Jayanti Pradhan : MBA डिग्रीधारक किसान जयंती प्रधान मशरूम से हर साल कमा रही 25 लाख रुपए

ओडिशा, 20 मई। मिलिए इनसे ये हैं जयंती प्रधान। लीक से हटकर काम करती हैं। धान व गेहूं की परम्परागत खेती को छोड़कर मशरूम उगाती हैं। 38 की उम्र में मशरूम से मशहूर हो चुकी जयंती छप्परफाड़ कमाई कर रही हैं। तीन दर्जन से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दे रखा है।

मशरूम उगाने वालीं जयंती प्रधान का साक्षात्कार

मशरूम उगाने वालीं जयंती प्रधान का साक्षात्कार

वन इंडिया हिंदी से बातचीत में जयंती प्रधान ने बयां किया अपनी तरक्की का पूरा सफर। जयंती कहती हैं कि मैंने एमबीए किया है। एमबीए की डिग्री हाथ में आने के साथ ही लाखों के जॉब भी ऑफर होने लगे थे, मगर मैं किसी एमएनसी के एसी के कमरों में बैठकर काम करने की बजाय जमीन से जुड़कर लोगों को रोजगार मुहैया करवाना चाहती थी।

 कौन हैं महिला किसान जयंती प्रधान?

कौन हैं महिला किसान जयंती प्रधान?

बता दें कि प्रगतिशील महिला किसान जयंती प्रधान मूलरूप से ओडिशा के बारगढ़ जिले के गोडभगा की रहने वाली हैं। ये गेहूं व धान की पराली का इस्तेमाल मशरूम उगाने और वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने में करती हैं। इसे खेती का एकीकृत मॉडल कहा जाता है। इनके खेतों को गोपाल बायोटेक एग्रो फार्म के नाम से जाना जाता है।

केवीके से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण

जयंती प्रधान बताती हैं कि साल 2003 में नौकरी बजाय खेती करने की ठानी। हमारे यहां अधिकांश लोग धान की खेती करते हैं, मगर मशरूम उगाना चाहती थी, मगर मशरूम की खेती की एबीसीडी तक नहीं जानती थीं। इसलिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से इसका प्रशिक्षण लिया। फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और मशरूम की खेती जयंती प्रधान की पहचान बन चुकी है।

स्थानीय स्तर पर ही बिक जाती है मशरूम

स्थानीय स्तर पर ही बिक जाती है मशरूम

ओडिशा की मशरूम वुमन जयंती प्रधान के अनुसार उनके जिले में धान की खेती खूब होती है। ऐसे में पराली की उपलब्धता भी काफी है। अधिकांश ​किसान पराली जला देते हैं, मगर अब पराली की बड़े पैमाने पर हम खरीद कर लेते हैं। उस पराली के बेड बनाकर उनमें मशरूम उगाते हैं। उसे 'पैरा मशरूम' (पैडी स्ट्रॉ या चायनीज़ मशरूम) कहते हैं। यह मशरूम सब्जी बनाने में काम आती है। स्थानीय स्तर पर इसकी काफी डिमांड है। मशरूम से प्रोसेसिंग के बाद आचार, पापड़ जैसे एक दर्जन प्रोडक्ट तैयार करती हैं।

पति भी करते हैं सपोर्ट

पति भी करते हैं सपोर्ट

बता दें कि जयंती प्रधान की साल 2008 में कालाहांडी निवासी बीरेंद्र प्रधान से हुई। वे सरकारी नौकरी करते थे। साल 2013 में उन्होंने मशरूम की खेती में प​त्नी की मदद के लिए नौकरी छोड़ दी। बीरेंद्र बताते हैं कि मैं खुद भी किसान परिवार से हूँ। मैंने MBA किया है और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज, मुंबई से सोशल वेलफेयर में भी एक कोर्स किया है। इसके बाद मैंने कई सामाजिक संगठनों के साथ काम किया और फिर मुझे जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (DRDA) में सरकारी नौकरी मिली। लेकिन, अपनी जमीन से हमेशा मेरा जुड़ाव रहा और जयंती के आने के बाद, मुझे यह महसूस हुआ कि खेती में ही आगे बढ़ा जाए।

 मुर्गी, बत्तख और बकरी पालन भी

मुर्गी, बत्तख और बकरी पालन भी

उल्लेखनीय है कि फिलहाल जयंती और बीरेंद्र बारगढ़ और कालाहांडी दोनों जगह काम कर रहे हैं। बारगढ़ में उनका मशरूम फार्म, ट्रेनिंग सेंटर, वर्मीकम्पोस्टिंग यूनिट और पौधों की नर्सरी का सेटअप है। वहीं, कालाहांडी में इन्होंने पांच एकड़ जमीन पर तालाब खुदवाया हुआ है। जिसमें केतला और रोहू जैसी मछलियों को पालन करते हैं। दो साल पहले ही मछली पालन करना शुरू किया है। इसके अलावा, हम मुर्गी पालन, बत्तख पालन, और बकरी पालन भी करते हैं।

अब दूसरों को देने लगे ट्रेनिंग

अब दूसरों को देने लगे ट्रेनिंग

जयंती प्रधान बताती हैं कि किसानों और महिलाओं को मशरूम की ट्रेनिंग देने के साथ-साथ, उन्हें केंचुआ खाद तथा मशरूम के खाद्य उत्पाद बनाने और पशुपालन की भी ट्रेनिंग दी है। हमारे पास सिर्फ अपने जिले से ही नहीं बल्कि दूसरे जिलों से भी किसान आते हैं। हमारा अपना एक ट्रेनिंग सेंटर है, जिसमें एक बार में 50 लोग रुककर, ट्रेनिंग ले सकते हैं। इस ट्रेनिंग सेंटर को तैयार करने के लिए हमें 'नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन' से मदद मिली थी। यहां पर हमने कम से कम 10 हजार लोगों को ट्रेनिंग दी है, जिनमें से लगभग पांच हजार लोग मशरूम और दूसरे कामों में आगे बढ़ रहे हैं।

 पति भी करते हैं सपोर्ट

पति भी करते हैं सपोर्ट

बता दें कि जयंती प्रधान की साल 2008 में कालाहांडी निवासी बीरेंद्र प्रधान से हुई। वे सरकारी नौकरी करते थे। साल 2013 में उन्होंने मशरूम की खेती में प​त्नी की मदद के लिए नौकरी छोड़ दी। बीरेंद्र बताते हैं कि मैं खुद भी किसान परिवार से हूँ। मैंने MBA किया है और टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज, मुंबई से सोशल वेलफेयर में भी एक कोर्स किया है। इसके बाद मैंने कई सामाजिक संगठनों के साथ काम किया और फिर मुझे जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (DRDA) में सरकारी नौकरी मिली। लेकिन, अपनी जमीन से हमेशा मेरा जुड़ाव रहा और जयंती के आने के बाद, मुझे यह महसूस हुआ कि खेती में ही आगे बढ़ा जाए।

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