Jammu Kashmir Exit Polls 2024: कश्मीर घाटी में BJP की रणनीति में कहां हो गई चूक?

Jammu Kashmir Exit Exit Polls 2024 News: केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में हुए विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल के जो अनुमान आए हैं, उसमें ज्यादातर ने नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन को बढ़त दिखाई है। बीजेपी जम्मू क्षेत्र में तो फिर भी ठीक प्रदर्शन करती नजर आ रही है। लेकिन, मुख्य प्रतिद्वंद्वी नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन कश्मीर घाटी में तो आगे है ही और जम्मू में भी अप्रत्याशित रूप से अच्छा कर रहा है। सवाल है कि आखिर भाजपा से कहां रणनीतिक चूक हो गई?

जम्मू और कश्मीर की 90 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें कश्मीर क्षेत्र में है और 43 जम्मू इलाके में। भाजपा जम्मू की सभी सीटों पर लड़ी और कश्मीर घाटी में भी कम से कम 24 सीटों पर प्रत्याशी उतारने की तैयारी की थी। लेकिन, एक रणनीति के तहत पार्टी ने आखिरकार 19 प्रत्याशियों को ही उतारने का फैसला किया।

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कश्मीर में किस रणनीति के तहत कम सीटों पर लड़ी बीजेपी?
2014 में कश्मीर डिविजन में सिर्फ 46 सीटें ही थीं और तब भी बीजेपी ने वहां 30 से अधिक सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए थे। उसके बाद वह पीडीपी के साथ पहली बार सरकार में भी आई।

महबूबा मुफ्ती की सरकार गिरने के बाद से परोक्ष रूप से जम्मू और कश्मीर में केंद्र सरकार के माध्यम से उसी की सत्ता रही है। वहां आर्टिकल 370 हटने के बाद काफी बदलाव भी हुए हैं। लेकिन, बावजूद इसके इस बार भाजपा अगर सिर्फ 19 सीटों पर चुनाव लड़ी तो कहा गया कि वह बिना रणनीति के कोई काम नहीं करती।

दरअसल, बीजेपी कश्मीर घाटी की सभी सीटों पर चुनाव लड़कर नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन-विरोधी वोटों को बंटने नहीं देना चाहती थी। दूसरी तरफ उसे यह उम्मीद थी कि वहां अगर वह खुद मैदान में नहीं रहेगी तो भाजपा-विरोधी वोट एनसी-कांग्रेस गठबंधन, पीडीपी और नई पार्टियों और निर्दलीय प्रत्याशियों में विभाजित हो जाएंगे। इससे एनसी-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में भाजपा-विरोधी वोट गोलबंद नहीं हो सकेंगे, जिससे मुख्य प्रतिद्वंद्वी को नुकसान होगा।

कश्मीर में कहां फेल हो गई बीजेपी की रणनीति?
जहां तक महबूबा मुफ्ती की पीडीपी की बात है तो वह शुरू से ही इस चुनाव में प्रभावशाली नहीं नजर आई है। अलबत्ता स्थानीय चुनाव होने की वजह से उसके पास भी जनाधार समेटने का एक मौका है। बीजेपी की रणनीति की सबसे बड़ी उम्मीद अल्ताफ बुखारी की अपनी पार्टी, सज्जाद लोन की पीपुल्स पार्टी,गुलाम नबी आजाद की पार्टी, जमात ए इस्लामी और इंजीनियर राशिद समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी थे। पार्टी को लगा कि इनके खातों में जो वोट जाएंगे, उससे एनसी-कांग्रेस गठबंधन को ज्यादा नुकसान होगा।

अगर हम एक्सिस माय इंडिया के एग्जिट पोल के आंकड़ों को देखें तो मालूम पड़ता है कि भाजपा की रणनीति पूरी तरह से काम नहीं कर पाई है। मसलन, अन्य को 19% वोट जरूर मिले हैं। इंजीनियर राशिद की पार्टी समर्थित प्रत्याशियों को भी 7% वोट हासलि हुए हैं। सज्जाद लोन और अल्ताफ बुखारी के दलों को भी 3-3% वोट मिले हैं और पीडीपी भी 9% वोट जुटा सकी है। लेकिन, इतने वोट बंटने के बावजूद कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और सीपीएम गठबंधन ने 38% वोट पा लिए हैं और भाजपा खुद 21% वोट पर ही अटक गई है।

कश्मीर घाटी में भाजपा की रणनीति क्यों नहीं काम आई?
ऊपर के आंकड़े पूरे जम्मू और कश्मीर के हैं। अब हम सिर्फ कश्मीर घाटी के आंकड़ों को देखते हैं, जहां के लिए भाजपा ने पूरी रणनीति तैयार की थी। सी-वोटर के एग्जिट पोल के अनुसार यहां निर्दलीय और अन्य उम्मीदवारों को तो भाजपा की उम्मीदों के अनुसार 39.3% मिले हैं, लेकिन नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस और सीपीएम गठबंधन फिर भी 41.1% वोट जुटाने में सफल हो गया है।

जबकि, पीडीपी ने भी घाटी की सीटों पर 16.6% पाए हैं। जबकि, बीजेपी जिन 19 सीटों पर लड़ी वहां उसे मात्र 3% वोट ही मिले और 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' वाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा इसके चुनावी भविष्य के लिए एक बार फिर से फेल साबित हो गया है।

कुल मिलाकर एग्जिट पोल के अनुमान यही संकेत दे रहे हैं कि जहां तक छोटी-छोटी पार्टियों और निर्दलियों में वोट विभाजित होने पर भाजपा की जो उम्मीद टिकी थी, उसका तो असर हुआ, लेकिन फिर भी एंटी-बीजेपी वोट ज्यादातर कांग्रेस और नेशनल गठबंधन के पक्ष में ही गोलबंद हो गए और पार्टी को खुद घाटी के मतदाताओं से अपने लिए जितनी भी उम्मीदें थीं, वह पूरी तरह से टूट गई।

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