अब 2017 तक हर तरफ गूंजेगा यादव सिंह का नाम!
लखनऊ। यूपी विधानसभा चुनाव 2017 के मद्देनजर समाजवादी पार्टी मुश्किलों में फसती नजर आ रही है। कहीं आजम और अमर सिंह के बीच की तकरार पार्टी को कमजोर साबित करने लगती है, तो कहीं सूबे में अपराधों के रिकॉर्ड पार्टी को हाशिए पर खड़ा कर देते हैं। फिलवक्त यादव सिंह मामला सपा की आंखों में लट्ठा बनकर फंसता दिखाई दे रहा है।
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भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे यादव सिंह को गाजियाबाद की स्पेशल सीबीआई अदालत में पेश किया गया। दरअसल उत्तर प्रदेश की सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर ने यादव सिंह मामले की जांच सीबीआई से कराने को लेकर एक याचिका दायर की थी। साथ ही नूतन ठाकुर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा था कि सूबे की सरकार इस मामले निष्क्रिय दिख रही है। फलस्वरूप 16 जुलाई 2015 को कोर्ट ने यादव सिंह और उसके करीबियों की सीबीआई जांच कराने का आदेश दिया।
क्या है यादव सिंह पर आरोप?
यादव सिंह पर आरोप है कि उसने नॉएडा, ग्रेटर नॉएडा प्राधिकरण में चीफ इंजीनियर रहते हुए कई सौ करोड़ रूपये की घूस लेकर टेंडर बांटे। इन सबके इतर नॉएडा, ग्रेटर नॉएडा और यमुना एक्सप्रेस विभाग में बतौर इंजीनियर रहे यादव सिंह की सभी तरह के टेंडर और पैसों के आवंटन में महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।
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माना जा रहा है कि यादव सिंह के भ्रष्टाचार के तार कई सियासतदानों से भी जुड़े हो सकते हैं। बीते बुधवार को यादव सिंह से करीबन 8 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद सीबीआई ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया। दरअसल सीबीआई ने सबूतों के बिना पर जिन सवालों का जवाब यादव सिंह से मांगा उनका सही सही जवाब वह नहीं दे पाया।
कौन-कौन सी लगी हैं धाराएं
सीबीआई ने यादव सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 409, 420, 466, 467 समेत 469, 481 के अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है।
2017 पर यादवीय प्रभाव
2017 के ठीक पहले यह मामला प्रकाश में आया तो जनता की जुबानों पर यादव सिंह नाम चढ़ गया है। चाय की गुमटियों, पान की दुकानों, घर पर खाने के वक्त यादव सिंह मामले पर चर्चा करने लगी। साथ ही लोग कहने लगे हैं कि सपा सरकार है क्या न हो जाए। हत्या, रेप, अपहरण जैसे तमाम अपराधों की फेहरिस्त में यह मामला सबसे ऊपर हो गया।
खास बात यह है कि बसपा, भाजपा और कांग्रेस जैसी विरोधी पार्टियां यादव सिंह के मामले को 2017 तक दबने नहीं देंगी। अब आपको हर जनसभा, हर रैली में यादव नाम की गूंज सुनाई देगी। इस मुद्दे ने लोगों की नजरों में समाजवादी सरकार की छवि को धूमिल कर दिया है। जिसका असर निश्चित तौर पर यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में देखने को मिलेगा। हां ये भी देखना दिलचस्प होगा कि यादव सिंह मामले में खुलासे किसकी बखिया उधेड़ते हैं। हां, इस मामले से सूबे के सियासतदानों की धड़कनें बढ़ी समझ आ रही हैं।
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