Ganeshotsav 2022: स्वयं प्रगट गणेशजी बढ़ रहे थे, शंकराचार्य ने अभिमंत्रित कील लगाकर रोका

सागर, 31 अगस्त। मप्र के सागर में मंगलमूर्ति भगवान गणेश का अनूठा मंदिर स्थित है। सवा चार सौ साल पुराने मराठा कालीन मंदिर में रिध्दि-सिध्दि के साथ गजानन विराजे हैं। यह प्रतिमा स्वयं प्रगट हैं। मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के बाद गणेशजी कि प्रतिमा धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। लगातार बढ़ती इस प्रतिमा को लेकर उस समय के मंदिर के संस्थापक और भक्त चिंतित होने लगे थे। बाद में सागर पहुंचे शंकराचार्य ने अभिमंत्रित लोहे की कील उनकी प्रतिमा के ऊपर सिर पर लगाई थी, जिसके बाद से यह प्रतिमा यथावत है।

देश में अष्टकोणीय केवल तीन मंदिर, मुम्बई, कोलकाता और सागर में मौजूद

देश में अष्टकोणीय केवल तीन मंदिर, मुम्बई, कोलकाता और सागर में मौजूद

सागर के पुरव्याऊ टौरी वार्ड में गणेश घाट पर अद्भुत और अलौकिक मंदिर मौजूद है। इस मंदिर का निर्माण 1603 में प्रारंभ हुआ था, उसके पूर्व यहां पर भगवान गणेश कि सिद्धिविनायक स्वरुप में देवी रिद्धि-सिद्धि के साथ यह प्रतिमा स्वयं प्रगट हुई थी। इसको लेकर मंदिर में मौजूद दस्तावेज और मंदिर निर्माण से जुडे़ शिलालेख बताते हैं। करीब एक दशक पूर्ण इस मंदिर का जीर्णोद्धार और किया गया है। इसे आकर्षक रंगों से बाहर से सजाया गया है। अंदर गर्भगृह व अन्य हिस्से को ऐतिहासिक तरीके से ही तैयार कराया गया है। गणेशोत्सव के दौरान यहां 10 दिन तक विशेष अनुष्ठान आयोजित होते हैं।

कांचीकोटि पीठ के शंकराचार्य ने अभिमंत्रित कील प्रतिमा लगाई थी

कांचीकोटि पीठ के शंकराचार्य ने अभिमंत्रित कील प्रतिमा लगाई थी

मराठाकाल में जमीन की खुदाई के दौरान प्रकट हुई श्रीगणेश की यह अद्वितीय प्रतिमा स्थापना के बाद से हर साल बढ़ती जा रही थीए जिसको देखते हुए सागर प्रवास पर आए कांचीकोटि के तत्कालीन शंकराचार्य ने एक अभिमंत्रित कील प्रतिमा के सिर पर ठोककर गणेशजी को बढ़ने से रोका था। भारत में अष्टकोणीय श्रीगणेशजी का यह दूसरा सबसे बड़ा मंदिर होने का भी दावा किया जाता है।

मराठा शासक बाजीराव के समय इस मंदिर का निर्माण हुआ था

मराठा शासक बाजीराव के समय इस मंदिर का निर्माण हुआ था

मराठाकाल में यहां जमीन की खुदाई के दौरान भगवान श्रीगणेश की यह प्रतिमा निकली थीए जिन्हें उनके पिता शंकरजी के साथ विराजमान किया गया था। यहां मंदिर निर्माण का कार्य 1603 से शुरू हुआ था। नागपुरए मुंबईए नासिक और पूना से आए कारीगरों को यह अष्टकोणीय मंदिर तैयार करने में लगभग 35 साल लग गए थे। 1635 में इस मंदिर की स्थापना हुई और तब ही से यह पूरा क्षेत्र गणेशघाट के नाम से प्रसिद्ध है। बुजुर्गों का कहना है कि मराठा शासक बाजीराव के समय इस मंदिर का निर्माण हुआ था।

सात पीढ़ियों से आठले परिवार ही करता आ रहा सेवा

सात पीढ़ियों से आठले परिवार ही करता आ रहा सेवा

ऐतिहासिक और धार्मिक सिद्ध मंदिर की देखरेख और पूजा पिछली सात पीढ़यिों से सिर्फ आठले परिवार ही करता आ रहा है। सातवीं पीढ़ी के सदस्य और मंदिर के पुजारी गोविंद राव आठले ने कहा कि मुंबई के बाद यह गणेशजी का दूसरा अष्टकोणीय मंदिर हैए जिसकी परिक्रमा करने पर यह सिद्धि विनायक मंदिर की परिक्रमा करने जितना फलदायी है। इस मंदिर का निर्माण मराठाए भौंसलेए शिंदे व सागर के 11 महाराष्ट्रियनों द्वारा किया गया था। इस मंदिर में गणेशजी के साथ शंकरजी भी विराजमान हैं। मनोकामना पूरी करने कई लोग पीले कपड़े में नारियलए जनेऊ व सुपारी के साथ सिक्का अर्पित करते हैं।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+