MLA का आरोपः छतरपुर विवि में विद्यार्थियों से वसूली, बिना अधिकार शिक्षकों का वेतन घटा रहे
छतरपुरः महाराजा छत्रसाल विवि में भर्ती घोटाले पर विधायक ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को बताया, विवि में जनभागीदारी समिति नहीं होती, फिर उससे खर्च कैसे संभव! 100 से अधिक आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती मामले में घोटाले की खोली परतें। ईसी सदस्यों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।
Madhya Pradesh के छतरपुर से कांग्रेस विधायक आलोक चतुर्वेदी ने स्टेट यूनिवर्सिटी महाराजा छत्रसाल विवि में विभिन्न भर्ती, फर्जी समिति और नीतिगत और अधिकार से बाहर जाकर काम करने के मामले में राज्यपाल व मुख्यमंत्री से शिकायत की है। उन्होंने कार्यपरिषद की बैठक व इसके सदस्यों को भी लपेटे में लेकर कहा है कि ईसी और विवि प्रशासन को जो अधिकार ही नहीं हैं, वे उन मुद्दों पर निर्णय कर रहे और फैसला ले रहे हैं। सबसे अहम मामले कॉलेज से मर्ज हुए अतिथि विद्वानों का वेतन कम करने और छात्रों से जनभागीदारी समिति जो है ही नहीं उसके नाम पर राशि वसूल करने के आरोप लगाए गए हैं।

विधायक चतुर्वेदी नेशिकायत में आरोप लगाए गए हैं कि विश्वविद्यालय प्रबंधन के द्वारा शिक्षा कार्य परिषद के सदस्यों के साथ साठगांठ करते हुए अनेक गड़बडिय़ों की बुनियाद रखी जा रही है। इस पत्र में बगैर सक्षम आदेश के विश्वविद्यालय की नीतियों को बदलने, अतिथि विद्वानों का मानदेय घटाकर उनका शोषण करने एवं भविष्य में होने वाली आउटसोर्स नियुक्तियों के पहले भ्रष्टाचार की बुनियाद रखी जा रही है। विश्वविद्यालय में चल रहीं इन गतिविधियों पर राज्यपाल और उच्च शिक्षा मंत्री का ध्यान आकृष्ट कराते हुए इसकी जांच कराने की मांग की है।

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विधायक ने उठाए सवाल इन गड़बडिय़ों पर
- बिना ईसी की अनुमति लिए विश्वविद्यालय में 57 लोगों को आउटसोर्स के माध्यम से नियुक्त करने का विज्ञापन प्रकाशित किया गया था।
- अब विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षा परिषद की अनुमति लेकर 100 लोगों को आउटसोर्स के जरिये नियुक्त करने की तैयारी की जा रही है।
- विधायक का सवाल, शासन से आउटसोर्स कर्मियों की नियुक्ति की अनुमति नहीं ली गई है तो फिर विश्वविद्यालय किस नीति के तहत यह नियुक्तियां कर रहा है।
- आउटसोर्स कर्मचारियों को मानदेय देने के लिए भी नीतिगत अनियमितताएं की जा रही हैं।
- कार्य परिषद की बैठक के लिए प्रस्तावित एजेण्डे में कहा कि वह जनभागीदारी की राशि से आउटसोर्स कर्मचारियों को मानदेय देगा, जबकि विश्वविद्यालय में जनभागीदारी नाम की कोई संस्था होती ही नहीं है।
- अतिथि विद्वानों को 35 हजार रुपए महीना मानदेय मिलता था, उसे कैसे घटा सकते हैं
- संविलियन के माध्यम से आए अतिथि विद्वानों को विश्वविद्यालय द्वारा लगभग 35 हजार रूपए मानदेय दिया जा रहा था, बगैर किसी अधिकार के एक नीति बनाकर इन अतिथि विद्वानों का मानदेय 20 हजार रूपए किया जा रहा है।
- कई अतिथि विद्वान आक्रोशित होकर इस शोषण के खिलाफ न्यायालय का रूख कर चुके हैं।
- विश्वविद्यालय में जनभागीदारी ही नहीं है तो जनभागीदारी के नाम पर हर वर्ष यहां पढऩे वाले छात्र.छात्राओं से प्रवेश शुल्क के रूप में लाखों रूपए क्यों वसूले जा रहे हैं।
- विश्वविद्यालय के लगभग 15 हजार छात्रों से वसूली हुई है। स्नातक वाले छात्रों से विकास शुल्क के नाम पर 146 रूपए और स्नातकोत्तर विद्यार्थियों से 275 रूपए वसूले जा रहे हैं।
- फर्जी नियुक्तियों और कॉलेज की जनभागीदारी समिति से हड़पे 4 करोड़ रूपए ठिकाने लगाने की तैयारी चल रही है।












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