J&K Election: आर्टिकल 370 ने करवाई थी दोस्ती, फिर क्यों दूर हुए महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला
J&K Election: जम्मू और कश्मीर में पीडीपी का मुफ्ती परिवार और नेशनल कांफ्रेंस का अब्दुल्ला परिवार हमेशा से एक-दूसरे का राजनीतिक दुश्मन रहा है। लेकिन, जब केंद्र की मोदी सरकार ने 2019 में आर्टिकल 370 हटाया था तो दोनों ने हाथ मिला लिया था। लोकसभा चुनावों से इस नई-नई दोस्ती में फिर से दरार पड़ने लगी और विधानसभा चुनाव आते-आते यह फिर से पुरानी अदावत में तब्दील हो चुकी है।
जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों को लेकर पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती और नेशननल कांफ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला एक-दूसरे पर तीखे हमले कर रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चल रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर दोनों ही दल विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक में शामिल हैं, लेकिन कश्मीर में एक-दूसरे पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे।

आर्टिकल 370 खत्म होने के बाद पीडीपी-एनसी ने हाथ मिलाया था
2019 के अगस्त में जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल-370 खत्म किया था, उसके बाद जब इन नेताओं बाहर आने का मौका मिला तो इन्होंने पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लरेशन (PAGD) नाम का एक संगठन खड़ा किया। इसका मूल मकसद हर हाल में आर्टिकल-370 की वापसी का था।
गुपकार गठबंधन वाली एकजुटता खत्म
केंद्र शासित प्रदेश की राजनीति में अपना वजूद बनाए रखने के लिए यह दोनों ही दल आज भी आर्टिकल-370 की वापसी का सपना दिखाने में पीछे नहीं हैं। लेकिन, अब इनके बीच इसको लेकर अब न गुपकार गठबंधन वाली एकजुटता दिख रही है और ना ही अपने वादों पर टिके रहने का यकीन ही बच गया है।
विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के दावे पर तू-तू-मैं-मैं शुरू
मसलन, उमर और महबूबा दोनों ने ही दावा किया था कि जबतक जम्मू-कश्मीर के राज्य वाले दर्जे की बहाली नहीं होती, ये लोग विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। अब इसी मुद्दे पर दोनों नेताओं के बीच चुनावी तू-तू-मैं-मैं चल रही है।
महबूबा ने उमर पर चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद तंज कसा तो उमर ने जवाब में कहा, 'जो लोग मुझपर निशाना साधते हैं, उन्होंने अपने बेटों और बेटियों को उतारा है।' दरअसल, उमर विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के अपने वादे से मुकर गए तो मबबूबा ने खुद चुनाव नहीं लड़कर भी बेटी इल्तिजा मुफ्ती को अपनी ही सीट बिजबेहरा से टिकट दे दिया है।
नेशनल कांफ्रेंस आर्टिकल 370 हटने के लिए भी पीडीपी को घेरने में जुटी
उमर अपने वादे से पलटने को लेकर दलील ये दे रहे हैं कि जब वे खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे, तो लोगों से विधानसभा चुनाव में वोट देने के लिए कैसे कहेंगे। यही नहीं, नेशनल कांफ्रेंस ने एक बार फिर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के लिए पीडीपी पर दोषारोपण शुरू कर दिया है।
पार्टी प्रवक्ता तनवीर सादिक का कहना है, 'वैसे पीडीपी हम पर हमला करने से बाज नहीं आ रही है, लेकिन हमारा उनके खिलाफ बोलने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन, सच्चाई यही है कि 2014 में पीडीपी ने बीजेपी से हाथ मिला लिया था। 2019 में जो कुछ हुआ, वह नहीं हो पाता अगर गठबंधन नहीं हुआ होता।'
महबूबा उमर को दिला रही हैं उनके पुरखों की राजनीति की याद
दूसरी तरफ महबूबा उमर अब्दुल्ला पर निशाना साधने के लिए उनके पुरखों तक के राजनीतिक इतिहास सामने रखने लगी हैं। उनका आरोप है कि अब्दुल्ला परिवार पूर्ववर्ती राज्य को अपना 'जागीर' समझाता था।
उन्होंने कहा, 'यह हलाल और हराम का कारोबार उनकी (नेशनल कांफ्रेंस) ओर से शुरू किया गया है। 1947 में जब शेख साहेब (उमर के दादा) को चीफ एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर बनाया गया तब चुनाव हलाल थे। जब वह प्रधानमंत्री (पूर्ववर्ती राज्य में) बने तो चुनाव हलाल थे। लेकिन, जबक उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया तो अचानक चुनाव हराम हो गया।'
मुफ्ती जमात-ए-इस्लामी पर से बैन हटाने की भी वकालत कर रही हैं। उनका कहना है, '1987 में जमात-ए-इस्लामी के लिए चुनावों को हराम कौन बनाया? उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए चुनावों का दरवाजा बंद कर दिया।'
2020 में जिला विकास परिषद का चुनाव मिलकर लड़े थे
आर्टिकल 370 की समाप्ति के बाद 2020 में जम्मू और कश्मीर में जिला विकास परिषद के लिए चुनाव करवाए गए थे, तब दोनों ही दलों ने हाथ मिलाकर साझा चुनाव लड़ा था।
लोकसभा चुनावों में टूट गई नई-नई दोस्ती
लेकिन, लोकसभा चुनावों से पहले नेशनल कांफ्रेंस ने कश्मीर घाटी की तीनों ही सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की बात कहकर पीडीपी को झटका दे दिया। पीडीपी सिर्फ अनंतनाग-राजौरी सीट पर अपना दावा जता रही थी।
उमर और महबूबा दोनों ही हार गए चुनाव
इसका परिणाम ये हुआ कि इस विधानसभा चुनावों की तरह ही कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस मिलकर चुनाव लड़े और पीडीपी अकेले मैदान में उतरी। जम्मू में दोनों ही सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दी गई। कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस को दो सीटें तो मिलीं, लेकिन उमर अब्दुल्ला खुद चुनाव हार गए। महबूबा की पार्टी का खाता भी नहीं खुला और हारने वालों में वह खुद भी शामिल रहीं।
हालांकि, लोकसभा चुनावों में सीटों पर तालमेल नहीं हो पाने के बावजूद कम से कम दोनों ही कट्टर-विरोधियों में जुबानी जंग की नौबत नहीं देखी गई थी। यहां तक की दोनों दलों के प्रत्याशियों ने भी एक-दूसरे पर निशाना साधने से बचने की कोशिश की थी। लेकिन, विधानसभा चुनाव आते-आते फिर से 2019 के पहले वाली स्थिति बन चुकी है।












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