MP में यहां महिलाएं लूटती हैं बाजार, काली शक्तियों से शहर को बचाने होती है नाकेबंदी, जानिए क्या है माजरा
सागर, 16 जुलाई। मप्र के सागर में शहर को बुरी बलाओं से बचाने के लिए महिलाएं पवित्र जल से शहर की नाकेबंदी करती हैं, इतना ही नहीं पूजन सामग्री के लिए बाजार भी लूटती हैं! यह परंपरा सदियों से चलती आ रही है। दरअसल केशरवानी समाज में सालाना बडी पूजा जिसे तिसाला पूजा का बडा महत्व है। समाज की कुल देवी की रथयात्रा निकाली जाती है, पहले रथ को बकरे खींचते थे, लेकिन अब प्रतिकात्मक बकरे की प्रतिमा लगाई जाती है।

मान्यता है कि देव शयनी एकादशी पर भगवान विष्णु क्षीर सागर में जाकर चातुर्मास तक विश्राम करते हैं। इस बीच मांगलिक कार्यक्रम नहीं होते। देवोत्थान एकादशी पर जब भगवान विष्णु संसार का भार संभालते हैं, तब सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं। तब तक सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। इसी काल अवधि में सागर में 181 साल से बड़ी पूजा का आयोजन किया जाता है। जिसमे काली ताकतों, बुरी बालाओं को दूर भगाने 11 दिनी अनुष्ठान होता है। इसमें तरह-तरह के तंत्र का प्रयोग किया जाता है। ग्यारवें दिन तिसाला पूजा के तहत रथयात्रा निकलती है, जिसमें माता के रथ के सामने बकरे की आकृति बनाई जाती है। यह संकेत है कि कभी इस माता के इस रथ को बकरे खींचा करते थे। सांकेतिक रूप से दो काले बकरे रथ में लगाये जाते हैं। लोग मातारानी के रथ को हाथों से खींचते हैं। शोभायात्रा में बुन्देली संस्कृति का प्रतीक शेर नृत्य, लोक भजन मंडली और बरेदी नृत्य आकर्षण बनता है। जानकारी देते हुए विकास केशरवानी ने बताया कि तिसाला बड़ी पूजा का यह 182 वां वर्ष है। इस वर्ष 22 जुलाई दिन शुक्रवार को निकाली जा रही है। शिवलाल गुप्ता, शिवचरण केशरवानी एवं हरिओम पंडा ने बताया कि माता शीतला को रथ पर विराजमान कर शहर भ्रमण कराया जाता है।
बुरी बलाओं, काली ताकतों से बचाने शहर को बांधा
बुरी बालाएं, काली ताकतें शहर में प्रवेश न कर पाएं इसलिए समाज की सभी महिलाओं ने एकत्रित होकर शहर के चारों दिशाओ में पवित्र जल की धार छोड़ कर नाके बंदी की गई है। जिसमें महिलाओं द्वारा तामे के पात्र में जल व अभिमंत्रित पूजन सामग्री ले जाकर अपने व आस-पड़ोस से लेकर घरों के बाहर व शहर की नाकेबंदी कर जल विसर्जित किया गया।
खुदके धन से नहीं होता अनुष्ठान
इस पूजा में स्वयं के धन से अनुष्ठान नहीं किया जाता इसलिए समाज की महिलाओं द्वारा बाजार लूटा जाता है। हालांकि अब यह परंपरा और रिवाज केवल सांकेतिक किया जाता है। दुकानदार स्वेच्छा से दान दे देते हैं। रिश्तेदारों के यहां जाकर भीख माँगी जाती है, जिसमें गेहूं एवं पैसे दिए जाते हैं। जिस से महिलाओं द्वारा इन्हीं पैसो से गुजिया बनाई जाती है।












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