Devendra Fadnavis कैबिनेट में शामिल होने वाले शिंदे पहले Ex-CM नहीं हैं!कितने पूर्व मुख्यमंत्री का हुआ डिमोशन?
Maharashtra News: महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे देवेंद्र फडणवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए हैं। वो ऐसा करने वाले राज्य के पहले नेता नहीं हैं। प्रदेश की उतार-चढ़ाव से भरी राजनीति में इससे पहले भी कई बार ऐसी स्थिति आ चुकी है, जब सीएम को डिप्टी सीएम या मंत्री पद से संतोष करना पड़ा है।
महाराष्ट्र में राजनीतिक मजबूरियों की वजह से कई ऐसे मौके आए हैं, जब किसी मुख्यमंत्री को मंत्री पद लेना पड़ा है या फिर ज्यादा से ज्यादा उपमुख्यमंत्री बनने का मौका मिला है। एकनाथ शिंदे से पहले दो बार ऐसा भी हो चुका है कि जिस मुख्यमंत्री की अगुवाई में गठबंधन को जीत मिली हो, उस सीएम का चुनाव जीतने के बाद भी डिमोशन हुआ है।

सीएम पद की दावेदारी सरेंडर करने को क्यों मजबूर हुए शिंदे?
इस बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में महायुति गठबंधन की अगुवाई सीएम होने के नाते एकनाथ शिंदे ने की। लेकिन, पिछली बार भी सबसे बड़ी पार्टी रही बीजेपी को बहुत ही अप्रत्याशित जीत मिली और वह अकेले सामान्य बहुमत (145) के आंकड़े के करीब (132) पहुंच गई।
जबकि, शिंदे की पार्टी शिवसेना उससे बहुत ही पीछे (57 सीट) पर अटक गई। ऐसी स्थिति में बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस के लिए मुख्यमंत्री पद की दावेदारी सरेंडर करना शिंदे की मजबूरी बन गई।
फडणवीस की अगुवाई में जीतने के बाद भी उद्धव बन गए सीएम
2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ भी ऐसा ही हुआ था। लेकिन, तब परिस्थितियां और कारण बिल्कुल अलग थे। तत्कालीन सीएम फडणवीस की अगुवाई में बीजेपी की अगुवाई वाला गठबंधन जीता था।
बीजेपी तब भी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और शिवसेना को उससे लगभग आधी सीटें मिली थीं।। लेकिन, उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने की जिद ठान दी। आखिरकार उनकी अगुवाई में शिवसेना चुनाव-पूर्व गठबंधन को तोड़कर कांग्रेस-एनसीपी के साथ जा मिली।
शिंदे के लिए फडणवीस को भी सरेंडर करना पड़ा था सीएम पद
फडणवीस कुछ घंटों के लिए दोबारा सीएम जरूर बने, लेकिन उन्हें आखिरकार गद्दी छोड़नी पड़ी। ढाई साल बाद जब एकनाथ शिंदे की अगुवाई में सरकार बनी तो उन्हें दो बार सीएम रह चुकने के बाद भी उपमुख्यमंत्री बनकर रहना पड़ा।
सुशील कुमार शिंदे को देशमुख के लिए छोड़ना पड़ा पद
इससे पहले 2009 में कांग्रेस नेता सुशील कुमार के साथ भी ऐसा हो चुका है। वे सीएम थे और उनकी अगुवाई में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार बरकरार रही थी। लेकिन, परिणाम आने के बाद शिंदे को एक और कांग्रेसी दिग्गज विलासराव देशमुख के लिए सीएम पद खाली करना पड़ा।
1970 के दशक से चल रहा है यह सिलसिला
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्रियों के इस तरह से डिमोशन का यह सिलसिला 1970 के दशक से चला आ रहा है। आपातकाल के दौरान तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कांग्रेसी दिग्गज एसबी चव्हाण को सीएम बनवा दिया। बाद में उनकी जगह वसंतदादा पाटिल सीएम बने।
इसके कुछ ही समय बाद 37 वर्षीय शरद पवार ने कांग्रेस (यू)-कांग्रेस(आई) को तोड़कर अपनी एक अलग पार्टी बनाई और जनता पार्टी से मिलकर सरकार बना लिया। पूर्व सीएम एसबी चव्हाण उनकी सरकार में मंत्री बनने के लिए तैयार हो गए।
पूर्व सीएम शिवाजीराव को भी बनना पड़ा मंत्री
इससे पहले वही पवार चव्हाण सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। आगे चलकर 1980 के दशक में चव्हाण को फिर से मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। इसी तरह से 80 के दशक के मध्य में शिवाजीराव पाटिल निलंगेकर कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री बने। लेकिन, 2003 में जब सुशील कुमार शिंदे को कांग्रेस ने सीएम बनाया तो शिवाजीराव को उसमें मंत्री पद स्वीकार करना पड़ा।
दो-दो बार के सीएम अशोक चव्हाण भी बाद में बने मंत्री
मौजूदा भाजपा सांसद अशोक चव्हाण का सियासी इतिहास तो और भी मजेदार है। उन्हें दो-दो बार कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। लेकिन, जब 2019 में उद्धव ठाकरे सीएम बने तो वह उनकी सरकार में मंत्री भी बनने के लिए राजी हुए।
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नारायण राणे भी सीएम बनने के बाद तीन सरकारों में बने मंत्री
इनसे पहले केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता नारायण राणे भी शिवसेना-बीजेपी सरकार में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। लेकिन, बाद में जब वह कांग्रेस में थे तो उन्होंने विलासराव देशमुख, सुशील शिंदे और अशोक चव्हाण तीनों की ही सरकारों में मंत्री बनना स्वीकार किया।
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