कश्मीर के गांवों में सेना, कौशल विकास और रोजगार केंद्र की मदद से कैसे बदल रही है तस्वीर ? जानिए
जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के एक दूर-दराज गांव में सेना की मदद से लड़कियों की जिंदगी बदलने लगी है। गांव गरीबों का है, लेकिन कौसल विकास से अब वहां की युवतियों के पास हौसले की कोई कमी नहीं रह गई है।

जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना अन्य निजी और सरकारी संस्थाओं की सहायता से लोगों को स्वरोजगार की ओर प्रेरित करने के अभियान में भी जुटी है। केंद्र शासित प्रदेश में सेना सिर्फ नागरिकों को सुरक्षा ही देने का काम नहीं कर रही है, बल्कि जीवन के हर मोड़ पर लोगों के कल्याण के कार्यों में भी मदद करने का प्रयास कर रही है। सेना की कोशिशों से तरह-तरह के कौशल विकास केंद्र चलाए जा रहे हैं। कुपवाड़ा जिले में एक ऐसा गांव है, जो अबतक बहुत पिछड़ा हुआ है। गरीबी तो वहां हर घर की कहानी है। लेकिन, सेना ने एक निजी संस्था के सहयोग से हाथ बढ़ाया और आज वहां के लोगों के दिन फिरने लगे हैं। सबसे बड़ी बात है कि इस गांव में सेना की सहायता से नारी शक्ति को और भी सशक्त होने का मौका मिला है।

सेना की सहयता से बदली दर्दपोरा की तस्वीर
जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के दूर-दराज इलाके में स्थित है दर्दपोरा गांव। इस गांव में लगभग 9,500 लोग रहते हैं। जम्मू रिजलाइन के बेस पर स्थित यह गांव अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह पिछड़ा रह गया है। यहां विकास का काम अधूरा है और यहां रहने वाले ज्यादातर लोग लाचार और बेरोजगार हैं। इस हालात को बदलने के लिए भारतीय सेना ने मैक्स लाइफ इंश्योरेंस की साथ मिलकर वज्र स्किल डेवलपमेंट एंड एंप्लॉयमेंट सेंटर (कपड़े काटने और सिलाई का काम) स्थापित किया, ताकि दर्दपोरा की स्थानीय महिलाओं को अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ कौशल प्राप्त हो सकते। यह प्रयास रंग लाया है और यहां के लोगों के चेहरे पर इसकी झलक भी महसूस होने लगी है।

स्थानीय युवतियों का बढ़ रहा है उत्साह
बड़ी बात है कि कुपवाड़ा जिले में भारी बर्फबारी के बावजूद इस इंश्योरेंस कंपनी के प्रतिनिधि और अधिकारियों ने वज्र स्किल सेंटर पहुंचकर वहां कौशल सीखने वाली लड़कियों का उत्साह बढ़ाया है और उन्हें सिलाई मशीन उपलब्ध कराए हैं। इस दौरान लड़कियों ने इस सेंटर में जो कुछ सीखा है, उसका नमूना भी पेश किया गया है। उनके अंदर जो प्रतिभा छिपी हुई थी, वह अब उभर कर बाहर आने लगी है।

बदल रहा ही जीवन, संवर रही है जिंदगी
इस तरह की सहायता का परिणाम ये हुआ है कि स्थानीय लड़कियों ने अपने दम पर एक अपने आप में पूर्ण छोटा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया है। इसका लाभ ये मिल रहा है कि अधिकतर आबादी के गरीबी में जीने के बावजूद सेंटर की मदद से लड़कियों को रोजगार मिलने लगे हैं, जिसके दम पर वह अपने परिवारों को सपोर्ट कर सकती हैं। पहले इस तरह की बात वह सपने में भी नहीं सोच सकती थीं। यकीन करना मुश्किल है कि सिर्फ इतने भर से यहां के लोगों की जीवन की गुणवत्ता में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है और खासकर महिलाओं की तो जिंदगी ही बदल गई है और वो अब काफी बेहतर जीवन जीने लगी हैं।

स्वरोजगार के लिए हो रही हैं तैयार
बेसिक ट्रेनिंग के लिए स्किल सेंटर के पास तीन कमरों वाला एक मकान है, जिसमें चार स्टिचिंग मशीनें रखी गई हैं। जो लड़कियां बेसिक स्किल समझ लेती हैं, उनके लिए फिर मध्यम और एडवांस ट्रेनिंग का इंतजाम है। इसके लिए सेंटर के पास 6 मोटर वाली स्टिचिंग मशीनें, एक इंटरलॉकिंग मशीन और एक एंब्रॉयडरी मशीन है। अबतक तक कुल 20 लड़कियों को ट्रेनिंग दी जा रही है और एक सक्षम इंस्ट्रक्टर स्वरोजगार की ओर प्रेरित कर रहे हैं।
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हर मोड़ पर सेना दे रही है साथ
दअरसल, भारतीय सेना जम्मू और कश्मीर में सिर्फ नागरिकों की सुरक्षा के लिए ही मौजूद नहीं है। वह अपने स्तर पर कल्याणकारी कार्यों में भी जुटी हुई है। इस केंद्र शासित प्रदेश में कुछ ऐसे गांव भी हैं, जिन्हें पहले उपेक्षित छोड़ा गया था। भारतीय सेना ने ऐसे कुछ गांवों को गोद भी लिया है। ऐसे गांव के लोग स्वाभाविक तौर पर सैनिकों को अपने परिवार का अभिन्न अंग समझने लगे हैं, जो हर सुख-दुख में उनके साथ खड़े रहते हैं। डोडा जिले का एक ऐसा ही गांव है भद्रवाह, जिसके बारे में पिछले साल यह रिपोर्ट आई थी। (इनपुट-एएनआई और कुछ तस्वीरें- प्रतीकात्मक)












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