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MP News: मध्य प्रदेश में आज मनाई जाएगी नर्मदा जयंती, जानिए प्रत्येक घाट पर इसका धार्मिक महत्व

MP Narmada News: मोक्ष दायिनी, पुण्य सलिला मां नर्मदा ने अपने उदगम स्थल से लेकर समुद्रागम तक इस धरा को न केवल पल्लवित, पोषित किया है, बल्कि युगों-युगों से मानव सभ्यता और संस्कृति को जीवन्त बनाए हुए है। बता दे आज मध्य प्रदेश में नर्मदा जयंती मनाई जाएगी।

मध्य प्रदेश की जीवन रेखा मां नर्मदा ने अपने अविरल प्रवाह पथ में जिस भूमि को स्पर्श किया है उस भूमि को उर्वर और पावन है। मां नर्मदा के प्रति जनमानस की अगाद्य आस्था और श्रद्धा, नर्मदा के तट पर पड़ने वाले विभिन्न घाटों पर प्रतिबिम्बित होती है।

Narmada Jayanti will be celebrated today in MP, know its religious significance on the ghats shivraj

मां नर्मदा तट के घाटों का पौराणिक महत्व पुराणों तथा अनेक धार्मिक ग्रन्थों में मिलता है। प्रत्येक घाट का अपना एक धार्मिक महत्व है। अनेक घाटों को हमारे ऋषि-मुनियों, संतो-महंतो तथा योगियों ने अपनी साधना स्थली बनाकर उन्हें दिव्यता प्रदान की है। रायसेन जिले के भी अनेक घाटों का अपना पौराणिक महत्व है। इन्हीं घाटों में भारकच्छकलां का अपना विशेष महत्व है।

नर्मदा पुराण रेवा खण्ड के 181/1.2 में इस तीर्थ स्थल का वर्णन है। पौराणिक मान्यता एवं लोकश्रुति के अनुसार यह मान्यता प्रचलित है कि इस स्थान पर महर्षि भृगु ने भगवान शिव की साधना की थी। भगवान शिव ने साधनारत महर्षि भृगु की परीक्षा के लिए अपने नंदी को भेजा था। महर्षि भृगु की साधना स्थली होने के कारण इस स्थान का नाम भृगुकच्छ तीर्थ पड़ा जो कालांतर में भृगुकच्छ शब्द का अपभ्रंश भारकच्छकलॉ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह भी मान्यता है कि यहां मंदागिनी गंगा का नर्मदा में समागम हुआ है।

प्राचीनकाल में मंगलेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता था मांगरोल

जिले में स्तिथ मांगरोल प्राचीन काल में मंगलेश्वर तीर्थ नाम से प्रसिद्ध था। इस स्थान के बारे में ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के स्वेद से उत्पन्न पुत्र मंगल द्वारा इस तीर्थ की स्थापना की गई है। इसी स्थान पर मंगल ने शिव की आराधना कर नव ग्रहों में स्थान प्राप्त किया था। नर्मदा पुराण में इसका उल्लेख मिलता है। इस स्थान का पितरों के मंगल के लिए स्नान एवं दान का विशेष महत्व है। इस स्थान पर अनेक संतो ने साधना की है और परम पद प्राप्त किया है। यहां श्रीगुरू वापौली महाराज के शिष्य श्री विष्णुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा रेवा मंदिर में संस्कृत विद्यालय एवं गौशाला का संचालन किया जा रहा है। इस स्थान पर बड़ी संख्या में श्रृद्धालु स्नान एवं पूजन के लिए आते हैं।

सौम्वौरेश्वर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था बौरास

उदयपुरा तहसील के अन्तर्गत नर्मदा तट स्थित बौरास प्राचीन काल में सौम्वौरेश्वर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। बोरास के बारे में पौराणिक मान्यता है कि यहां सूर्य देव ने भगवान शिव की आराधना की थी। उन्होंने यहां भगवान शिव की स्थापना भी की थी। इसलिए यह सौम्वौरेश्वर तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बौरास का नर्मदा पुराण, रेवा खण्ड, 163/3,4 पर इस प्रकार उल्लेख किया गया है- मातपितृभ्यां रहिताभ्रातृभार्याविवर्जितः। अनाथ विकला व्यड्ढां मग्ना ये दुःखसागरे।।तेषां नाथों जगद्योनिनर्मदातटमाश्रितः। साम्वौरनाथे लोकनामात्र्तिहा दुःखनाशनः।। यहां 300 साल पुराना रामजानकी मंदिर है। लगभग 50 वर्ष पूर्व बजरंगदास महाराज के आने के पश्चात यहां और मंदिरों का निर्माण हुआ।

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