2017 में रिलीज़ होगा सपा-ए-आज़म!
होगा या होगी में मत फंसिये। हेडलाइन में स्पेलिंग मिसटेक कतई नहीं है, क्योंकि सपा-ए-आज़म कोई मूवी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक नाटक है, जिसका मंचन 2017 में होगा। जाहिर है मुख्य किरदार आज़म खां, मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव होंगे और नाटक की बाकी की कास्ट में शिवपाल सिंह यादव से लेकर समस्त यूपी के वे सभी देवर शामिल होंगे, जो कन्नौज की सांसद को भाभी बुलाते हैं।
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राजनीतिक नाटक बेहद रोचक होगा, इसमें कोई शक नहीं है। क्योंकि इस नाटक के अध्याय अभी से लिखे जाने शुरू हो चुके हैं। वो भी स्वयं अखिलेश यादव की कलम से। शुरुआत हुई है हर जिले में एक मंदिर के नवीनीकरण कराने की सपा की मुहिम से, जो आज़म खां साहब की नीतियों के उलट एक नया राजनीतिक रास्ता है। ऐसा न हो कि समाजवादी पार्टी द्वारा नवीनीकृत मंदिरों के घंटों की घनघनाहट के बीच आज़म खां साहब की आवाज़ दब जाये और 2017 के आते-आते वे भी अमर सिंह की तरह मुलायम सिंह का साथ छोड़ दें।
इतना पढ़कर आप मुस्कुराये जरूर होंगे, लेकिन यथार्थ यही है और इसी कारण सपा के सामने कई चुनौतियां मुंह फैलाए खड़ी हैं, जिनके केंद्र बिंदु पर केवल आज़म ही दिखाई देते हैं। आईये जानते हैं क्या हैं वो चुनौतियां और 2017 के मंच पर किस तरह से ये नाटकीय मोड़ ले सकती हैं-

वेस्टर्न यूपी का विकास
उत्तर प्रदेश सरकार के लिये वेस्टर्न यूपी का विकास अब भी चुनौती बना हुआ है। खास बात यह है कि अगर विकास नहीं हुआ तो लोग अखिलेश से ज्यादा आज़म खां को कोसेंगे, क्योंकि यूपी के इस इलाके में आज़म खां को लोग ज्यादा मानते हैं। खास कर मुस्लिम समुदाय के लोग।

आजम को नहीं समझते अपना हिमायती
पार्टी के कद्दावर नेता आजम खां के बयानों से महज हिंदू खेमे में ही नहीं बल्कि मुस्लिम वर्ग में भी नाराजगी व्याप्त है। फिर वो कारगिल में शहीद हुए सैनिकों को धर्म से लपेटकर पेश करने वाले बयान से हो या मीडिया को दिए इंटरव्यू में मजहब को सियासत के साथ जोड़कर फायदा उठाने को लेकर। अल्पसंख्यक वर्ग सपा से कटने लगा है जो कि विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सपा को काफी हलका कर सकते हैं।

कहीं अपराधों के आंकड़े सपा को हलका न कर दें
सपा सरकार के शासन के दौरान सूबे में हत्या, लूटपाट, रेप, पत्रकारों की हत्या समेत सांप्रदायिक हिंसा के मामलों पर जनता के पास कई सारे सवाल हैं। अपराध से पीड़ित किसी एक जाति या एक धर्म का नहीं है। ऐसे में स्वयं यूपी के मुसलमान भी नहीं चाहेंगे कि सपा की सरकार दोबारा आये, फिर एक क्या दस आज़म खा भी आ जायें।

जनता, जातिवाद और सपा
समाजवादी पार्टी में यादववाद चरम पर रहता है, अल्पसंख्यकों को बढ़ावा दिया जाता है। सवर्ण और दलितों के साथ सहज व्यवहार नहीं होता। बस इन्ही सवालों के साथ सवर्ण और दलित वर्ग सपा से मुंह फेरे खड़ा है। इनको मनाने के लिए अखिलेश ने पैंतरेबाजी करना शुरू भी कर दिया है, लेकिन यहां भी वे एक भी कदम आज़म साहब के विरुद्ध नहीं चल सकते। नहीं तो बड़ा नुकसान हो जायेगा।

मुलायम का बयान नहीं भूली है जनता
सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव का रेप को लेकर दिया गया बयान कि लड़के हैं गलतियां हो जाती हैं, 2017 के विधानसभा चुनावों में सपा के लिए फिर भारी पड़ने वाला है। ऊपर से विपक्षी दल उसमें आज़म खां के उन बयानों को नमक-मिर्च की तरह छिड़क सकते हैं, जो उन्होंने मंदिर-मस्जिद के नाम पर दिये।

सपा के लिए किसानों को रिझाना भी बड़ी चुनौती
गन्ना किसानों के साथ सरकार की ओर से बरती गई ढ़ीला हवाली। बुंदेलखंड में किसानों की मौतों ने सूबे की सरकार की कार्य नीति पर तमाम सवाल खड़े कर दिए। साथ ही 23 रूपये से लेकर 28 रूपये तक के मुआव्जे के चेकों ने शासन की मशीनरी को धता साबित कर दिया। जिस पर किसानों के जहन में सपा धूमिल नजर आ रही है। यहां भी सपा-ए-आज़म कुछ नहीं कर पायेंगे।












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