‘हिंदी बनाम मराठी’ विवाद से महाराष्ट्र की सियासत में बवाल, राज ठाकरे और निशिकांत दुबे की जुबानी जंग पहुंचा SC

PIL on Raj Thackeray: महाराष्ट्र में 'हिंदी बनाम मराठी' को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक बड़े राजनीतिक बवाल का रूप ले चुका है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के प्रमुख राज ठाकरे (Raj Thackeray) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद निशिकांत दुबे (Nishikant Dubey) के बीच शुरू हुआ जुबानी जंग ने भाषा के विवाद को उबाल पर ला दिया है।

दोनों नेताओं के बयान न सिर्फ आपत्तिजनक माने जा रहे हैं, बल्कि इससे राज्य की राजनीति में तीखा ध्रुवीकरण भी देखा जा रहा है। भाषाई विवाद ने महाराष्ट्र में तूल पकड़ा और सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। आईए विस्तार से जानते हैं क्या है पूरा मामला...

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Hindi vs Marathi row: कैसे शुरू हुआ विवाद?

इस पूरे विवाद की शुरुआत महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले से हुई जिसमें हिंदी को प्राथमिक स्कूलों में तीसरी अनिवार्य भाषा के तौर पर शामिल किया गया था। विपक्षी दलों के विरोध के बाद सरकार ने दो सरकारी आदेश (GRs) वापस ले लिए। इसके बाद निशिकांत दुबे ने बयान दिया कि "हम मराठी लोगों को पताक-पताक के मारेंगे", जो न सिर्फ अपमानजनक था बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर एक भावनात्मक बहस का कारण भी बना।

राज ठाकरे ने मुंबई में एक सभा के दौरान इस पर तीखा पलटवार करते हुए कहा, "तुम मुंबई आओ, समंदर में डुबो-डुबो कर मारेंगे"। उन्होंने हिंदी भाषियों पर सीधा हमला करते हुए चेतावनी दी कि, महाराष्ट्र में रहने वालों को मराठी सीखनी ही होगी, जहां भी जाओ मराठी बोलो।

सुप्रीम कोर्ट में याचिका, FIR की मांग

इस पूरे मामले में अब कानूनी मोर्चा भी खुल गया है। अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है, जिसमें राज ठाकरे और उनकी पार्टी MNS के कार्यकर्ताओं पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ठाकरे ने हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ हिंसा और भाषा आधारित नफरत को भड़काया है।

भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना (शिंदे गुट) की नेता शाइना एनसी ने दोनों नेताओं की भाषा पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा, ये क्या 'पताक-पताक के मारना', 'डुबो-डुबो के मारना' हो रहा है? महाराष्ट्र के लिए आपका विजन क्या है, ये बताइए। ये गुंडागर्दी की राजनीति कहीं नहीं चलती। वहीं, भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मुनगंटीवार ने भी इस विवाद पर संयमित रुख अपनाने की अपील की और कहा कि कोई किसी को समंदर में डुबो कर नहीं मार सकता। ये देश संविधान से चलता है। कोई ऐसा करेगा तो पुलिस रोक लेगी।

राज ठाकरे के आरोप: "मराठी को हटा, हिंदी थोपने की साजिश"

राज ठाकरे ने अपने भाषण में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भी घेरा और कहा, "महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य बनाने की बात कर रहे हैं, जबकि मराठी को हर स्कूल में अनिवार्य किया जाना चाहिए। गुजरात के कुछ व्यापारी मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश कर रहे हैं।"

दुबे ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा, "मैं गर्व से कहता हूं कि मेरी मातृभाषा हिंदी है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे कोई बड़े लाट साहब नहीं हैं। मैं सांसद हूं, कानून अपने हाथ में नहीं लेता, लेकिन जहां भी ये लोग जाएंगे, वहां की जनता ही उन्हें पीटेगी।"

राजनीति की भाषा क्या होना चाहिए? उठा सवाल..

महाराष्ट्र की सियासत में भाषा को लेकर यह टकराव केवल हिंदी बनाम मराठी तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब क्षेत्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बनता जा रहा है। एक ओर जहां भाजपा को अपने सहयोगी दलों की नाराजगी झेलनी पड़ रही है, वहीं MNS इस मुद्दे को मराठी अस्मिता के नाम पर भुनाने में लगी है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आगामी सियासी developments यह तय करेंगे कि यह बहस अब संवैधानिक दायरे में रहेगी या सड़कों पर उतर कर हिंसक रूप लेगी।

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