Jammu Kashmir Exit Polls 2024: BJP के 'नया कश्मीर' के विजन को घाटी में क्यों नहीं मिला समर्थन?

Jammu Kashmir Exit Exit Polls 2024 News: केंद्र शासित जम्मू और कश्मीर में बीजेपी की पहली सरकार बनने की संभावना नहीं दिख रही है। कम से कम ज्यादातर एग्जिट पोल के नतीजे तो इसी की ओर इशारा कर रहे हैं। जम्मू को भाजपा का गढ़ माना जाता है और वहां तो यह स्थिति नजर आ भी रही है। लेकिन, कश्मीर घाटी पार्टी पर अभी भी यकीन करने के लिए तैयार नहीं है, एग्जिट पोल यही बता रहे हैं। आखिरकार भाजपा का 'नया कश्मीर' का विजन क्यों फेल होता नजर आ रहा है?

एग्जिट पोल के अनुमानों के हिसाब से कश्मीर घाटी की 47 सीटों में से भाजपा का इस बार भी खाता खुलना आसान नहीं है। ले-देकर पार्टी को 90 सीटों में से जम्मू की 43 सीटों के ही भरोसे रहना है। सवाल है कि बीते एक दशक और खासकर बीते पांच वर्षों में इसे 'नया कश्मीर' बनाने का इसकी सरकार के विजन को किसकी नजर लग गई है!

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कश्मीर घाटी में बीजेपी पहले से ही संगठनात्मक तौर पर है कमजोर
कश्मीर घाटी में बीजेपी शुरू से ही खुद को कमजोर मानकर चल रही थी। पहले यह लोकसभा के चुनावों में दिखा था, जब पार्टी वहां की तीन में से एक भी सीट पर चुनाव नहीं लड़ी। इस बार सिर्फ 19 सीटों पर भाग्य आजमा कर भी पार्टी ने यही संदेश दिया कि आज भी वहां पार्टी चुनाव लड़ने लायक संगठन नहीं खड़ा कर सकी है।

हालांकि, भाजपा ने अल्ताफ बुखारी की अपनी पार्टी और सज्जाद लोन की पीपुल्स कांफ्रेंस के साथ अघोषित तालमेल बिठाने की कोशिश भी की , लेकिन एग्जिट पोल के अनुमानों की मानें तो कश्मीर डिविजन में पार्टी को उसका भी खास लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। कुछ एग्जिट पोल के अनुमानों की मानें तो कश्मीर घाटी में पार्टी अगर 1 भी सीट जीत ले तो यह भी बहुत बड़ी सफलता मानी जाएगी।

आर्टिकल 370 के बाद 'नया कश्मीर' के विजन पर चल रही है बीजेपी सरकार
जम्मू कश्मीर से जबसे आर्टिकल 370 हटाया गया है, नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने वहां 'नया कश्मीर' के नजरिए के साथ शांति स्थापित करने के साथ ही विकास के तमाम कदम उठाए हैं। इसका असर जमीन पर दिख भी रहा है। श्रीनगर का जो लाल चौक कभी दहशत का दूसरा नाम हुआ करता था, वह आज पर्यटकों के घूमने के लिए टूरिस्ट हॉट-स्पॉट में तब्दील हो चुका है।

आम कश्मीरी भी महसूस कर रहे हैं अमन
केंद्र सरकार ने यहां विकास की जो अनेकों योजनाएं शुरू की हैं, उनमें कोविड महामारी की वजह से बाधा जरूर पहुंची, लेकिन बदलाव फिर भी दिख रहा है। माहौल बदला है तो पर्यटकों का कश्मीर के प्रति आकर्षण भी बढ़ गया है। आतंकवाद, अलगाववाद और पत्थरबाजी की घटनाएं खत्म होने से आम कश्मीरी भी सुकून का सांस ले रहा है।

इससे पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता में आते ही कश्मीर के लिए बहुत ही सहानुभूति वाला रवैया अपनाया था। वहां बाढ़ आई थी, तो पूर्ववर्ती सरकार की मदद के लिए केंद्रीय मदद में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

आर्टिकल 370 पर अपना कार्ड चलने में सफल हुआ विपक्ष!
लेकिन, एग्जिट पोल के जो नतीजे आए हैं, उससे यही संकेत मिल रहा है कि भले ही कश्मीर के लोग शांति महसूस कर रहे हैं, मान रहे हैं कि विकास होने लगा है, पहले की तरह शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार नहीं है, दिल्ली से जो पैसे आ रहा है, वह जमीन पर खर्च हो रहे हैं। लेकिन, लगता है कि फिर भी कहीं न कहीं आर्टिकल-370 खत्म होने को लेकर नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियां लोगों के दिलों में टीस पैदा करने में सफल हुई हैं।

लगता है कि बीजेपी यह बात कश्मीर के लोगों को यकीन दिलाने में नाकाम रही है कि आर्टिकल-370 अब एक अभिषाप बन चुका था, जिसके जाने से ही बदलाव और बेहतरी मुमकिन है। इसके ठीक उलट नेशनल कांफ्रेंस, कांग्रेस और पीडीपी जैसे दलों ने कश्मीरियों के दिलों में विशेष दर्जे को उनकी गरिमा, उनके सम्मान और उससे भी आगे बढ़कर उनकी पहचान से जोड़ने में सफल रहे हैं।

कश्मीर के लोग पत्थरबाजी और हड़तालों पर लगाम लगने से राहत तो महसूस कर रहे हैं, लेकिन विरोधी दल इसे उनकी 'अभिव्यक्ति की आजादी' की आजादी खत्म होने की तरह पेश करने में सफल हुए हैं।

कश्मीर घाटी में क्यों नाकाम हुई बीजेपी?
जाहिर है कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को नियंत्रित करने के लिए सख्ती की आवश्यकता जरूरी है, लेकिन लगता है कि विपक्ष इसे आम कश्मीरियों के 'दमन' की कोशिशों से जोड़ने में कामयाब हो गया है और उनका बीजेपी-विरोधी सिक्का चल गया है। वहीं भाजपा कश्मीरियों के दिलों में बिठायी जा रही इन भावनाओं को दूर करने में नाकाम हो गई है।

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