शिवसेना का जितना छगन भुजबल, नारायण राणे और राज ठाकरे नहीं बिगाड़ पाए, क्या वह एकनाथ शिंदे कर पाएंगे ?
मुंबई, 22 जून: शिवसेना के इतिहास में पहले भी कई राजनीतिक भूचाल आ चुके हैं। लेकिन,मौजूदा संकट सबसे बड़ा है। सबसे बड़ी बात ये कि पहले जितने भी संकट आए थे, तब पार्टी का नेतृत्व खुद इसके संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के हाथों में था, जिनके एक इशारे पर मुंबई ठहर जाने के किस्से आज भी मशहूर हैं। पार्टी की कमान अभी मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के हाथों में है और उन्होंने बागी नेता एकनाथ शिंदे की ओर से पैदा की गई परिस्थितियों पर बुधवार को जो कुछ कहा है, उससे साफ लगता है कि उनके सामने परिस्थितियां विपरीत हो चुकी हैं। आइए जानते हैं कि शिवसेना के इतिहास में कब-कब ऐसा संकट आया और क्यों ये संकट सबसे ज्यादा गंभीर है, जिसमें अगर पार्टी दो फाड़ न हो तो यह चौंकाने वाली बात हो सकती है।

एकनाथ शिंदे ने 40 से ज्यादा एमएलए के समर्थन का किया है दावा
शिवसेना अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। हालांकि, इससे पहले भी शिवसेना ने पार्टी में बगावत देखी है। छगन भुजबल, नारायण राणे और राज ठाकरे, तीनों की वजह से पार्टी मुश्किल दौर से गुजर चुकी है। लेकिन, पहली बार शिवसेना नेतृत्व को एकनाथ शिंदे ने सियासी तौर पर घुटने पर लाने की नौबत खड़ी कर दी है। शिंदे ने जिस तरह से 40 से अधिक विधायकों के समर्थन का दावा किया है, उससे साफ है कि पार्टी लगभग दो फाड़ होने की स्थिति में है, जिसमें उद्धव ठाकरे के हाथों में गिनती के एमएलए बचे रह गए हैं। बागी विधायकों को लेकर शिंदे मुंबई से सूरत और सूरत से गुवाहाटी रफूचक्कर हो चुके हैं और शिवसेना प्रमुख को उन्हें मनाने के लिए भावनात्मक चाबुक चलानी पड़ रही है।

शिवसेना में अबतक जो नहीं हुआ, वह एकनाथ शिंदे कर पाएंगे ?
2019 के नवंबर से महाराष्ट्र की कुर्सी पर बैठे शिवसेना सुप्रिमो उद्धव ठाकरे को शिवसेना के 55 एमएलए समेत कांग्रेस-एनसीपी मिलाकर कुल 152 एमएलए का समर्थन हासिल है। लेकिन, दल-बदल विरोधी कानून के तहत अगर उनकी पार्टी के कम से कम 37 एमएलए ने अलग ग्रुप बनाने या बीजेपी के साथ जाने का फैसला कर लिया तो संवैधानिक तौर पर उन्हें ऐसा करने पर कोई रोक नहीं है। यानी अगर शिंदे के साथ पार्टी विधायक आगे भी डटे रहे और उद्धव उन्हें मना पाने में नाकाम रहे तो शिवसेना में पहली बार इतना बड़ा विभाजन देखने को मिलेगा, जिसमें बाल ठाकरे के बेटे की अगुवाई वाले गुट के साथ गिनती के ही विधायक बच जाएंगे।

शिवसेना को पहला झटका छगन भुजबल ने दिया था
शिवसेना में सबसे पहला सियासी भूचाल 1991 में तब आया था, जब बाल ठाकरे के भरोसेमंद छगन भुजबल ने 52 एमएलए में से 17 के साथ पार्टी तोड़ने की धमकी दी थी। भुजबल मनोहर जोशी के बढ़ते कद से नाराज थे और कहा था कि वह शिवसेना (बी) बनाना चाहते हैं। तत्कालीन स्पीकर मधुकरराव चौधरी को इस संबंध में जो खत मिला, उसके आधार पर उन्होंने इसे स्वीकार लिया। तब बाल ठाकरे ने तत्काल भुजबल को पार्टी से बर्खास्त कर दिया था। 16 एमएलए जो पार्टी छोड़कर गए थे, बाद में उन्होंने अपना फैसला वापस लेने की कोशिश की, लेकिन उस समय के स्पीकर ने उसे मंजूर नहीं किया। तब जाकर भुजबल कांग्रेस में शामल हो गए थे।

नारायण राण ने पेश की थी दूसरी बड़ी चुनौती
दूसरी घटना तब की है, जब जुलाई 2005 में नारायण राणे और उद्धव ठाकरे आमने-सामने हो गए। राणे ने देखा कि अगर बाला साहेब के बेटे को महत्त्व मिलेगा तो उनकी राजनीति ठहर जाएगी। उन्होंने 62 एमएलए में से 40 के साथ पार्टी के विभाजन की कोशिश की। लेकिन, इस कोशिश को आखिरकार शिवसेना प्रमुख ने नाकाम कर दिया। हालांकि,बाद में 12 एमएलए पार्टी व्हिप का उल्लंघन करके राणे के साथ कांग्रेस में चले गए। पार्टी ने बड़ी टूट को तो नाकाम कर दिया, लेकिन राणे जैसा कद्दावर नेता को खो दिया, जो सीएम भी रह चुके थे। वे बाद में विलासराव देशमुख सरकार में मंत्री भी बने और अभी केंद्र में मंत्री हैं।

जब चाचा बाल ठाकरे की पार्टी छोड़कर निकले राज ठाकरे
तीसरी घटना भी 2005 की ही है। लेकिन, इस बार शिवसेना प्रमुख अपने परिवार में ही उलझ गए थे। बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे राजनीति में अपने चाचा के दाहिने हाथ हुआ करते थे। तब उद्धव ठाकरे की कोई खास अपनी पहचान नहीं थी। लेकिन, जब उत्तराधिकारी बनाने की बारी आई तो बाल ठाकरे ने भतीजे की जगह बेटे उद्धव ठाकरे पर अपना विश्वास जताया। नतीजा ये हुआ कि राज ठाकरे ने 2005 के दिसंबर में शिवसेना छोड़ दी। हालांकि, राज ठाकरे ने चाचा का सम्मान करते हुए साफ किया कि वह पार्टी को तोड़ना नहीं चाहते। जबकि, शिवसेना के कई सांसद और एमएलए उनके साथ जाने के लिए तैयार बैठे थे। बाद में उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई।












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