उद्धव कैसे बन गए मुसलमानों की पहली पसंद, हिंदू हृदय सम्राट के बेटे के सामने कांग्रेस भी फीकी पड़ी

Maharashtra Lok Sabha Election: शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने जिस पार्टी की नींव रखी थी, वह मुसलमानों के लिए अछूत थी। शिवसेना संस्थापक की नीतियों और बयानों की वजह से महाराष्ट्र के मुसलमान उनकी पार्टी को अपना राजनीतिक दुश्मन समझते थे। लेकिन, उद्धव ठाकरे के लिए मुसलमानों ने दिलों के दरवाजे खोल दिए हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) में महज 5 वर्षों में जो बदलाव आया है, वह बहुत ही अप्रत्याशित है। कभी शिवसेना से कन्नी काटने वाले मुसलमानों के लिए आज पार्टी संस्थापक के बेटे में ही अपना सियासी भविष्य नजर आता है। इस बदलाव के पीछे खुद शिवसेना (यूबीटी) सुप्रीमो और बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे हैं।

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मुसलमानों के प्रति उद्धव ठाकरे का बदल गया नजरिया
इसी साल फरवरी में मुंबई में पार्टी कार्यकर्ताओं से उद्धव ने कहा था कि राज्य के मुसलमान अब पार्टी की ओर देख रहे हैं। उनके मुताबिक इसकी वजह ये है कि शिवसेना (यूबीटी) और बीजेपी का हिंदुत्व अलग है। उन्होंने कहा था, 'हमारा हिंदुत्व घरों के चूल्हे जलाने की कोशिश करता है, जबकि, बीजेपी का हिंदुत्व घरों को जलाता है।'

हिंदू हृदय सम्राट के बेटे के लिए बदला मुसलमानों का विचार
इस बार के लोकसभा चुनावों में उनकी बातों का बहुत ही खास असर नजर आ रहा है। पहली बार मुसलमानों को उद्धव ठाकरे में ऐसा नेता नजर आ रहा है, जो उनके मुताबिक सभी के साथ एक बर्ताव का भरोसा देता है। उद्धव के पिता बाल ठाकरे खुद को गर्व से 'हिंदू हृदय सम्राट' कहलाना पसंद करते थे। लेकिन, उद्धव ने महाराष्ट्र की राजनीति की इस धारा को बदल दिया है और मुसलमानों के बीच लोकप्रियता के मामले में आज वह कांग्रेस से भी आगे दिख रहे हैं।

बाला साहेब भड़काऊ भाषण देते थे, उद्धव नहीं- मुस्लिम बुद्धिजीवी
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक जलगांव में कई शैक्षणिक संस्थान चलाने वाले इकरा एजुकेशनल सोसाइटी के अध्यक्ष अब्दुल करीम सालार कहते हैं, जहां तक उद्धव ठाकरे की बात है, मुसलमानों का दृष्टिकोण बदल गया है। उन्होंने कहा, 'बाला साहेब भड़काऊ भाषण देते थे, जिससे मुसलमान असहज हो जाते थे। उद्धव ठाकरे के साथ मैंने महसूस किया है कि वह कभी भी सांप्रदायिक विवाद भड़काने जैसा कभी नहीं बोलते।'

इस वजह से उद्धव पर आया मुस्लिम नेता का दिल
यह महाराष्ट्र के सिर्फ एक इलाके की बात नहीं है। मुसलमानों के बीच उद्धव की लोकप्रियता पूरे प्रदेश में देखी जा सकती है। हालांकि, इसके लिए कारण अलग-अलग बताए जाते हैं। मसलन, मालेगांव में उद्धव की पार्टी के एक नेता मोहम्मद आसिफ कहते हैं, 'मैं शिवसेना के अल्पसंख्यक मोर्चा का उपाध्यक्ष था। मैंने उद्धव जी से कहा कि अल्पसंख्यक मोर्चा का पुनर्गठन करें। उन्होंने कहा, ऐसा कोई मोर्चा नहीं होगा, क्योंकि शिवसैनिकों में कोई भेद नहीं होगा। इसने मेरे दिल को छू लिया।'

मालेगांव धुले लोकसभा क्षेत्र के अंदर आता है, जहां कांग्रेस और बीजेपी में लड़ाई है। उन्होंने कहा, 'अगर शिवसेना का उम्मीदवार भी होता तो भी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बड़ी तादाद में वोट करते। '

उद्धव ने लाउडस्पीकरों पर बैन नहीं लगाया- मुस्लिम ऐक्टिविस्ट
मालेगांव के ही एक सामाजिक कार्यकर्ता खलील अब्बास कहते हैं कि 'जब वे (उद्धव) मुख्यमंत्री थे, तो अजान में लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल को लेकर एक विवाद था। कई तरह के आरोप लगने के बावजूद उन्होंने लाउडस्पीकरों पर बैन नहीं लगाया। यह मुस्लिम समुदाय के लिए हैरान करने वाला था और उन्होंने इसे सकारात्मक रूप से लिया।'

साधुओं के लिंचिंग केस में भी मुसलमानों के बीच बढ़ी उद्धव की लोकप्रियता
इसी तरह धुले में एक स्टील फर्नीचर की दुकान चलाने वाले युवा अब्दुल हुसैन मलिक कहते हैं, '(उद्धव)सबको साथ लेकर चलने की बात करत हैं।' वो 2020 में पालघर में 2 साधुओं की लिंचिंग करके की गई हत्या को याद दिलाते हुए कहते हैं, 'एक मुख्यमंत्री के रूप में वे सच्चाई के साथ खड़े रहे और इस केस में किसी कम्युनल ऐंगल को खारिज कर दिया। हमें अच्छा लगा कि कोई तो है, जो सभी नागरिकों को समान समझता है।'

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