क्या 2005 का इतिहास दोहरा पाएंगे आदित्य ठाकरे, आसान नहीं होगा शिवसेना को खड़ा कर पाना

मुंबई, 30 जून। उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र में चल रहे सियासी संकट के बीच मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ गया है। बीती रात उन्होंने फेसबुक लाइव के जरिए अपने इस्तीफे का ऐलान किया। तमाम कोशिशों के बाद भी उद्धव ठाकरे बागी शिवसेना विधायकों को मनाने में विफल रहे और अंत में उन्हें अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी। जिस तरह से तकरीबन 40 शिवसेना के विधायकों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ दिया है उसके बाद शिवसेना के भविष्य पर खतरे की तलवार लटक रही है। बागी शिवसेना विधायक एकनाथ शिंदे शिवसेना पार्टी पर दावा कर रहे हैं। शिंदे के दावे के बीच आदित्य ठाकरे के पास जरूर मौका है कि वह लोगों से संपर्क साधे और उन्हें विश्वास दिलाएं कि असली शिवसेना उन्ही के पास है।

2005 में फूट के बाद 2022 में पार्टी पर संकट

2005 में फूट के बाद 2022 में पार्टी पर संकट

आदित्य ठाकरे युवा सेना के मुखिया हैं, ऐसे में जिस तरह से शिवसेना के अस्तित्व पर खतरा मंडरा है, यह जरूर एक मौका है जब आदित्य ठाकरे खुद को एक सच्चे शिवसैनिक के तौर पर स्थापित कर सके। जिस तरह से 2005 में राज ठाकरे और नारायण राणे ने विद्रोह किया और उद्धव ठाकरे ने इसका सामना किया , कुछ ऐसा ही मौका आदित्य ठाकरे के पास है जब वह संकट के समय पार्टी को फिर से खड़ा कर सके और शिवसेना को फिर से नई पहचान दिला सके।

बीएमसी चुनाव की चुनौती

बीएमसी चुनाव की चुनौती

अब जब यह तय हो चुका है कि भारतीय जनता पार्टी शिंदे गुट के साथ मिलकर सरकार बनाने जा रही है। ऐसे में आदित्य ठाकरे जोकि वर्ली से पार्टी के विधायक हैं, वह विपक्ष में खुद को साबित कर सकते हैं। अपने बेहतरीन नेतृत्व के जरिए वह काडर और पार्टी के भीतर जोश भर सकते हैं। आदित्य ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस साल होने वाला बीएमसी चुनाव है। इस साल बीएमसी का चुनाव होना है, ऐसे में जिस तरह से पार्टी के कई वरिष्ठ और अनुभवी नेता बागी हो गए हैं उसके बाद आदित्य ठाकरे के पास बीएमसी चुनाव में शिवसेना को सफलता दिलाने की चुनौती है।

आदित्य ठाकरे के पास युवा वोटर्स को लुभाने का मौका

आदित्य ठाकरे के पास युवा वोटर्स को लुभाने का मौका

आदित्य ठाकरे पहले ऐसे ठाकरे परिवार के नेता हैं जिन्होंने किसी पब्लिक विभाग का जिम्मा संभाला। वह काफी युवा नेता हैं, लिहाजा उनके कंधों पर यह जिम्मेदारी होगी कि शिवसेना के कोर युवा वोटर्स को अपने साथ जोड़ सके। वह ना सिर्फ शिवसेना के कोर वोटर, मराठी वोटर बल्कि गैर मराठी वोटर्स को भी अपनी ओर खींच सकते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार शिवसेना के एक विधायक ने कहा कि यह कहा जा सकता है कि उद्धव और आदित्य ठाकरे का सरकार में शामिल होना एक गलती हो सकती है। शिवसेना की ताकत ही उसकी पार्टी का मजबूत संगठन था। आदित्य को बड़ी जिम्मेदारी के लिए रखना चाहिए था।

जमीनी कार्यकर्ताओं को नेता की जरूरत

जमीनी कार्यकर्ताओं को नेता की जरूरत

शिवसेना के विधायक ने बताया कि आदित्य के पास मौका था कि वह पार्टी को जमीन से खड़ा कर सकते थे। आदित्य कमजोर वर्ग के लिए, किसानों के लिए और गैरसंगठित सेक्टर से जुड़े लोगों के लिए काम कर सकते थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आदित्य के पास यह क्षमता है। शिवसेना के काडर की बात करें तो पार्टी के कार्यकर्ता जमीन पर संघर्ष करने के लिए जाने जाते हैं लेकिन इसके लिए उन्हें एक नेता की जरूरत होती है जो उनका नेतृत्व कर सके। लिहाजा आदित्य के पास खुद को एक मजबूत नेता साबित करने का मौका है।

मराठी मानुस की राजनीति

मराठी मानुस की राजनीति

दरअसल भारतीय जनता पार्टी को ऐसे दल के रूप में जाना जाता है जिसमे अधिकतर नेता गैर मराठी हैं, जबकि शिवसेना की बात करें तो पार्टी मराठी मानुस की ही राजनीति करती है। लिहाजा उद्धव ठाकरे के पास मराठी मानुस की राजनीति को एक बार फिर से नए सिरे से आगे बढ़ाने का मौका है। लेकिन जिस तरह से शिवसेना के भीतर टकराव सामने आया उसने स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है और उद्धव ठाकरे का अपने नेताओं से वह संबंध नहीं बरकरार रहा। उद्धव ठाकरे की अपने नेताओं से दूरी एक बड़ी वजह साबित हुई जिसकी वजह से शिवसेना में इतनी बड़ी फूट सामने आई। ऐसे में आदित्य ठाकरे के सामने एक बार फिर से पार्टी को एकजुट करने की चुनौती होगी।

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