4 साल की पोती को देख रो पड़ते हैं कश्मीरी पंडित बिट्टाजी बट

नई दिल्ली, 23 जून। बिट्टाजी बट और उनकी पत्नी को अब तक इस बात का यकीन नहीं हो रहा है कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा. अपनी चार साल की पोती को देख-देखकर उनका कलेजा मुंह को आता है, जिसे पता भी नहीं है कि उसके पापा को सिर्फ इसलिए मार दिया गया कि वह एक खास समुदाय से आते थे.
जम्मू में रहने वाले बट कहते हैं, "जब मैं अपनी पोती को खेलते देखता हूं तो मेरी आंखें डबडबा जाती हैं. उसे पता ही नहीं है कि वक्त के क्रूर हाथों ने उससे उसके पापा छीन लिए हैं."
बट के बेटे एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क के तौर पर तैनात थे. मई में उन्हें गोली मार दी गई थी. दो दिन बाद पुलिस ने कहा कि उनको गोली मारने वालों को मुठभेड़ में मार गिराया गया है. हालांकि अपने बेटे के हत्यारों के मारे जाने से बट के परिवार को कोई राहत नहीं मिली है. उनका दुख उसी तरह उबल पड़ता है. उनके बेटे के जाने से खाली हुई जगह हमेशा के लिए खाली हो चुकी है.
35 साल के राहुल बट की तस्वीर देखते हुए बिट्टाजी बट कहते हैं, "इससे ज्यादा दर्दनाक क्या हो सकता है कि मेरे जैसे पिता को अपने बेटे की अर्थी को कंधा देना पड़ा."
चुन-चुनकर हत्याएं
पिछले कुछ महीनों में कश्मीर में चुन-चुनकर हत्याओं की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं. आतंकवादियों के निशाने पर सिर्फ हिंदू नहीं हैं बल्कि बहुत से ऐसे मुसलमानों को भी निशाना बनाया गया है जो भारत की राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होकर सरपंच, काउंसलर आदि बने या फिर भारतीय पुलिस में भर्ती हुए. यहां तक कि आतंकवादियों ने टीवी और सोशल मीडिया पर काम करने वाले मुस्लिम कलाकारों की भी हत्याएं की हैं. साथ ही, बिहार आदि अन्य राज्यों से काम करने कश्मीर आए मजदूरों को भी गोलियों का शिकार होना पड़ा है.
कश्मीरी पंडितों को अपना बड़ा मुद्दा बनाने वाले भारतीय जनता पार्टी की सरकार को लगातार आठ साल हो चुके हैं लेकिन कश्मीर पंडितों के लिए हालात में कोई बदलाव नहीं है. वे इस वक्त भी डरे हुए हैं और घाटी छोड़कर भाग रहे हैं. हाल की हत्याओं ने उनके डर को और बढ़ा दिया है. राहुल बट की हत्या के बाद बड़ी संख्या में कश्मीरी हिंदुओं ने सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया और उन्हें सुरक्षित जगहों पर ले जाने की मांग की थी. ये प्रदर्शनकारी कहते हैं कि सरकार राज्य में हालात को सामान्य दिखाने के नाम पर उन्हें 'चारा' और 'बलि का बकरा' बना रही है.
जारी है सिलसिला
इन प्रदर्शनों के बाद भी हत्याओं का सिलसिला जारी रहा. राहुल बट के मारे जाने के कुछ दिन बाद 31 मई को राजकुमार ने अपनी पत्नी रजनी बाला को स्कूल के बाहर छोड़ा, जहां वह सामाजिक अध्ययन की शिक्षिका थीं. पति-पत्नी के लिए यह रोज की प्रक्रिया का हिस्सा था. संवेदनशील इलाके कुलगाम में तैनात दोनों ही शिक्षक उस स्कूल के बाहर एक दूसरे को शाम तक के लिए विदा कहते थे. लेकिन राजुकमार को अहसास नहीं था कि वह रजनी बाला को अंतिम बार विदा कह रहे हैं.
राजकुमार के जाने के कुछ ही मिनट बाद 36 वर्षीय रजनी बाला को स्कूल की ओर जाते वक्त गोली मार दी गई. राजकुमार अपने स्कूल पहुंच पाते उससे पहले ही उनके पास फोन से सूचना आई कि उनकी पत्नी नहीं रहीं.
राजकुमार बताते हैं कि इससे कुछ ही दिन पहले पति-पत्नी ने अधिकारियों से सुरक्षित जगहों पर तबादले के लिए अपील की थी जिसकी कोई सुनवाई नहीं हुई. वह बताते हैं, "जब मैंने सुना की रजनी नहीं रही तो मेरे मन में पहला ख्याल ये आया कि मेरी बेटी अपनी मां के बिना कैसे रहेगी."
भाग रहे हैं कश्मीरी पंडित
रजनी बाला की हत्या का असर यह हुआ कि सैकड़ों परिवार घाटी छोड़कर चले गए. उत्तरी कश्मीर के बारामूला में हिंदू कश्मीरी पंडित कॉलोनी के अध्यक्ष अवतार कृष्ण बट बताते हैं कि उस घटना के बाद से कॉलोनी में रहने वाले 300 परिवारों में से लगभग आधे जा चुके हैं. घटना के अगले दिन मीडिया से बातचीत में उन्होंने बताया, "रजनी की हत्या के बाद वे लोग भयभीत थे. हम भी चले जाएंगे क्योंकि फिलहाल हम सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहे हैं. हमने सरकार से आग्रह किया था कि हमें कश्मीर के बाहर कहीं बसा दिया जाए."
भारतीय जनता पार्टी के लिए कश्मीरी पंडित बड़ा मुद्दा रहे हैं और नरेंद्र मोदी सरकार चाहती है कि कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो. इसी कोशिश के तहत हाल के सालों में 3,400 से ज्यादा हिंदुओं को कश्मीर में सरकारी नौकरियां दी गई हैं. लेकिन अब ये कश्मीर घाटी से बाहर कहीं और बसाए जाने की मांग कर रहे हैं.
रिपोर्टः विवेक कुमार (रॉयटर्स)
Source: DW
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