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MP News: भाजपा विधायक के बयान से उठा सियासी तूफान: "सीजफायर UN के दबाव में हुआ"—बाद में ली सफाई और मांगी माफी

MP News: भारत-पाकिस्तान सीमा पर हाल ही में हुए संघर्षविराम (सीजफायर) को लेकर मध्यप्रदेश के रीवा जिले से भाजपा विधायक नरेंद्र प्रजापति का बयान सियासी तूफान बन गया है। तिरंगा यात्रा के बाद मंच से संबोधन करते हुए विधायक ने दावा किया कि "भारत ने यूनाइटेड नेशंस (UN) के आदेश के चलते सीजफायर किया है।"

विधायक के इस बयान ने सत्तारूढ़ भाजपा सरकार की आधिकारिक विदेश नीति और रक्षानीति पर ही सवाल खड़े कर दिए, क्योंकि तीन दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा था, "भारत किसी भी बाहरी दबाव में निर्णय नहीं करता, हम जवाब देना जानते हैं।"

Controversial statement by Rewa BJP MLA Narendra Prajapati Claim of UN ceasefire order

विवादित बयान: क्या कहा विधायक ने?

तिरंगा यात्रा के मंच से जनता को संबोधित करते हुए प्रजापति ने कहा: "संयुक्त राष्ट्र के कहने पर भारत ने सीजफायर किया है। यह निर्णय ऊपर से आया है, हम सबको उसका पालन करना पड़ा।" बयान सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो बवाल मच गया। भाजपा कार्यकर्ता और विपक्ष दोनों ने इसे "पार्टी लाइन के खिलाफ और राष्ट्रहित के विपरीत" बताया।

सफाई और बयान वापसी

विवाद बढ़ता देख नरेंद्र प्रजापति ने पहले कहा कि "मेरा बयान तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।" लेकिन जब दबाव और आलोचना बढ़ी तो विधायक ने साफ शब्दों में कहा: "मैं अपने बयान को वापस लेता हूं। जो कहा गया, वह गलत था। मेरी मंशा गलत नहीं थी।"

सरकार की आधिकारिक लाइन क्या है?

भारत-पाक सीजफायर को लेकर सरकार और सेना की ओर से स्पष्ट कहा गया था कि सीजफायर समझौता आपसी सैन्य स्तर पर हुआ। भारत ने न पाकिस्तान के DGMO की गुज़ारिश पर झुका, न किसी बाहरी दबाव में यह फैसला लिया।विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि "भारत आतंकवाद और संघर्ष का जवाब अपने तरीके से देने में सक्षम है और किसी भी वैश्विक संस्था या देश के दबाव में नहीं आता।"

विधायक ने क्यों खड़े कर दिए सवाल?

प्रजापति के बयान से यह धारणा बनने लगी कि भारत पर अब भी UN या अमेरिका जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का दबाव काम करता है, जो सीधे-सीधे मोदी सरकार की कथित "निर्भीक और स्वतंत्र" नीति पर सवाल खड़े करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के अंदरूनी मतभेद या सूचनाओं की कमी के कारण इस तरह के बयान सामने आते हैं।

विपक्ष ने साधा निशाना

कांग्रेस नेता जीतू पटवारी ने कहा: "जब विधायक खुद कह रहे हैं कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के कहने पर सीजफायर किया, तो भाजपा बताएं कि उनके पीएम झूठ क्यों बोल रहे हैं?" सुप्रिया श्रीनेत ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा: "भाजपा के विधायक खुद मोदी सरकार के विदेशी नीति के दावों की पोल खोल रहे हैं। क्या अब राष्ट्रवाद पर पर्दा डाला जाएगा?"

BJP MLA Narendra Prajapati: सरकार की लाइन से उलट

नरेंद्र प्रजापति का बयान केंद्र सरकार और भाजपा की आधिकारिक स्थिति के ठीक उलट था। भारत ने बार-बार कहा कि सीजफायर का निर्णय स्वतंत्र और द्विपक्षीय था, और न तो यूनाइटेड नेशंस और न ही अमेरिका ने इसमें कोई भूमिका निभाई। प्रजापति के दावे ने निम्नलिखित सवाल खड़े किए:

UN की भूमिका?:

  • भारत ने शिमला समझौते (1972) के बाद से कश्मीर और पाकिस्तान के साथ किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को खारिज किया है। प्रजापति का UN आदेश का दावा भारत की इस नीति को कमजोर करता है।
  • सरकारी लाइन पर सवाल: मोदी सरकार ने ट्रम्प के दावों को खारिज किया था, लेकिन प्रजापति का बयान विपक्ष को यह कहने का मौका देता है कि भारत बाहरी दबाव में काम कर रहा है।
  • सियासी नुकसान: मध्य प्रदेश में पहले ही विजय शाह और जगदीश देवड़ा के बयानों ने विवाद खड़ा किया है। प्रजापति का बयान भाजपा की एकजुटता पर सवाल उठाता है।

प्रजापति का इतिहास, पहली बार विवाद में

नरेंद्र प्रजापति मनगवां से पहली बार विधायक बने हैं। इससे पहले वे स्थानीय स्तर पर सियासत में सक्रिय थे, लेकिन कोई बड़ा विवाद उनके नाम से नहीं जुड़ा था। जानकारी के अनुसार, "प्रजापति तिरंगा यात्रा में स्थानीय समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनका बयान उल्टा पड़ गया।" उनकी सफाई और माफी ने विवाद को कुछ हद तक शांत किया, लेकिन सियासी नुकसान को कम करना मुश्किल होगा।

BJP MLA Narendra Prajapati: सवाल और भविष्य

  • भाजपा की कार्रवाई?: क्या प्रजापति के खिलाफ पार्टी कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगी, या इसे व्यक्तिगत गलती मानकर छोड़ देगी?
  • विपक्ष की रणनीति?: क्या कांग्रेस इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाएगी, या इसे मध्यप्रदेश तक सीमित रखेगी?
  • कूटनीतिक असर?: क्या यह बयान भारत-पाकिस्तान संबंधों और UN के साथ भारत की छवि पर असर डालेगा?
  • मध्य प्रदेश में नेतृत्व?: क्या मोहन यादव अपने नेताओं पर लगाम कस पाएंगे, या विवादों की यह श्रृंखला जारी रहेगी?
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