क्या सुप्रिया सुले महाराष्ट्र की भावी CM हैं ? लालू यादव से अलग है शरद पवार की कहानी

महाराष्ट्र की राजनीति में भविष्य में अगर एनसीपी से कोई मुख्यमंत्री बनता है, तो वह कौन होगा? इसे लेकर चर्चा जोरों पर है। हाल ही में शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले का एक पोस्टर सामने आया है।

ncp sharad pawar daughter supriya sule poster showing as next cm candidate in maharashtra

बिहार और महाराष्ट्र के दो राजनीतिक घरानों की महत्वाकांक्षा अब चरम पर है। बिहार में लालू यादव के पुत्र तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मुहिम तेज हो गयी है। फिलहाल वे उपमुख्यमंत्री पद पर हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कुर्सी खाली करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र में शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने के लिए पोस्टर युद्ध शुरू हो गया है। सुप्रिया अभी सांसद हैं। उन्हें शरद पवार का उत्तराधिकारी बताने के मकसद से पोस्टर लगाया गया था जिसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की राजनीति में हलचल है।

राकांपा में उत्तराधिकार के लिए पोस्टर युद्ध

राकांपा में उत्तराधिकार के लिए पोस्टर युद्ध

शरद पवार की उम्र 83 साल हो चुकी है। स्वास्थ्य कारणों से अब उनकी राजनीतिक सक्रियता पहले की तरह नहीं रही। देर-सबेर किसी न किसी नेता को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की कमान संभालनी पड़ेगी। हाल ही में राकांपा कार्यालय के बाहर सुप्रिया सुले को सीएम चेहरा बताते हुए पोस्टर और बैनर लगाये गये थे। सुप्रिया सुले से संबंधित यह पोस्टर दरअसल एक जवाबी मुहिम का हिस्सा था। कुछ दिनों पहले पार्टी कार्यालय के बाहर एक पोस्टर लगा था जिसमें जयंत पाटिल को राकंपा का भावी सीएम उम्मीदवार बताया गया था। इस पोस्टर के जवाब में ही सुप्रिया सुले को शरद पवार का असली राजनीतिक वारिस बताया गया था। फिर इस लड़ाई में अजीत पवार भी कूद गये। उन्हें भी भावी सीएम उम्मीदवार के रूप में पेश किया गया। आखिर कौन है शरद पवार का राजनीतिक उत्तराधिकारी ?

पवार को सुप्रिया सुले पर भरोसा

पवार को सुप्रिया सुले पर भरोसा

शरद पवार ने इस सवाल का जवाब 2019 में दे दिया था। महाराष्ट्र की प्रदेश राजनीति में शरद पवार ने अपने भतीजे अजीत पवार को आगे बढ़ाया था। अपनी एकमात्र संतान सुप्रिया सुले को केन्द्रीय राजनीति में स्थापित किया था। लेकिन 2019 में जब अजीत पवार ने राकांपा से बगावत कर भाजपा के साथ सरकार बना ली तो शरद पवार को बहुत धक्का लगा। उस समय सुप्रिया सुले अपने पिता के साथ खड़ी रहीं। डैमैज कंट्रोल के लिए अपनी राजनीतिक सूझबूझ दिखायी। नाराज चचेरे भाई (अजीत पवार) को मना कर फिर पार्टी में ले आयीं। यह उनके राजनीतिक कौशल से ही संभव। इसके बाद तय हो गया कि सुप्रिया सुले ही शरद पवार का राजनीतिक उत्तराधिकारी बनेंगी। पवार भी अपनी पुत्री की राजनीतिक योग्यता से बहुत प्रभावित हुए। सुप्रिया सुले ने राजनीतिक संकट के समय पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने की प्रतिभा दिखायी। अजीत पवार राकंपा के विधायकों को तोड़ नहीं सके। नतीजतन मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस को इस्तीफा देना पड़ा। तब से शरद पवार का अपनी बेटी पर भरोसा बढ़ गया। दूसरी तरफ अजीत पवार पार्टी में तो आ गये लेकिन उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो गयी।

सुप्रिया को आगे बढ़ाने की सधी चाल

सुप्रिया को आगे बढ़ाने की सधी चाल

शरद पवार को राजनीति का चाणक्य कहा जाता है। वे सही समय पर अपनी चाल चलते हैं। वे सुप्रिया सुले की राजनीतिक योग्यता से जरूर प्रभावित रहे लेकिन सार्वजनिक रूप से कभी उन्हें उत्तराधिकारी नहीं बताया। शरद पवार और लालू यादव में यही अंतर है। करना वही है लेकिन बिना किसी शोर-शराबे के। शरद पवार कहते रहे कि सुप्रिया को राज्य की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसलिए वे सांसद के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। दूसरी तरफ अजीत पवार विधायक हैं और वे राज्य की राजनीति संभाल रहे हैं। यानी शरद पवार ने बेटी और भतीजे के बीच अधिकारों का बंटवारा कर दिया था। लेकिन जानकारों का कहना है कि ये केवल छलावा है। 2019 में अजीत पवार ने इसलिए बगवात की थी क्यों कि राकंपा की अंदरुनी राजनीति में उन्हें तरजीह नहीं दी जा रही थी। शरद पवार दूरदर्शी नेता हैं इसलिए वे बिना सामने आये सुप्रिया सुले को स्थापित कर रहे हैं। ताकि सब कुछ स्वभाविक लगे। वे दिखावे के लिए यह भी कहते हैं कि परिवार से बाहर का भी कोई व्यक्ति राकंपा की कमान संभाल सकता है। लेकिन हकीकत में सुप्रिया को ही यह जिम्मेदारी मिलने वाली है।

सुप्रिया के लिए पवार को जल्दबाजी नहीं

सुप्रिया के लिए पवार को जल्दबाजी नहीं

राजनीतिक समझ, शिक्षा और उम्र के लिहाज से तेजस्वी यादव और सुप्रिया सुले में कोई तुलना नहीं है। तेजस्वी की शिक्षा और उम्र दोनों कम है। जब कि सुप्रिया पढ़ी लिखी और अनुभवी नेता है। उन्होंने संघर्ष के बाद राजनीति में जगह बनायी है। इसके उलट तेजस्वी को सब कुछ जल्दी इसलिए मिल गया क्यों कि वे लालू यादव के पुत्र हैं। 2015 में पहली बार विधायक बने और उसी समय उप मुख्यमंत्री भी बन गये। सुप्रिया सुले 2009 में पहली बार सांसद बनी। 14 साल की राजनीति के बाद अब उन्हें पार्टी का सीएम चेहरा बताने की कोशिश हो रही है। शरद पवार किसी जल्दबाजी में नहीं हैं। वे सधी हुई चाल चलना चाहते हैं। 2019 में अगर उन्होंने महाराष्ट्र में भाजपा से समझौता कर लिया होता तो सुप्रिया सुले केन्द्र में मंत्री बन गयी होतीं। लेकिन शरद पवार इसके लिए राजी नहीं हुए। शरद पवार ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुझसे मिल कर काम करने का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर महाराष्ट्र में राकांपा के सहयोग से भाजपा की सरकार बन जाती है तो केन्द्र में सुप्रिया सुले को कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन मैंन विनम्रतापूर्वक इससे इंकार कर दिया था।

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