने नियमित रूप से अपनी संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक करने का संकल्प लिया था, लेकिन यह संकल्प सफल नहीं हुआ.
अदालतों ने खुद लिया था संकल्प
समिति ने कहा कि जजों द्वारा नियमित रूप से अपनी संपत्ति की घोषणा करने और उस जानकारी को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया को संस्थागत रूप देना जरूरी है. समिति के मुताबिक ऐसा करने से सिस्टम में और भरोसा और विश्वसनीयता आएगी.

कानूनी मुद्दों से संबंधित वेबसाइट 'द लीफलेट' के मुताबिक उच्च अदालतों में 15 प्रतिशत से भी कम जजों नेअपनी संपत्ति की जानकारी दी है. 2021 में आई इस वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक उस समय सुप्रीम कोर्ट के सिर्फ दो जजों और कुछ हाई कोर्ट के मुट्ठी भर जजों की संपत्ति की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध थी.
इन उच्च अदालतों में दिल्ली, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मद्रास और पंजाब और हरियाणा शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले मई 1997 में ऐसा संकल्प पारित किया था, लेकिन उस समय इस जानकारी को सार्वजनिक करने की बात नहीं थी.
सभी जजों को अपनी इच्छा से अपनी संपत्ति की जानकारी मुख्य न्यायाधीश को देनी थी. लेकिन अगस्त 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने एक संकल्प पारित कर कहा कि उसके सभी जजों द्वारा अपनी इच्छा से दी गई अपनी संपत्ति की जानकारी को सार्वजनिककिया जाएगा.
मुट्ठी भर जज देते हैं जानकारी
इसके बाद कई उच्च अदालतों ने भी इसी तरह के संकल्प पारित किये. लेकिन इन प्रस्तावों के पारित होने के 12 सालों बाद भी हालत यह हैं कि सिर्फ मुट्ठी भर जज अपनी संपत्ति की जानकारी देते हैं.
'द लीफलेट' के मुताबिक 2021 में सुप्रीम कोर्ट में 33 जज थे और उस समय उनमें से सिर्फ दो जजों की संपत्ति की जानकारी अदालत की वेबसाइट पर मौजूद थी. इनमें से भी एक जज की जानकारी मार्च 2018 की थी और दूसरे जज की जुलाई 2017 की.
देश की 25 उच्च अदालतों में से सिर्फ सात के जजों की संपत्ति की जानकारी उपलब्ध थी. इनमें से भी सिर्फ तीन हाई कोर्ट में आधे से ज्यादा जजों ने यह जानकारी दी थी. संसद में इस संबंध में कानून लाने की कई असफल कोशिशें पहले भी की जा चुकी हैं.
323 सालों में होगा समाधान
इस मुद्दे के अलावा अलावा संसदीय समिति ने जजों द्वारा अवकाश लेने के विषय परभी अपने विचार रखे हैं. समिति के मुताबिक देश की अदालतों में लंबित मामलों के बढ़ते बोझ को देखते हुए अदालतों को अवकाश के पूरे सिस्टम को बदलना चाहिए.

देश की अदालतों में अमूमन गर्मियों में सात हफ्तों का और सर्दियों में दो हफ्तों का अवकाश होता है. 2009 में विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि सभी अदालतों की छुट्टियों में 10 -15 दिनों की कटौती करनी चाहिए ताकि लंबित मामलों की समस्या का बेहतर सामना किया जा सके.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की सभी अदालतों में कुल मिलाकर करीब पांच करोड़ मामले लंबितपड़े हैं. इनमें सबसे ज्यादा मामले (4.32 करोड़) निचली अदालतों में लंबित हैं. उच्च अदालतों में करीब 59 लाख और सर्वोच्च न्यायालय में करीब 70,000 मामले लंबित हैं
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति लवू नागेश्वर राव ने मई, 2023 में कहा था कि इन सभी मामलों का समाधान करने में 323 साल लग जाएंगे. उन्होंने कहा था कि लंबित मामलों के समाधान के लिए मध्यस्थता जैसे वैकल्पिक तरीकों का सहारा लेना चाहिए.
Source: DW
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